भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1467, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1467

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/115-124 ] हैं और मैं उनका पुत्र हूँ-मेरा यही निश्चय है। हम सबकी श्रीकृष्णभक्ति रघुनन्दनसे ही हुई है, इसलिये मेरे विचारसे रघुनन्दन मेरे पिता हैं॥" 115-116॥ श्रीमुकुन्दके सद्-उत्तरको सुनकर महाप्रभुको हर्ष, 'सद्गुरु' अथवा 'वास्तविक पिता'की संज्ञा :- शुनि' हर्षे कहे प्रभु, - "कहिले निश्चय। याँहा हैते कृष्णभक्ति सेइ गुरु हय ॥" 117 ॥ अनुवाद-श्रीमुकुन्ददासके सद्-उत्तरको सुनकर महाप्रभु प्रसन्न हुए और उनका समर्थन करते हुए कहा, - "आपने ठीक ही कहा है। जिनसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति होती है, वही गुरु होते हैं॥" 117॥ भक्तके जयगानमें मत्त भगवान् :- भक्तेर महिमा कहिते प्रभु पाय सुख। भक्तेर महिमा कहिते हय पञ्चमुख ॥ 118 ॥ अनुवाद-भक्तोंकी महिमाको कहते हुए महाप्रभुको बहुत प्रसन्नता हो रही थी। भक्तोंकी महिमा कहते समय मानो वे पाँच मुखवाले हो गये थे॥ 118॥ भक्तोंके समक्ष श्रीमुकुन्दके श्रीकृष्णप्रेमका वर्णन :- भक्तगणे कहे, - "शुन मुकुन्देर प्रेम। निर्मल, निगूढ़ प्रेम, येन शुद्ध हेम ॥ 119 ॥ अनुवाद-महाप्रभु भक्तोंसे कहने लगे, - "मुकुन्दके श्रीकृष्णप्रेमके विषयमें सुनो। यह प्रेम अति गहरा और निर्मल है, शुद्ध स्वर्णसे उसकी उपमा दी जा सकती है॥ 119॥ बाहरसे लोक-व्यवहार, अन्तरमें श्रीकृष्ण-निष्ठा :- बाह्ये राजवैद्य इँहो, करे राज-सेवा। अन्तरे प्रेम इँहार जानिबेक केबा ॥ 120 ॥ अनुवाद-बाहरी रूपसे तो मुकुन्द एक राजवैद्य हैं और राज-सेवा करते हैं, किन्तु इनके हृदयमें जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसे भला कौन जान सकता है? ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि मुकुन्द साधारण लोगोंकी दृष्टिमें राजवैद्यकी नौकरी करते थे, किन्तु वास्तवमें वे सच्चे प्रेमिक भक्त (अर्थात् गृहस्थ वैष्णवके वेषमें महाभागवत परमहंस) थे; साधारण लोग उसे नहीं जान सकते थे॥ 120॥ एक दिनकी घटनाका वर्णन; श्रीमुकुन्द और बादशाहका वृत्तान्त :- एकदिन म्लेच्छ-राजा उच्च-टुङ्गिते। चिकित्सार बात कहे इँहार अग्रेते ॥ 121 ॥ हेनकाले एक मयूर-पुच्छेर आड़ानी। राज-शिरोपरि धरे एक सेवक आनि' ॥ 122 ॥ अनुवाद-एकदिन मुकुन्द म्लेच्छ-राजाके साथ ऊँचे मञ्चपर बैठकर उनकी चिकित्साके विषयमें बतला रहे थे, उसी समय राजाका एक सेवक मयूरके पंखोंसे बना एक छाता लेकर आया। राजाको धूपसे बचानेके लिये उस छातेको उनके सिरके ऊपर करके वह खड़ा हो गया॥ 121-122 ॥ अनुभाष्य - 'उच्च-टुङ्गिते' - ऊँचे स्थानपर बने छोटेसे कमरेमें। 'आड़ानी' - धूपसे बचानेवाला छाता, अथवा बहुत बड़ा पंखा ॥ 121-122 ॥ शिखिपिच्छ देखि' मुकुन्द प्रेमाविष्ट हैला। अति-उच्च टुङ्गि हैते भूमिते पड़िला ॥ 123 ॥ अनुवाद-मयूरके पंखको देखकर मुकुन्द कृष्णप्रेममें आविष्ट हो गये और उस बहुत ऊँचे मञ्चसे भूमिपर गिर पड़े॥ 123 ॥ राजार ज्ञान, -राजवैद्येर हइल मरण। आपने नामिया तबे कराइल चेतन ॥ 124 ॥ अनुवाद-कहीं राजवैद्यकी मृत्यु तो नहीं हो गयी, इस भयसे राजाने स्वयं मञ्चसे उतरकर मुकुन्दको चेतन कराया॥ 124 ॥ । 21

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