श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1468, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राजा बले,—'व्यथा तुमि पाइले कोन् ठाञि?' मुकुन्द कहे,—'अतिबड़ व्यथा पाइ नाइ॥'125॥ अनुवाद—राजाने पूछा,—'तुम्हें कहाँ पीड़ा हो रही है?' मुकुन्दने कहा,—'मुझे कोई बहुत अधिक पीड़ा नहीं हुई है॥'125॥ राजा कहे,—'मुकुन्द, तुमि पड़िला कि लागि'? मुकुन्द कहे,—'राजा, मोर व्याधि आछे मृगी॥'126॥ अनुवाद—तब राजाने पूछा,—'मुकुन्द, तुम किस कारण गिर पड़े?' मुकुन्दने कहा,—'हे राजन्, मुझे मिरगीका रोग है॥'126॥ श्रीमुकुन्दके द्वारा छल और आत्मगोपन करनेपर भी राजाके द्वारा उन्हें 'महापुरुष'के रूपमें पहचानना :- महाविदग्ध राजा, सेइ सब जाने। मुकुन्देरे हैल ताँर 'महासिद्ध'-ज्ञाने॥"127॥ अनुवाद—राजा बहुत बुद्धिमान थे, वे सब जान गये थे, इसलिये उन्होंने मुकुन्दको 'महासिद्ध'-पुरुषके रूपमें पहचान लिया॥"127॥ अनुभाष्य—'महाविदग्ध'—विशेष नीति-चतुर; 'महासिद्ध'—अलौकिक मुक्त पुरुष॥127॥ श्रीरघुनन्दनकी श्रीकृष्णसेवाका दृष्टान्त :- “रघुनन्दन सेवा करे कृष्णेर मन्दिरे। द्वारे पुष्करिणी, तार घाटेर उपरे॥128॥ कदम्बेर एक वृक्षे फुटे बारमासे। नित्य दुइ फूल हय कृष्ण-अवतंसे॥"129॥ अनुवाद—“रघुनन्दन सदा श्रीकृष्णके मन्दिरमें सेवा करता है। मन्दिरके द्वारके बगलमें एक कुण्ड है, उसके घाटपर एक कदम्बके वृक्षपर बारहों महीने नित्य दो फूल श्रीकृष्णके शृङ्गारके लिये खिलते हैं॥"128-129॥ अनुभाष्य—'अवतंसे'—भूषण या कर्णभूषण या शिरोभूषण, उसके लिये॥129॥ महाप्रभुके द्वारा उन तीनोंकी सेवाका विभाग—
- श्रीमुकुन्दकी सेवा :- मुकुन्देरे कहे पुनः मधुर वचन। “तोमार कार्य—धर्म-धन-उपार्जन॥130॥
- श्रीरघुनन्दनकी सेवा :- रघुनन्दनेर कार्य—कृष्णेर सेवन। कृष्ण-सेवा बिना इँहार अन्य नाहि मन॥131॥
- श्रीनरहरिकी सेवा :- नरहरि रहु आमार भक्तगण-सने। एइ तिन कार्य सदा करह तिन जने॥"132॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः श्रीमुकुन्दसे मधुर वचन कहे,—“तुम्हारा कार्य लौकिक और पारमार्थिक धन उपार्जन करना है। रघुनन्दनका कार्य सदा श्रीकृष्णकी सेवा करना है। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त इसका मन अन्य किसी कार्यमें नहीं है। नरहरि मेरे भक्तोंके साथमें रहे। तुम तीनों सदैव श्रीकृष्णसेवाके इन तीनों कार्योंको करो॥"130-132॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभु श्रीमुकुन्दको अत्यन्त प्रिय अन्तरङ्ग भक्तके रूपमें मानते थे; इसलिये दोनों भाइयों और पुत्रके सेवा-कार्यका विभाग करते समय श्रीमुकुन्दके धर्म और धन-उपार्जन, श्रीरघुनन्दनके श्रीमूर्तिसेवन और श्रीनरहरिके भक्तोंके साथ रहने-रूपी सेवा-भेदका निरूपण किया॥130-132॥ श्रीसार्वभौम और श्रीवाचस्पति—इन दोनोंको श्रीकृष्णसेवाका निर्देश :- सार्वभौम, विद्यावाचस्पति,—दुइ भाइ। दुइजने कृपा करि' कहेन गोसाञि॥133॥ “'दारु'-'जल'-रूपे कृष्ण प्रकट सम्प्रति। 'दरशन'-'स्नाने' करे जीवेर मुक्ति॥134॥ 'दारुब्रह्म'-रूपे—साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम। भागीरथी हन साक्षात् 'जलब्रह्म'-सम॥135॥ 22 |