श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1458, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/81–91 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
वस्तुका आरोप करनेवाले मनोधर्मी नहीं थे। वे नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण सेवक थे। उनमें जड़ीय कामकी गन्ध भी नहीं थी। वे अप्राकृत-सेवाके भावमें निमग्न रहकर सब समय अपनी आराध्य वस्तुकी सेवा करते थे। पक्षान्तरमें, अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये कर्ममिश्रा-बिद्धा भक्तिका आश्रय करनेवाले कनिष्ठ भक्तोंमें अप्राकृत-सेवा-बुद्धि नहीं होती। इसलिये केवल श्रीराघव पण्डितके बाह्य आचरणका अनुकरण करके लौकिक कृत्रिम पवित्रता-अपवित्रताका विचार करनेसे ही वे शुद्धकृष्णभक्त नहीं हो सकते। उनका ऐसा आचरण उनकी श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छाका परिचय नहीं देता। (अन्त्यलीला 4/174, 176 संख्या)में— “भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174ख ॥ 'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब—'मनोधर्म'। 'एइ भाल, एइ मन्द',—एइ सब 'भ्रम' ॥” 176 ॥ [अर्थात् “‘अप्राकृत' वस्तुमें भद्र और अभद्र अर्थात् अच्छे और बुरेका कोई विचार होना उचित नहीं है। 'द्वैत' अर्थात् प्राकृत वस्तुमें भद्र और अभद्रका ज्ञान करना तो 'मनका धर्म' है। 'यह अच्छा है, यह बुरा है'—यह सब तो भ्रम है।”] भागवत 11/28/4 श्लोक देखें ॥ 81–83 ॥
जगत्में श्रीराघवकी अपूर्व पवित्र श्रीकृष्णसेवा :— एत बलि' फल फेले प्राचीर लङ्गिया। ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा जगत् जिनिया ॥ 84 ॥ तबे आर नारिकेल संस्कार कराइल। परम पवित्र करि' भोग लागाइल ॥ 85 ॥ एइमत कला, आम्र, नारिकेल, काँठाल। याहा याहा दूर-ग्रामे शुनियाछे भाल ॥ 86 ॥ बहुमूल्य दिया आनि' करिया यतन। पवित्र संस्कार करि' करे निवेदन ॥ 87 ॥ एइमत व्यञ्जनेर शाक, मूल, फल। एइमत चिड़ा, हुडुम, सन्देश सकल ॥ 88 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
एइमत पिठा-पाना, क्षीर-ओदन। परम पवित्र, आर करे सर्वोत्तम ॥ 89 ॥ काश्मन्दि, आचार आदि अनेक प्रकार। गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार, सर्वद्रव्य-सार ॥ 90 ॥ एइमत प्रेमेर सेवा करे अनुपम। याहा देखि' सर्वलोकेर जुड़ाय नयन ॥” 91 ॥
अनुवाद—यह कहकर इन्होंने उन नारियलोंको दीवारके दूसरी ओर फेंक दिया। इनकी ऐसी पवित्र प्रेम-सेवा जगत्को जीतनेवाली है। तब इन्होंने पुनः अन्य नारियलोंको सावधानी और पवित्रतासे छिलवाया और उनका भोग लगाया। इसी प्रकार केले, आम, सन्तरे, कटहल और अन्यान्य जिन-जिन पदार्थोंके विषयमें सुनते हैं कि कहीं दूर ग्राममें भी बहुत अच्छे मिल रहे हैं, तो ये यत्न करके बहुत अधिक मूल्य देकर भी उन्हें मँगवाते हैं और अच्छेसे पवित्र करके छीलकर उन्हें भगवान्को निवेदन करते हैं। इसी प्रकार शाक, मूल, फल आदि, चिड़वा, सख्त मूड़ि, अनेक प्रकारके सन्देश, पीठा-पाना और गाढ़ी खीर आदि व्यञ्जनोंको परम-पवित्रतासे अति उत्तम और स्वादिष्ट बनाते हैं। इसी प्रकार ही कासुन्दी (सरसोंसे बनी चटनी) और अनेक प्रकारके आचार आदि भी श्रीकृष्णको निवेदित करते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ताके इत्यादि सुगन्धित द्रव्य, वस्त्र और अलङ्कारादि भी निवेदन करते हैं। इस प्रकार राघव पण्डित प्रेमपूर्वक अनुपम सेवा करते हैं, जिसे देखकर सभी लोगोंको बहुत आनन्द होता है ॥” 84–91 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'हुडुम'—एक प्रकारका धान, इसकी खील उड़ीसामें विशेषरूपसे प्रचलित है (पूर्वी- बङ्गालमें 'मुड़ि'को 'हुडुम' कहते हैं)। 'काश्मन्दि'—कासुन्दि (सरसोंके दानोंसे बनी तीखी चटनी) ॥ 88–90 ॥
अनुभाष्य—'क्षीर-ओदन'—दूधमें पकाये चावलकी खीर ॥ 89 ॥
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