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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 15/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राजा बले,—'व्यथा तुमि पाइले कोन् ठाञि?' मुकुन्द कहे,—'अतिबड़ व्यथा पाइ नाइ॥'125॥ अनुवाद—राजाने पूछा,—'तुम्हें कहाँ पीड़ा हो रही है?' मुकुन्दने कहा,—'मुझे कोई बहुत अधिक पीड़ा नहीं हुई है॥'125॥ राजा कहे,—'मुकुन्द, तुमि पड़िला कि लागि'? मुकुन्द कहे,—'राजा, मोर व्याधि आछे मृगी॥'126॥ अनुवाद—तब राजाने पूछा,—'मुकुन्द, तुम किस कारण गिर पड़े?' मुकुन्दने कहा,—'हे राजन्, मुझे मिरगीका रोग है॥'126॥ श्रीमुकुन्दके द्वारा छल और आत्मगोपन करनेपर भी राजाके द्वारा उन्हें 'महापुरुष'के रूपमें पहचानना :- महाविदग्ध राजा, सेइ सब जाने। मुकुन्देरे हैल ताँर 'महासिद्ध'-ज्ञाने॥"127॥ अनुवाद—राजा बहुत बुद्धिमान थे, वे सब जान गये थे, इसलिये उन्होंने मुकुन्दको 'महासिद्ध'-पुरुषके रूपमें पहचान लिया॥"127॥ अनुभाष्य—'महाविदग्ध'—विशेष नीति-चतुर; 'महासिद्ध'—अलौकिक मुक्त पुरुष॥127॥ श्रीरघुनन्दनकी श्रीकृष्णसेवाका दृष्टान्त :- “रघुनन्दन सेवा करे कृष्णेर मन्दिरे। द्वारे पुष्करिणी, तार घाटेर उपरे॥128॥ कदम्बेर एक वृक्षे फुटे बारमासे। नित्य दुइ फूल हय कृष्ण-अवतंसे॥"129॥ अनुवाद—“रघुनन्दन सदा श्रीकृष्णके मन्दिरमें सेवा करता है। मन्दिरके द्वारके बगलमें एक कुण्ड है, उसके घाटपर एक कदम्बके वृक्षपर बारहों महीने नित्य दो फूल श्रीकृष्णके शृङ्गारके लिये खिलते हैं॥"128-129॥ अनुभाष्य—'अवतंसे'—भूषण या कर्णभूषण या शिरोभूषण, उसके लिये॥129॥ महाप्रभुके द्वारा उन तीनोंकी सेवाका विभाग—

  1. श्रीमुकुन्दकी सेवा :- मुकुन्देरे कहे पुनः मधुर वचन। “तोमार कार्य—धर्म-धन-उपार्जन॥130॥
  2. श्रीरघुनन्दनकी सेवा :- रघुनन्दनेर कार्य—कृष्णेर सेवन। कृष्ण-सेवा बिना इँहार अन्य नाहि मन॥131॥
  3. श्रीनरहरिकी सेवा :- नरहरि रहु आमार भक्तगण-सने। एइ तिन कार्य सदा करह तिन जने॥"132॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः श्रीमुकुन्दसे मधुर वचन कहे,—“तुम्हारा कार्य लौकिक और पारमार्थिक धन उपार्जन करना है। रघुनन्दनका कार्य सदा श्रीकृष्णकी सेवा करना है। श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त इसका मन अन्य किसी कार्यमें नहीं है। नरहरि मेरे भक्तोंके साथमें रहे। तुम तीनों सदैव श्रीकृष्णसेवाके इन तीनों कार्योंको करो॥"130-132॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभु श्रीमुकुन्दको अत्यन्त प्रिय अन्तरङ्ग भक्तके रूपमें मानते थे; इसलिये दोनों भाइयों और पुत्रके सेवा-कार्यका विभाग करते समय श्रीमुकुन्दके धर्म और धन-उपार्जन, श्रीरघुनन्दनके श्रीमूर्तिसेवन और श्रीनरहरिके भक्तोंके साथ रहने-रूपी सेवा-भेदका निरूपण किया॥130-132॥ श्रीसार्वभौम और श्रीवाचस्पति—इन दोनोंको श्रीकृष्णसेवाका निर्देश :- सार्वभौम, विद्यावाचस्पति,—दुइ भाइ। दुइजने कृपा करि' कहेन गोसाञि॥133॥ “'दारु'-'जल'-रूपे कृष्ण प्रकट सम्प्रति। 'दरशन'-'स्नाने' करे जीवेर मुक्ति॥134॥ 'दारुब्रह्म'-रूपे—साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम। भागीरथी हन साक्षात् 'जलब्रह्म'-सम॥135॥ 