श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 15/108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कहते हैं। गुरुकी कृपासे प्राप्त मन्त्रोंकी सिद्धिके लिये सर्वप्रथम उपरोक्त पाँच अङ्गोंकी उपासनाका विधान है, इसलिये यह क्रिया पुरश्चरण-नामसे जानी जाती है।” 'पुरश्चर्या-विधि'-(हःभःविः सतरहवें विः में उद्धृत आगम-वचन)— “बिना येन न सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि। कृतेन येन लभते साधको वाञ्छितं फलम्॥ पुरश्चरणसम्पन्नो मन्त्रो हि फलदायकः। अतः पुरस्क्रिया कुर्यात् मन्त्रवित् सिद्धिकाङ्क्षया॥ पुरस्क्रिया हि मन्त्राणां प्रधानं वीर्यमुच्यते। वीर्यहीनो यथा देही सर्वकर्मसु न क्षमः। पुरश्चरणहीनो हि तथा मन्त्रः प्रकीर्त्तितः॥” [अर्थात् “जिसके बिना सैकड़ों वर्षोंमें भी मन्त्रसिद्धि नहीं होती और जिसका अनुष्ठान करनेसे साधक वाञ्छित फल प्राप्त करता है, वह पुरश्चरण-सम्पन्न मन्त्र ही फल प्रदान करनेवाला होता है—इसलिये सिद्धि प्राप्तिके लिये मन्त्रविद् व्यक्ति पुरश्चरण करेंगे। पुरस्क्रिया मन्त्रसमूहकी प्रधान शक्ति कहलाती है। बलहीन व्यक्ति जिस प्रकार सभी कार्योंमें असमर्थ होता है, पुरश्चरण रहित मन्त्र भी उसी प्रकार कहा गया है।”] श्रीजीवप्रभु (“भक्तिसन्दर्भ”में 283 संख्या)— “यद्यपि श्रीभागवतमते पञ्चरात्रादिवत् अर्चनमार्गस्य आवश्यकत्वं नास्ति, तद्विनापि शरणापत्त्यादीनामेकतरेणापि पुरुषार्थसिद्धेरभिहितत्वात्, तथापि श्रीनारदादि-वर्त्मानुसरद्भिः श्रीभगवता सह सम्बन्धविशेषं दीक्षाविधानेन श्रीगुरुचरण-सम्पादितं चिकीर्षद्भिः कृतायां दीक्षायामर्चनमवश्यं क्रियतेव।” एवं (“भक्तिसन्दर्भ”में 284 संख्या)— “(दीक्षाद्यपेक्षा) यद्यपि स्वरूपतो नास्ति, तथापि प्रायः स्वभावतो देहादिसम्बन्धेन कदर्यशीलानां विक्षिप्तचित्तानां जनानां तत्तत्सङ्कोचीकरणाय श्रीमदृषिप्रभृतिभिरत्रार्चनमार्गे क्वचित् क्वचित् काचित् काचिन्मर्यादा स्थापितास्ति।” रामार्चनचन्द्रिकामें— “विनैव दीक्षां विप्रेन्द्र पुरश्चर्यां विनैव हि। विनैव न्यासविधिना जपमात्रेण सिद्धिदा॥” [अर्थात् “यद्यपि भागवतके मतानुसार पञ्चरात्रादिकी भाँति अर्चनमार्गकी आवश्यकता नहीं है और अर्चनके बिना भी आत्मनिवेदनादि किसी एक अङ्गके द्वारा भी पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, ऐसा कहा जाता है, तथापि श्रीनारदादि महाजनोंके पथके अनुसार जो लोग श्रीगुरुके द्वारा सम्पादित दीक्षाके विधानके द्वारा भगवान्के साथ विशेष सम्बन्ध स्थापित करनेके इच्छुक हैं, वे दीक्षाके अनुष्ठानके बाद अवश्य ही अर्चन करेंगे। यद्यपि स्वरूपतः दीक्षाकी अपेक्षा नहीं है, तथापि देहादिके सम्बन्धके कारण कु-स्वभावसे युक्त विक्षिप्त चित्तवाले व्यक्तियोंकी वैसी प्रवृत्तिको सङ्कुचित करनेके लिये श्रीनारद ऋषि आदि महापुरुषोंने इस अर्चन मार्गमें किसी-किसी स्थानपर कोई-कोई मर्यादा स्थापित की है। श्रीरामार्चन-चन्द्रिकामें कहा गया है,—हे विप्रवर ! यह मन्त्र-दीक्षा, पुरश्चरण और न्यासविधानके बिना ही जपमात्रसे सिद्धि प्रदान किया करता है।”] 'नामकी दीक्षा-विधिकी निरपेक्षता'—पाञ्चरात्रिक मन्त्र अप्राकृत ज्ञानको उदित कराके प्राकृत-अभिनिवेशको ध्वंस करता है। अप्राकृत होनेसे मन्त्र और देवतामें अभिन्न बुद्धि होती है। नाम और मन्त्रमें 'शब्द-सामान्य' (इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाले मनोकल्पित अन्य साधारण शब्दोंके समान, ऐसी) बुद्धि करनेपर नरकमें वास होता है। अप्राकृत बुद्धिसे ही मन्त्रदेवताके अर्चनका विधान है। दीक्षाके समय शास्त्रोंके विधानानुसार ही मन्त्र-ग्रहणकी विधि है; किन्तु श्रीकृष्णनाम,-बद्ध और मुक्त, दोनोंके लिये ही आदरणीय हैं, अर्थात् बद्ध व्यक्ति श्रीकृष्णनाम-ग्रहण करनेपर प्राकृतज्ञानसे मुक्त होते हैं, दूसरी ओर, मुक्त होनेपर ही शुद्धकृष्णनाम ग्रहण कर सकते हैं। (आदिलीला 7/73 संख्या)— “कृष्णमन्त्र हैते हय संसार-मोचन। कृष्णनाम हैते पाबे कृष्णेर चरण॥” [अर्थात् “श्रीकृष्णमन्त्रके (गुरुसे प्राप्त दीक्षामन्त्रके) जपसे इस भौतिक संसारसे मुक्ति मिल जाती है (अर्थात्
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