भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1465

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/108–110 ] अपने स्वरूपका ज्ञान होता है) और श्रीकृष्णनामसे (मुख्य फल प्रेमके द्वारा) श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवाकी प्राप्ति होती है।"] श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीकृष्णनाम साक्षात् महामन्त्र होनेके कारण किसी पाञ्चरात्रिक विधानके अनुगत नहीं है। 'नामकी पुरश्चर्या-विधि-निरपेक्षता'—मन्त्रसिद्धिके लिये ही पुरश्चरणकी व्यवस्था है; श्रीनाम-महामन्त्रको वैसी पुरश्चरण विधिकी अपेक्षा नहीं करनी पड़ती। एकबार नामके उच्चारणके फलसे ही जब पुरश्चर्याके द्वारा प्राप्त होनेवाले सभी फलोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये श्रीनामको पुरश्चरणकी अपेक्षा नहीं है। 'नामके जिह्वासे स्पर्श होनेसे ही उद्धार-साधन'—यहाँ जिह्वा-शब्दसे 'सेवोन्मुख' जिह्वाको ही समझना चाहिये, अन्यथा सांसारिक भोगोन्मुख जिह्वापर अपराधोंके विद्यमान रहनेके कारण उसपर श्रीकृष्णनाम कभी भी उदित नहीं होते—(भःरःसिः, पूःविः साधनभक्ति-लहरीमें)— “अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥” [अर्थात् “इसलिये श्रीकृष्णनामादि प्राकृत इन्द्रियोंकी ग्राह्य वस्तु नहीं हो सकती। सेवोन्मुख अवस्थामें श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीलादि भक्तकी अप्राकृत जिह्वा, चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्वयं प्रकाशित होते हैं।”] मध्यलीला 17/134 संख्या— “अतएव कृष्णेर 'नाम', 'देह', 'विलास'। प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय स्वप्रकाश॥” [अर्थात् “इसलिये श्रीकृष्णके 'नाम', उनकी 'देह' और उनके 'विलास' प्राकृत (जड़ीय) इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं हैं, अपितु स्वयं प्रकाशित होनेवाले हैं।”] (भक्तिसन्दर्भ 256–276 और 283 संख्या देखें)। अन्त्यलीला 3/59–69, 75, 80, 176–180, 182–187; 20/11, 13 संख्या और भाः 1/1/14, 6/2/29, 39 संख्या देखें॥ 108 ॥ संसार-क्षय—गौण फल, श्रीकृष्णप्रेम ही श्रीनामका मुख्य फल :— अनुषङ्ग-फले करे संसाररे क्षय। चित्त आकर्षिया कराय कृष्णे प्रेमोदय॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनाम जपके आनुषङ्गिक फलसे भक्तका संसारका बन्धन कट जाता है। तब उसका चित्त श्रीकृष्णके प्रति आकर्षित होता है और हृदयमें सुप्त श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता है॥ 109 ॥ सेवोन्मुखका श्रीकृष्णनाम :— पद्यावली (29)में उद्धृत श्रीलक्ष्मीधरकृत 'नामकौमुदी'-श्लोक— आकृष्टः कृतचेतसां सुमनसामुच्चाटनं चांहसा- माचण्डालममूकलोकसुलभो वश्यश्च मुक्तिश्रियः। नो दीक्षां न च सत्क्रियां न च पुरश्चर्यां मनागीक्षते मन्त्रोऽयं रसनास्पृगेव फलति श्रीकृष्णनामात्मकः॥ 110 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बहु-सुकृतिशाली साधुओंके चित्तके आकर्षण-स्वरूप, पापनाशक, चण्डालसे आरम्भ करके (गूँगेके अतिरिक्त) सभी लोगोंके लिये सुलभ, मुक्तिरूपी ऐश्वर्यको वशीभूत करनेवाले,—ऐसे श्रीकृष्णनाम-स्वरूप यह महामन्त्र जिह्वाके स्पर्शमात्रसे ही फल प्रदान करता है, दीक्षादि सत्कार्य अथवा पुरश्चरण, इन सबकी लेशमात्र भी अपेक्षा नहीं करता॥ 110 ॥ अनुभाष्य— श्रीकृष्णनामात्मकः अयं मन्त्रः कृतचेतसां (मुक्तकुलानां) सुमहतां (त्रिगुणातीतानां, 'सुमनसाम्' इति पाठे—मनस्विनाम्) आकृष्टः (आकर्षकः, 'आकृष्टीकृतचेतसाम्' इति पाठे आकृष्टीकृतं चेतो येषां तेषाम्), अंहसां (प्राकृताभिनिवेशज-चेष्टानां पुण्यपापानाम्) उच्चाटनम् (उन्मूलनम्) आचण्डालं (चण्डाल-पर्यन्तम्) अमूकलोकसुलभः (अमूकलोकानां मूकव्यतिरिक्तानां जनानां वाक्शक्तिमताम् एव सुलभः सहजप्राप्यः इत्यर्थः), मुक्तिश्रियः (मोक्षाश्रयचिन्तामणि-स्वरूपस्य) वश्यः (वशीकारकः) च; (स चायं नाम-महामन्त्रः) दीक्षां (पापनाश-दिव्यज्ञान- । 19