22 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/133-144 ] अनुवाद-श्रीसार्वभौम और श्रीविद्यावाचस्पति-ये दोनों भाई हैं। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करके श्रीचैतन्य गोसाईंने कहा, - "इस कलियुगमें श्रीकृष्ण काष्ठ और जलके रूपमें प्रकट हैं तथा (काष्ठके रूपमें) दर्शन और (जलके रूपमें) स्नानसे जीवोंको मुक्त करते हैं। वे 'दारुब्रह्म' के रूपमें साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम (श्रीजगन्नाथदेव) हैं और भागीरथी (गङ्गा) साक्षात् 'जलब्रह्म'के समान हैं॥ 133-135॥ श्रीसार्वभौमको श्रीजगन्नाथ और श्रीवाचस्पतिको गङ्गाकी सेवाकी आज्ञा :- सार्वभौम ! कर 'दारुब्रह्म' - आराधन । वाचस्पति ! कर जलब्रह्मरे सेवन ॥' 136 ॥ अनुवाद-हे सार्वभौम ! आप दारुब्रह्म (श्रीजगन्नाथ) की आराधना करें और हे वाचस्पति ! आप जलब्रह्म (गङ्गा)की सेवा करें ॥' 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सार्वभौम, आप दारुब्रह्मरूपी श्रीजगन्नाथदेवकी आराधना करो; और हे विद्यावाचस्पति, आप श्रीनवद्वीपधामके अन्तर्गत विद्यानगरमें रहकर जल-ब्रह्मरूप गङ्गाकी सेवा करो ॥ 136 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी अपने सेव्यमें निष्ठाकी महिमाका वर्णन :- मुरारि-गुप्तरे प्रभु करि' आलिङ्गन । ताँर भक्तिनिष्ठा कहेन, - "शुन भक्तगण ॥ 137 ॥ पहले महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिको श्रीकृष्णभजनका प्रलोभन :- पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल बार बार । 'परम मधुर, गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार ॥ 138 ॥ स्वयं भगवान् कृष्ण - सर्वांशी, सर्वाश्रय । विशुद्ध-निर्मल-प्रेम, सर्वरसमय ॥ 139 ॥ सकल-सद्गुण-वृन्द-रत्न-रत्नाकर । विदग्ध, चतुर, धीर, रसिक-शेखर ॥ 140 ॥ मधुर-चरित्र कृष्णेर मधुर-विलास । चातुर्य, वैदग्ध्य करे याँर लीला-रस ॥ 141 ॥ श्रीकृष्णोपासनाकी ही सर्वश्रेष्ठताका कथन :- सेइ कृष्ण भज तुमि, हओ कृष्णाश्रय । कृष्ण बिना अन्य-उपासना मने नाहि लय ॥' 142 ॥ अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आलिङ्गन करके महाप्रभु उनकी भक्तिकी निष्ठाका वर्णन करते हुए कहने लगे,- "हे भक्तों सुनो ! पहले मैंने इनको बार-बार श्रीकृष्णका लोभ दिखलाया। मैंने कहा, - 'हे मुरारि गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण परम मधुर हैं। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, वे सबके अंशी, सभीके आश्रय, विशुद्ध निर्मल प्रेमरूप और समस्त रसोंके भण्डार हैं। वे समस्त प्रकारके सद्गुणरूपी रत्नोंकी खान हैं, विदग्ध अर्थात् सभी कार्योंमें प्रवीण हैं, अत्यन्त बुद्धिमान, धीर और रसिकशेखर भी हैं। उनका चरित्र भी मधुर है और उनका विलास भी मधुर है। वे अपने चातुर्य और विदग्धतासे लीला-रसका आस्वादन करते हैं। इसलिये आप उन्हीं श्रीकृष्णका भजन करो। श्रीकृष्णके आश्रित हो जाओ। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी उपासनाकी बातको मनमें भी मत लाओ ॥' 137-142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- "हे गुप्त, श्रीव्रजेन्द्र-कुमार-परम मधुर" हैं आदि, बातें बोलकर (पहले) मैंने उनको कृष्णभजनमें अधिक लोभ दिया था ॥ 138 ॥ महाप्रभुके प्रलोभनसे मुरारिका क्षणिक चित्त-परिवर्तन :- एइमत बार बार शुनिया वचन । आमार गौरवे किछु फिरि' गेला मन ॥ 143 ॥ महाप्रभुके वचनोंमें दृढ़ विश्वास और दैन्य-ज्ञापन :- आमारे कहेन, - "आमि तोमार किङ्कर । तोमार आज्ञाकारी आमि, नाहि स्वतन्तर ॥ "144 ॥ अनुवाद-बार-बार इस प्रकारके वचन सुनकर मेरे प्रति गौरव बुद्धिके कारण इनका मन कुछ बदल गया । 23

