भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1462, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1462

[ 15/106-107 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रदान करती है। किन्तु ऐसा होनेपर भी श्रीकृष्णनाममें उसकी कोमल श्रद्धाके प्रकट होनेके कारण वह निरन्तर नाम ग्रहण नहीं करता। श्रीरूपगोस्वामिप्रभुने स्व-लिखित 'उपदेशामृत'में कहा है,—“कृष्णेति यस्य गिरि तं मनसाद्रियेत दीक्षास्ति चेत्”—जो श्रीनामको अप्राकृत चिन्तामणि, कृष्णचैतन्य-रसविग्रह, पूर्ण, शुद्ध, नित्यमुक्त और नाम-नामीको अभेद जानकर परम श्रद्धाके साथ अर्चन करते हैं, परन्तु अपनी बद्धावस्थाके कारण भक्तिसिद्धान्तविचार-रहित होकर भक्तिके उपादान (अङ्गों)को और शुद्धभक्तको सम्पूर्ण 'अप्राकृत'के रूपमें समझ नहीं पाते, वे भी शुद्धभक्त और श्रीगुरुकी सेवासे एवं उनके मुखसे शुद्धभक्तिसिद्धान्तके श्रवणके फलसे क्रमशः सब प्रकारके पापोंके नष्ट होनेपर अप्राकृत अनुभूति अथवा दिव्य-सम्बन्धज्ञान प्राप्त करते हैं। (भागवत 11/2/47)— “अर्चायामेव हरये यः पूजां श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ” [अर्थात् “जो लौकिक और पारिवारिक प्रथाके अनुसार परम्परागत श्रद्धाके साथ अर्चा-मूर्तिमें श्रीहरिकी पूजा करते हैं, परन्तु शास्त्र-अनुशीलनके द्वारा शुद्धभक्तितत्त्वको नहीं जाननेके कारण हरिभक्तोंकी पूजा नहीं करते, वे—'प्राकृत भक्त' हैं अर्थात् उन्होंने अभी भक्तिपर्व आरम्भ मात्र ही किया है। उन्हें 'भक्तप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' शब्दोंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है।”] श्रीसनातन-शिक्षामें (मध्यलीला 22/64, 67, 68 संख्यामें)— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ, श्रद्धा-अनुसारि ॥ 64 ॥ याहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन। क्रमे-क्रमे तेंह भक्त हइबे उत्तम ॥ 67 ॥ रतिप्रेम-तारतम्ये भक्ति-तरतम।” 68क। [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं। श्रद्धाके अनुसार ही वे 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ' अधिकारके भक्त होते हैं। जिसकी श्रद्धा कोमल और आसानीसे बदलनेवाली है, वह कनिष्ठ-अधिकारी है। परन्तु भक्तिकी प्रक्रियाका पालन करनेपर क्रमशः वह भी 'उत्तम' भक्तके स्तरपर पहुँच जाता है। रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है।”] 'सबाकार श्रेष्ठ'—अर्थात् देवीधाममें सर्वश्रेष्ठ। पुण्यकर्मियों और ज्ञानियोंकी अपेक्षा भी श्रीविष्णुनामसे युक्त मन्त्रका अर्चनकारी कनिष्ठ भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि कर्मी अथवा ज्ञानी—वे जितने भी श्रेष्ठ क्यों न हो—उनका वास्तव-वस्तु श्रीविष्णुकी नित्यसेवा करनेमें विश्वास नहीं होता। इसलिये मुखसे वेदोंको माननेपर भी वे वास्तवमें नास्तिक हैं। और श्रीविष्णुके अर्चक, अप्राकृत-भजनराज्यमें उनकी थोड़ीसी भी महिमा क्यों न हो, अन्ततः वे श्रीविष्णुके अर्चाके वास्तव-सत्यविग्रह होनेको श्रीगुरुके मुखसे सुनकर उसके प्रति श्रद्धावान् तो हैं ॥ 106 ॥ एक श्रीकृष्णनामके फलकी महिमाका वर्णन :— एक कृष्णनामे करे सर्वपाप क्षय। नवविधा भक्ति पूर्ण नाम हैते हय ॥ 107 ॥ अनुवाद—एक श्रीकृष्णनामके उच्चारणसे व्यक्तिके सभी पापोंका नाश हो जाता है। श्रीकृष्णनामके कीर्तनसे ही नवधा-भक्तिके सभी अङ्गोंका पालन हो जाता है ॥ 107 ॥ अनुभाष्य— 'नवविधा भक्ति'—(भाः 7/5/23)— “श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेत्रवलक्षणा।” [अर्थात् “श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—ऐसी नौ लक्षणोंवाली भक्तिको जो विष्णुमें साक्षात् अर्पण करते हैं, वे ही शास्त्रोंके उत्तम पण्डित हैं।”] नामापराधका त्यागकर एकमात्र श्रीकृष्णनामके आश्रयसे 16 |