भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1459

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/92-99 ] महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंका यथायोग्य अभिनन्दन :- एत बलि' राघवेरे कैल आलिङ्गने। एइमत सम्मानिल सर्व भक्तगणे ॥ 92 ॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभुने श्रीराघव पण्डितका आलिङ्गन किया। इसी प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको सम्मानित किया ॥ 92 ॥ श्रीशिवानन्दको खर्चीले श्रीवासुदेव-दत्तके धनका रक्षक बननेका आदेश :- शिवानन्दसेने कहे करिया सम्मान। “वासुदेव-दत्तेर तुमि करिह समाधान ॥ 93 ॥ परम उदार इँहो, ये दिन ये आइसे। सेइ दिने व्यय करे, नाहि राखे शेषे ॥ 94 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको सम्मान देते हुए कहा,-“आप वासुदेव-दत्तका ध्यान रखना। ये परम उदार हैं। जिस दिन इनके पास जितना भी धन आता है, ये उसे उसी दिन ही खर्च कर देते हैं, अपने पास कुछ भी बचाकर नहीं रखते ॥ 93-94 ॥ अनुभाष्य-श्रीशिवानन्द सेन और श्रीवासुदेव दत्त ठाकुर-दोनों ही उस समय कुमारहट्ट अथवा हालिसहर और काँचड़ापाड़ामें वास करते थे ॥ 93 ॥ गृहस्थ वैष्णवोंके लिये लौकिक-कर्त्तव्यका उपदेश :- 'गृहस्थ' हयेन इँहो, चाहिये सञ्चय। सञ्चय ना कैले कुटुम्ब-भरण नाहि हय ॥ 95 ॥ इहार घरेर आय-व्यय, सब-तोमार स्थाने। 'सरखेल' हञा तुमि करिह समाधाने ॥ 96 ॥ अनुवाद-वासुदेव दत्त 'गृहस्थ' हैं, इसलिये उन्हें कुछ-न-कुछ सञ्चय करनेकी आवश्यकता है। सञ्चय किये बिना कुटुम्बका भरण-पोषण नहीं होता। इनके घरके आय-व्यय आदिका सब कुछ आप इनके 'सरखेल'के रूपमें ध्यान रखना ॥ 95-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सरखेल'-तत्त्वावधायक (हिसाब- किताब रखनेवाले) ॥ 96 ॥ प्रत्येक वर्ष मार्गमें कर-संग्रहकर्त्ताका समाधान करके सभी भक्तोंको पुरीमें लानेकी आज्ञा :- प्रतिवर्षे आमार सब भक्तगण लञा। गुण्डिचाय आसिबे सबाय पालन करिया ॥ "97 ॥ अनुवाद-आप प्रत्येक वर्ष मेरे सब भक्तोंको अपने साथ लेकर उनका पालन-पोषण करते हुए रथयात्राके समय नीलाचलमें आना ॥ "97 ॥ श्रीसत्यराज और श्रीरामानन्दको प्रतिवर्ष रेशमी डोरी लानेका आदेश :- कुलीनग्रामीरे कहे सम्मान करिया। “प्रत्यब्द आसिबे यात्राय पट्टडोरी लञा ॥ 98 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कुलीनग्रामवासियोंको सम्मान देते हुए कहा,-“आप लोग प्रत्येक वर्ष रथयात्रामें मजबूत रेशमी-डोरियाँ (जिनसे बाँधकर श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव और श्रीसुभद्राको उठाकर लाया जाता है) लेकर आना ॥ 98 ॥ श्रीमुखसे मालाधर-वसु-कृत 'श्रीकृष्णविजय' की महिमाका वर्णन :- गुणराज-खाँन कैल श्रीकृष्णविजय। ताँहा एकवाक्य ताँर आछे प्रेममय ॥ 99 ॥ अनुवाद-इन गुणराज खाँनने श्रीकृष्णविजय नामक ग्रन्थकी रचना की है। उस ग्रन्थमें श्रीकृष्णके प्रति उनके हृदयके प्रेमको प्रकाशित करनेवाला एक वाक्य है॥99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'श्रीकृष्णविजय'-एक विशेष ग्रन्थ। बहुतसे लोगोंने विवेचना की है कि यह ग्रन्थ ही बङ्गला-भाषाका सर्वप्रथम पद्य-काव्य-ग्रन्थ है ॥ 99 ॥ अनुभाष्य-“आदिकवि गुणराज खाँन महाशय तेरह सौ पिचानवें (1395) शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना । 13