[ 15/143-154 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला था। इन्होंने मुझसे कहा,—“मैं आपका दास हूँ। आपका आज्ञाकारी हूँ, मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ॥”143-144॥ श्रीरामकी उपासनाके त्यागकी चिन्तासे श्रीमुरारिकी अनिद्रा, रोना और मृत्युकी इच्छा :— एत बलि' घरे गेल, चिन्ति' रात्रिकाले। रघुनाथ-त्याग-चिन्ताय हइल विकले ॥ 145 ॥ केमने छाड़िब रघुनाथेर चरण। आजि रात्र्ये प्रभु मोर कराह मरण ॥ 146 ॥ एइमत सर्व-रात्रि करेन क्रन्दन। मने सोयास्ति नाहि, रात्रि करेन जागरण ॥ 147 ॥ अनुवाद—यह कहकर ये अपने घर चले गये। सारी रात श्रीरघुनाथकी उपासनाके त्यागके विषयमें चिन्ता करते-करते व्याकुल हो गये। मैं किस प्रकार श्रीरघुनाथके चरणोंको छोड़ूँगा ! हे प्रभो ! आप आज रात ही मेरी मृत्यु करा दो ! इस प्रकार ये सारी रात रोते रहे। इनका मन अशान्त था, इसलिये सारी रात सोये ही नहीं ॥ 145-147 ॥ प्रातःकाल आकर श्रीराम-भजनके त्यागने और महाप्रभुकी आज्ञा-पालनमें असमर्थता बतलाकर दो सङ्कटोंमें पड़कर मृत्युकी इच्छा :— प्रातःकाले आसि' मोर धरिल चरण। कान्दिते कान्दिते किछु करे निवेदन ॥ 148 ॥ 'रघुनाथेर पाय मुञि बेचियाछोँ माथा। काढ़िते ना पारि माथा, मने पाइ व्यथा ॥ 149 ॥ श्रीरघुनाथ-चरण छाड़ान ना याय। तव आज्ञा-भङ्ग हय, कि करि उपाय ॥ 150 ॥ ताते मोरे एइ कृपा कर, दयामय। तोमार आगे मृत्यु हउक, याउक संशय ॥' 151 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें आकर इन्होंने मेरे चरण पकड़ लिये। ये रोते-रोते कुछ निवेदन करने लगे,—'मैंने श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने सिरको बेच दिया है। मैं अपने सिरको उनके चरणोंसे नहीं उठा सकता, क्योंकि वह मेरे लिये बहुत पीड़ादायक होगा। मेरे लिये श्रीरघुनाथके चरणकमलोंको छोड़ना सम्भव नहीं है। परन्तु यदि मैं ऐसा नहीं करूँ, तो आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन होता है। मैं क्या कर सकता हूँ? इसलिये हे दयामय ! आप मुझपर यह कृपा कीजिये कि, आपके सामने ही मेरी मृत्यु हो जाय जिससे मेरी यह दुविधा दूर हो जायेगी ॥' 148-151 ॥ अनुभाष्य— “श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि। तथापि मम सर्वस्वः रामः कमलोचनः ॥ ” [अर्थात् “भगवान् श्रीनाथ और श्रीजानकीनाथ अभिन्न हैं, तो भी कमलनयन श्रीराम ही मेरे सर्वस्व हैं।”] ॥ 149 ॥ श्रीमुरारिके वचनोंसे महाप्रभुका हर्ष और प्रशंसा :— एत शुनि' आमि बड़ मने सुख पाइलुँ। इँहारे उठाञा तबे आलिङ्गन कैलुँ ॥ 152 ॥ साधु, साधु, गुप्त ! तोमार सुदृढ़ भजन। आमार वचनेह तोमार ना टलिल मन ॥ 153 ॥ अनुवाद—यह सुनकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ। तब मैंने इन्हें उठाकर इनका आलिङ्गन किया। अति सुन्दर, अति सुन्दर गुप्त ! तुम्हारा भजन बहुत ही सुदृढ़ है जो मेरे वचन सुनकर भी तुम्हारा मन परिवर्तित नहीं हुआ ॥ 