श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1460, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेमें नियुक्त हुए और चौदह सौ दो (1402) शकाब्दमें ग्रन्थको समाप्त किया।” “श्रीकृष्णविजय-ग्रन्थकी रचना अति सरल है, यहाँ तक कि, बङ्गालकी अर्द्धशिक्षित महिलाएँ और साधारण वर्णज्ञान जाननेवाले निम्नश्रेणीके व्यक्ति भी इस ग्रन्थको अनायास ही पढ़ और समझ सकते हैं। इस ग्रन्थकी भाषा अलंकृत नहीं है, इसके पद्य अनेक स्थानोंपर अधिक मधुर भी नहीं हैं। चौदह अक्षरोंवाले पयारमें अनेक स्थानोंपर सोलह-सत्रह अक्षर अथवा बारह-तेरह अक्षर दिखलायी देते हैं। इसके अनेक शब्द ही उस कालमें व्यवहारमें आनेवाले शब्द हैं। उन सब शब्दोंके अर्थ केवल राढ़देशवासी लोग ही समझ सकते हैं। इस पुस्तकका अभाव रहनेपर किसी बङ्गाली पुस्तकालयको 'सम्पूर्ण' नहीं कहा जा सकता।” “यह ग्रन्थ पारमार्थिक-लोगोंके लिये परम आदरणीय है। वैष्णवोंमें अग्रणी पूज्यपाद श्रीगुणराज-खाँन महाशयने सर्वशास्त्र-शिरोमणि श्रीमद्भागवत-ग्रन्थके दसवें और ग्यारहवें स्कन्धका साधारण व्यक्तियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य अनुवाद करके इस ग्रन्थकी रचना की है। इस कारण वैष्णव-जगत्में यह ग्रन्थ सर्वत्र पूजनीय है। जिस ग्रन्थको पढ़कर महाप्रभुने इतनी प्रशंसा की है, वह ग्रन्थ गौड़ीय-वैष्णव-समाजमें कितना आदर प्राप्त करेगा, यह कहनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये यह काव्य बङ्गालवासियोंके लिये बहुत ही आदरणीय धन है; विशेषतः कोई-कोई कहते हैं, - यह ग्रन्थ ही बङ्गलाभाषाका सर्वप्रथम काव्य है।” “श्रीश्रीमहाप्रभुके आविर्भावसे दो वर्ष पूर्व 1405 शकाब्दमें श्रीदेवानन्द वसुके हाथसे यह ग्रन्थ लिखा गया है।” (श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-लिखित 'श्रीकृष्ण-विजय'- ग्रन्थकी 'प्रस्तावना'से उद्धृत)। “बङ्गालके सम्राट आदिशूर कान्यकुब्जसे पाँच सु-ब्राह्मणोंके साथ जिन पाँच सु-कायस्थोंको लाये थे, उनमेंसे दशरथ वसु एक थे; उन्हींके ही वंशमें तेरहवीं पीढ़ीमें श्रीगुणराज-खाँन उत्पन्न हुए। इनका वास्तविक नाम-श्रीमालाधर वसु है, 'गुणराज खाँन' इन्हें गौड़ीय सम्राटके द्वारा प्रदान की गयी उपाधि है। दशरथ वसुकी वंश परम्परा इस प्रकार है:-
- दशरथ वसु, 2) कुशल, 3) शुभशङ्कर, 4) हंस, 5) शक्तिराम (बागाण्डा), मुक्तिराम (माइनगर) और अलङ्कार (बङ्गज);
- मुक्तिराम, 6) दामोदर, 7) अनन्तराम, 8) गुणीनायक और वीणानायक;
- गुणीनायक, 9) माधव, 10) लक्ष्मीनाथ, चक्रपाणि, उदयचाँद, लौह, तौहु, श्रीपति और अच्युतानन्द;
- श्रीपति, 11) यज्ञेश्वर, त्रिलोचन, वटेश्वर, प्रजापति, ईशान, सागर और कृपाराम;
- यज्ञेश्वर, 12) भगीरथ, कामेश्वर, सदानन्द और वशिष्ठ;
- भगीरथ, 13) मालाधर वसु-(उपाधि-गुणराज खाँन)। गुणराज खाँनके चौदह पुत्र थे, उनमेंसे दूसरे लक्ष्मीनाथवसुकी उपाधि-श्रीसत्यराज खाँन है; उन्हींके पुत्र-श्रीरामानन्द वसु हैं, इसलिये श्रीरामानन्द वसु-पन्द्रहवीं पीढ़ीके हैं। श्रीमालाधर वसु महाशय अतिप्रसिद्ध धनशाली व्यक्ति थे। उनके गढ़ और देवालय (मन्दिर) आदिका दर्शन करनेसे लगता है, उनकी राजश्री (अर्थात् राज्यकी धन-सम्पत्ति) अत्यन्त समृद्धिशाली थी। गुणराज खाँन महाशयके एक सामाजिक साहसका परिचय इस कार्यसे मिलता है। उन्होंने बलाल सेनसे कुल परम्पराके माध्यमसे चली आ रही प्रथाको सारहीन जानकर अपने पुत्र पुरन्दर खाँनके भी अनुरोधको अस्वीकार करके कान्यकुब्जसे आये श्रीपुरुषोत्तम दत्त-वंशीय तेरहवीं पीढ़ीके श्रीपति दत्त महाशयकी कन्याके साथ अपने ज्येष्ठ पुत्रके विवाहका कार्य सम्पन्न किया था।” (1292 बङ्ग-वर्षके (1886 ई.) शीतकालमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरके द्वारा श्रीकुलीनग्राम-पाटसे संगृहीत) ॥99॥ 14 |