भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1466

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[ 15/110-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[ बायाँ स्तम्भ (Left Column) ]

विधायकसाधनमयीं) सत्क्रियां (फलसिद्धार्थां दक्षिणां पुरश्चर्यां च पञ्चाङ्गोपासनात्मिकां क्रियां) मनाक् (ईषत्) अपि न ईक्षते (नापेक्षते, परं तु) रसनास्पृक् (सेवोन्मुख-जिह्वा-स्पर्श-मात्रेण एव) फलति (फलप्रदो भवति)।

श्लोक-भावानुवाद— श्रीकृष्णनामात्मक यह मन्त्र त्रिगुणातीत ('सुमनसाम्' इस पाठसे अर्थ होगा मनस्विनाम्) मुक्तकुलजनोंको आकृष्ट करनेवाला ('आकृष्टीकृतचेतसाम्' इस पाठके द्वारा अर्थ होगा जिनके चित्तको आकृष्ट किया है, उनकी) प्राकृत-अभिनिवेशके द्वारा पुण्य-पाप चेष्टाओंका उन्मूलन करनेवाला, चण्डाल तक गूँगेके अतिरिक्त सभी लोगोंके लिये सुलभ, मोक्षरूपी चिन्तामणिके ऐश्वर्यको वशीभूत करनेवाला यह नाम-महामन्त्र दीक्षा (पापनाशक दिव्यज्ञान), फलकी सिद्धिके लिये पुरश्चर्या और पञ्चाङ्गोपासनात्मक क्रियाओंकी लेशमात्र भी अपेक्षा नहीं रखता है तथा सेवोन्मुख जिह्वाके स्पर्श-मात्रसे ही फल प्रदान करता है॥110॥

'कनिष्ठ-वैष्णव'का लक्षण :— अतएव याँर मुखे एक कृष्णनाम। सेइ त' वैष्णव, करिह ताँहार सम्मान॥"111॥

अनुवाद— इसलिये जिसके मुखमें एक बार भी श्रीकृष्णनाम उदित हुआ है, वही वैष्णव है, उसका सम्मान करना॥"111॥

अमृतप्रवाह भाष्य— इसलिये गृहस्थ लोगोंके लिये एक श्रीकृष्णनामपरायण वैष्णवकी सेवा करनेसे ही वैष्णवसेवा-कार्यकी सिद्धि होती है; 'मन्त्र-दीक्षित वैष्णव'को यहाँपर विचारमें नहीं लाया गया है। इसका कारण यह है कि, विष्णुमन्त्रमें दीक्षित बहुतसे व्यक्तियोंको तत्त्वज्ञान नहीं होनेके कारण वे मायावाद आदि दोषोंसे दूषित हो सकते हैं, किन्तु नामापराधशून्य श्रीकृष्णनाम-उच्चारणकारी वैष्णवमें उन सब दोषोंके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मन्त्र-दीक्षित व्यक्ति-वैष्णवप्राय हैं, किन्तु जिन्होंने निरपराध होकर एक बार श्रीकृष्णनाम किया है, वे


[ दायाँ स्तम्भ (Right Column) ]

सबसे कनिष्ठ होनेपर भी 'शुद्ध वैष्णव' हैं, —गृहस्थ-वैष्णव उस प्रकारके वैष्णवकी ही सेवा करेंगे॥111॥

अनुभाष्य— श्रील रूपप्रभुने स्व-लिखित श्रीउपदेशामृतमें कहा है—"कृष्णेति यस्य गिरि तं मनसाद्रियेत दीक्षास्ति चेत्" अर्थात् सद्गुरुसे दीक्षा-प्राप्त व्यक्ति अप्राकृत श्रद्धायुक्त होकर मुखसे श्रीकृष्णनाम उच्चारण करता है, मध्यमाधिकारी उसका मन-ही-मनमें आदर करेंगे—यही विधि है॥111॥

तीन प्रधान खण्डवासी :— खण्डेर मुकुन्ददास, श्रीरघुनन्दन। श्रीनरहरि,—एइ मुख्य तिन जन॥112॥

अनुवाद— खण्डवासियोंमें श्रीमुकुन्द दास, श्रीरघुनन्दन और श्रीनरहरि—ये तीन लोग मुख्य हैं॥112॥

महाप्रभुके द्वारा श्रीमुकुन्ददाससे श्रीरघुनन्दनके साथ उनके सम्बन्धकी जिज्ञासा :— मुकुन्द दासेरे पुछे शचीर नन्दन। “तुमि—पिता, पुत्र तोमार—श्रीरघुनन्दन?॥113॥ किवा रघुनन्दन—पिता, तुमि—तार तनय? निश्चय करिया कह, याउक संशय॥”114॥

अनुवाद— श्रीशचीनन्दनने श्रीमुकुन्द दाससे पूछा,—"आप पिता हैं और रघुनन्दन आपके पुत्र हैं? अथवा रघुनन्दन आपके पिता हैं और आप उनके पुत्र हैं? आप निश्चय करके बतलाइये, जिससे मेरा संशय दूर हो सके॥"113-114॥

श्रीरघुनन्दनको कृष्णभक्त जानकर अमानी मानद श्रीमुकुन्दका पुत्रबुद्धिका त्याग और गुरु-बुद्धि रखना :— मुकुन्द कहे,—“रघुनन्दन आमार 'पिता' हय। आमि तार 'पुत्र', —एइ आमार निश्चय॥115॥ आमा सबार कृष्णभक्ति रघुनन्दन हैते। अतएव पिता—रघुनन्दन, आमार निश्चिते॥”116॥

अनुवाद— श्रीमुकुन्दने कहा,—“रघुनन्दन मेरे 'पिता'


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