152-153 ॥ सेवक और सेव्यका परस्परके प्रति आदर्श व्यवहार :— एइमत सेवकेर प्रीति चाहि प्रभु-पाय। प्रभु छाड़ाइलेह, पद छाड़ान ना याय ॥ 154 ॥ अनुवाद—प्रभुके प्रति सेवककी ऐसी ही प्रीति होनी चाहिये। प्रभुके द्वारा छुड़ानेपर भी, सेवक उनके चरणकमलोंको नहीं छोड़ सकता ॥ 154 ॥ अनुभाष्य— 'प्रभु'-जीवके नित्यसेव्य, आराध्य अथवा उपास्यतत्त्व श्रीकृष्ण; मध्यलीला 4/186, 7/8, तेरहवें 24 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/154-163 ] अध्यायका (पूर्वार्द्ध) देखें; अन्त्यलीला 4/46-47 संख्या- “सेइ भक्त-धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण। सेइ प्रभु-धन्य, ये ना छाड़े निजजन॥ दुर्द्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने। सेइ ठाकुर धन्य-ये तारे चुले धरि' आने॥" [अर्थात् “वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वे प्रभु धन्य हैं जो अपने निजजनोंको कभी नहीं त्यागते। दुर्भाग्यवश यदि सेवक अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो वे प्रभु धन्य हैं, जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर खींचकर ले आते हैं।”] ॥ 154 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी उपास्यके प्रति निष्ठाकी परीक्षा, श्रीमुरारिका परीक्षामें उत्तीर्ण होना :- एइमत तोमार निष्ठा जानिवार तरे। तोमारे आग्रह आमि कैलुँ बारे बारे ॥ 155 ॥ अनुवाद-इस प्रकार आपकी निष्ठाकी परीक्षा लेनेके लिये ही मैंने आपसे बार-बार आग्रह किया था ॥ 155 ॥ अनुभाष्य - 'जानिवार' - परीक्षा करनेके लिये; 'आग्रह'- कृष्णभजन करवानेके लिये आज्ञा देना ॥ 155 ॥ दैन्यके अवतार श्रीमुरारि- साक्षात् हनुमत्-विग्रह :- साक्षात् हनुमान् तुमि श्रीराम-किङ्कर। तुमि केने छाड़िबे ताँर चरण-कमल ॥ 156 ॥ सेइ मुरारि-गुप्त एइ-मोर प्राण सम। इँहार दैन्य शुनि' मोर फाटये जीवन॥” 157 ॥ अनुवाद - आप तो श्रीरामके दास साक्षात् हनुमान् हो। आप उनके चरण-कमलोंको क्यों छोड़ोगे? ये वही मुरारि गुप्त मेरे प्राणोंके समान हैं। इनका दैन्य सुनकर मेरा हृदय फटता है॥” 156-157 ॥ अनुभाष्य - इस प्रसङ्गमें अन्त्यलीला 4/30-45 संख्यामें श्रीजीवके पिता श्रीअनुपम अथवा श्रीवल्लभकी श्रीराम-निष्ठा विचारणीय है ॥ 137-157 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीवासुदेव दत्तकी प्रशंसा :- तबे वासुदेवे प्रभु करि' आलिङ्गन। ताँर गुण कहे हञा सहस्र-वदन ॥ 158 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीवासुदेव दत्तका आलिङ्गन किया और उनके गुणोंका ऐसे बखान करने लगे, मानो उनके सैकड़ों मुख हों ॥ 158 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवासुदेवका कातर-हृदयसे निवेदन :- निज-गुण शुनि' दत्त मने लज्जा पाञा। निवेदन करे प्रभुर चरणे धरिया ॥ 159 ॥ “जगत् तारिते प्रभु तोमार अवतार। मोर निवेदन एक करह अङ्गीकार ॥ 160 ॥ करिते समर्थ तुमि, हओ दयामय। तुमि मन कर, तबे अनायासे हय ॥ 161 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके मुखसे अपने गुणोंको सुनकर श्रीवासुदेव दत्त मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर निवेदन करने लगे, - “हे प्रभो! जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है, आप कृपया मेरा एक निवेदन स्वीकार कीजिये। हे दयामय! उसे पूर्ण करनेमें आप समर्थ हैं। यदि आप इच्छा करें, तो वह अनायास ही पूर्ण हो सकता है ॥ 