भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1463, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1463

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/107-108 ] ही सब प्रकारके पापोंके नष्ट होनेपर जीवकी पुण्य-पापमूलक प्राकृत भोगवासना सम्पूर्ण रूपसे नष्ट हो जाती है। श्रीनाम ग्रहण करनेवाला ही सबसे श्रेष्ठ और पूजनीय है। श्रीनाम-भजनसे ही नवधा भक्ति पूर्णताको प्राप्त करती है (“यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा कीर्त्तनाख्यभक्ति-संयोगेनैव” [अर्थात् “यद्यपि कलियुगमें भक्तिके अन्य अङ्गोंका पालन कर्त्तव्य है, तथापि कीर्त्तनके संयोगसे उनका पालन करना चाहिये।”]—भक्तिसन्दर्भ 173 संख्या) ॥ 107 ॥ श्रीनाम 'स्वयं ही प्रभु-श्रीकृष्ण' होनेके कारण अन्य कार्योंसे निरपेक्ष :— दीक्षा-पुरश्चर्या-विधि अपेक्षा ना करे। जिह्वा-स्पर्शे आचण्डाले सबारे उद्धारे ॥ 108 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनाम दीक्षा और पुरश्चर्या-विधिकी अपेक्षा नहीं रखते, जिह्वासे स्पर्श होने मात्रसे ही चण्डाल तक सभीका उद्धार कर देते हैं॥ 108 ॥ अनुभाष्य—'दीक्षा'—श्रीजीवप्रभुके भक्तिसन्दर्भमें 283 संख्यामें उद्धृत आगमवाक्य— “दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्। तस्मात् दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥” अर्थात् “जिससे अप्राकृत दिव्यज्ञानका उदय और पापोंका सम्पूर्ण रूपसे नाश होता है, तत्त्वशास्त्रविद् पण्डितोंने उसे ही 'दीक्षा' कहकर वास्तविक रूपमें संज्ञा प्रदान की है।” 'दीक्षा-विधि'—(हःभःविः दूसरा विः और भक्तिसन्दर्भमें 283 संख्यामें उद्धृत आगम-वचन)— “द्विजानामनुपेतानां स्वकर्माध्ययनादिषु। यथाधिकारो नास्तीह स्याच्चोपनयनादनु। तथात्रादीक्षितानां तु मन्त्रदेवाच्चर्चनादिषु। नाधिकारोऽस्त्यतः कुर्यादात्मानं शिवसंस्तुतम्॥” अर्थात् “उपवीत (जनेऊ) रहित ब्राह्मणका जिस प्रकार स्वकर्म अध्ययन आदिमें अधिकार नहीं होता, उपवीत-ग्रहण करनेके बाद ही अधिकार होता है, उसी प्रकार अदीक्षित व्यक्तिका भी मन्त्रदेवताकी पूजादिमें अधिकार नहीं होता। इसलिये आत्माको मङ्गलमय करनेके उद्देश्यसे अपना कल्याण चाहनेवाले 'दीक्षा' ग्रहण करेंगे।” कारण, (हःभःविः, दूसरे विःमें उद्धृत विष्णु-यामल-वचन)— “अदीक्षितस्य वामोरु कृतं सर्वं निरर्थकम्। पशुयोनिमवाप्नोति दीक्षाविरहितो जनः॥” [अर्थात् “हे वामोरु! दीक्षा-रहित व्यक्तिके द्वारा किये गये सभी अनुष्ठान ही निरर्थक होते हैं। दीक्षारहित व्यक्ति पशु-योनि प्राप्त करता है।”] (हःभःविः और भक्तिसन्दर्भकी 283 संख्यामें उद्धृत यामल अथवा आगम-वचन)— “अतो गुरुं प्रणम्यैवं सर्वस्वं विनिवेद्य च। गृह्णीयाद्वैष्णवं मन्त्रं दीक्षा-पूर्वं विधानतः॥” [अर्थात् “इसलिये श्रीगुरुदेवको प्रणाम करके सर्वस्व समर्पण करके दीक्षापूर्वक (दिव्यज्ञान प्राप्त करके) यथाविधि वैष्णवमन्त्र ग्रहण करने चाहिये।”] (भक्तिसन्दर्भ 298 संख्यामें उद्धृत तत्त्वसागर-वचन)— “यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानतः। तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्॥” [अर्थात् “जिस प्रकार कांसा रासायनिक विधिसे स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार दीक्षाके विधानके द्वारा मानवको ब्राह्मणता प्राप्त होती है।”] ‘पुरश्चर्या’—(हःभःविः, सतरहवें विः में उद्धृत अगस्त्य-संहिता-वचन)— “पूजा त्रैकालिकी नित्यं जपस्तर्पणमेव च। होमब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते॥ गुरोलब्धस्य मन्त्रस्य प्रसादेन यथाविधि। पञ्चाङ्गोपासना-सिद्धयै पुरश्चैतद्विधीयते॥” अर्थात् “प्रातः, दोपहर और सन्ध्या,—इन तीनों कालोंमें नित्य पूजा, नित्य जप, नित्य तर्पण, नित्य होम और नित्य ब्राह्मण-भोजन,—इन पाँच अङ्गोंको 'पुरश्चरण' । 17

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