श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1461, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/100-106 ] ग्रन्थके एक वाक्यसे महाप्रभुका उनके वंशके हाथों स्वयंको बेचना :- 'नन्दनन्दन कृष्ण-मोर प्राणनाथ।' एइ वाक्ये बिकाइनु ताँर वंशेर हात ॥ 100 ॥ अनुवाद- 'नन्दनन्दन कृष्ण मेरे प्राणनाथ हैं' - गुणराज खाँनके इस वाक्यके कारण मैं उनके वंशके हाथोंमें बिक गया हूँ ॥ 100 ॥ अनुभाष्य- मूलपद्य यह है- "एकभावे वन्द हरि जोड़ करि' हात। नन्दनन्दन कृष्ण-मोर प्राणनाथ ॥" 100 ॥ श्रीमुखसे कुलीन-ग्रामके माहात्म्यका वर्णन :- तोमार कि कथा, तोमार ग्रामेर कुक्कुर। सेह मोर प्रिय, अन्यजन रहु दूर ॥ 101 ॥ अनुवाद- आप लोगोंकी तो बात ही क्या, आपके ग्रामका कुत्ता भी मेरा प्रिय है। तब अन्य लोगोंके बारेमें क्या कहना है ॥ 101 ॥ दोनोंकी गृहस्थ-वैष्णवके कर्त्तव्य और साध्यकी जिज्ञासा :- तबे रामानन्द, आर सत्यराज खाँन। प्रभुर चरणे किछु कैल निवेदन ॥ 102 ॥ “गृहस्थ विषयी आमि, कि मोर साधने। श्रीमुखे करेन आज्ञा, निवेदि चरणे ॥” 103 ॥ अनुवाद- तब श्रीरामानन्द और श्रीसत्यराज खाँनने महाप्रभुके चरणोंमें कुछ निवेदन किया, - “हम गृहस्थ हैं और विषयोंमें लिप्त हैं, इसलिये हम नहीं जानते कि परमार्थके लिये हमें क्या साधन करना चाहिये। हम आपके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हैं कि इस विषयमें आप हमें श्रीमुखसे निर्देश प्रदान कीजिये ॥” 102-103 ॥ महाप्रभुका उत्तर :- प्रभु कहेन, - ‘'कृष्णसेवा', 'वैष्णव-सेवन'। निरन्तर कर कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥' 104 ॥ अनुवाद- महाप्रभुने कहा, - 'निरन्तर श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्त्तन करो और जब भी सम्भव हो 'श्रीकृष्णसेवा', और 'वैष्णव-सेवा' करो ॥' 104 ॥ श्रीसत्यराजकी वैष्णवको पहचाननेके उपायकी जिज्ञासा :- सत्यराज बले, - “वैष्णव चिनिब केमने? के वैष्णव, कह ताँर सामान्य लक्षणे ॥” 105 ॥ अनुवाद- श्रीसत्यराज खाँनने कहा, - “हम वैष्णवको कैसे पहचानेंगे? कौन वैष्णव है, कृपया उसके सामान्य लक्षण बतलाइये ॥” 105 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'कनिष्ठ-वैष्णव'के लक्षणका निर्देश :- प्रभु कहे, - “याँर मुखे शुनि एकबार। कृष्णनाम, सेइ पूज्य, -श्रेष्ठ सबाकार ॥ 106 ॥ अनुवाद- महाप्रभुने कहा, - “जिसके मुखसे एकबार भी श्रीकृष्णनाम सुनायी दे, वही पूज्य है और सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति है ॥ 106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीरामानन्द वसु और उनके पिता श्रीसत्यराज खाँन, - ये बङ्गदेशके उज्ज्वल कायस्थ-वसुवंशमें उत्पन्न गृहस्थ-वैष्णव थे। इन्होंने महाप्रभुसे जिज्ञासा की, - 'गृहस्थ वैष्णवोंके लिये साधनका कर्त्तव्य क्या है?' महाप्रभुने उत्तर दिया, - 'कृष्णसेवा, वैष्णवसेवा एवं निरन्तर कृष्णनाम कीर्त्तन ही गृहस्थ वैष्णवोंका एकमात्र कार्य है।' इसपर श्रीसत्यराजने प्रश्न किया, - 'श्रीकृष्णसेवा और श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनको तो सहजमें ही समझा जा सकता है, किन्तु वैष्णवको पहचान नहीं पानेसे वैष्णव-सेवनरूपी कार्य बहुत ही कठिन होता है। इसलिये हे प्रभो, वैष्णव कौन है और उसके सामान्य (साधारण) लक्षण क्या हैं?' महाप्रभुने उत्तर दिया, - 'जिसके मुखसे एकबार कृष्णनाम सुना जाता है, वही सबसे श्रेष्ठ और पूज्य-वैष्णव है ॥' 102-106 ॥ अनुभाष्य- एकमात्र श्रीकृष्णनामसे सर्वसिद्धि होती है, - ऐसे श्रद्धावान् व्यक्तिको 'वैष्णव' कहकर जानना; क्योंकि ऐसी श्रद्धा ही वैष्णव होनेकी प्रारम्भिक योग्यता । 15