159-161 ॥ अलौकिक परदुःखदुःखी गौरदास श्रीवासुदेव-दत्त-ठाकुर :- जीवेर दुःख देखि' मोर हृदय विदरे। सर्वजीवेर पाप प्रभु देह' मोर शिरे ॥ 162 ॥ जीवेर पाप लञा मुञि करि नरक भोग। सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह भवरोग ॥” 163 ॥ अनुवाद-संसारमें जीवोंके दुःख देखकर मेरा हृदय फटता है। हे प्रभो! सब जीवोंके पापोंको मेरे सिरपर मढ़ दीजिये। जीवोंके पापोंको लेकर मैं नरक भोग करूँ। और आप सभी जीवोंके भवरोगको दूर कर दीजिये ॥” 162-163 ॥ । 25

[ 15/162-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—पश्चिमी-देशोंके ईसाईभक्तोंमें यह विश्वास है कि, उनके गुरु एकमात्र महामति यीशुमसीह ही जीवोंके सभी पापोंके भारको ग्रहण करनेके लिये तत्पर होकर ही जगत्में अवतीर्ण हुए थे। किन्तु श्रीगौरपार्षदोंमें श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरने श्रीहरिदास ठाकुरकी भाँति यीशुमसीहकी अपेक्षा अनन्त कोटिगुणा अधिकतर उन्नत और उदार सार्वजनिक विश्ववैष्णव-प्रेमभावकी जगत्के जीवोंको शिक्षा दी है। श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरमें जड़ीय स्वार्थका त्यागरूप 'निःस्वार्थ', विष्णु-सेवारूप चिन्मय 'परार्थ' और 'स्वार्थ' अपूर्वरूपसे एकत्र सम्मिलित हैं। वे श्रीगौरसुन्दरको वास्तव-वस्तु, माया और मायाकी कपटतासे सर्वदा मुक्त स्वयं-भगवान् जानकर ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं। उन्होंने समस्त जीवोंके कृष्ण-विमुखतारूप भवरोग (केवल पाप नहीं, सब प्रकारके पापोंकी अपेक्षा भी भीषणतम 'अपराध'-राशि)को अपने कन्धोंपर ग्रहण करके उनके भवरोगको दूर करनेके लिये काय-मनो-वाक्यसे सम्पूर्ण निष्कपट़रूपसे प्रार्थना करके जिस दयाका आदर्श प्रदर्शित किया है, वह सम्पूर्ण जगत्में, केवल जगत्में ही क्यों, सम्पूर्ण चौदह भुवनोंमें सर्वश्रेष्ठ कर्मियों और ज्ञानियोंकी भी कल्पनासे अतीत है। मायाके वशीभूत, देहको ही मैं माननेवाले जीवोंकी अपने-परायेकी भेद-बुद्धिके कारण हिंसा-वृत्ति प्रधान होती है। वे (जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखादि रूप) द्वैत-जगत्में कर्म और ज्ञानके आदर्शका ही बहुत आदर करते हैं, इसलिये उनमेंसे अधिकांश व्यक्ति ही कुकर्मी और कुज्ञानी हैं। उनमें स्वाभाविक ईर्ष्या और द्वन्द्वभाव होनेके कारण वे वैकुण्ठसेवक श्रीवासुदेव दत्तठाकुरकी नरक-भोगकी प्रार्थनाको सुनकर उल्लसित होकर उन्हें एक 'पुण्यवान् सत्कर्मी' अथवा 'ब्रह्मज्ञानी'के स्तरका मानकर प्रचुर सम्मान अथवा प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते हैं। परन्तु दत्तठाकुर उसकी अपेक्षा भी अनन्त कोटि गुणा अधिक जीवोंके प्रति 'दया'-प्रवृत्तिसे युक्त हैं, यह बिल्कुल भी अतिरञ्जित प्रशंसा-वाक्य (अतिशयोक्ति) अथवा अर्थवाद नहीं है, बल्कि अति निरपेक्ष सत्य बात है। वास्तवमें उनके समान “परदुःखदुःखी” श्रीगौरदासगणोंके आगमनसे पृथ्वी धन्य हुई है, केवल प्रपञ्च ही नहीं, बल्कि समस्त जीवकुल भी धन्य हो गया है। ऐसे श्रीगौरभक्तोंके गुणगानमें ही जिह्वाकी सार्थकता है। और कवियों और ऐतिहासिक व्यक्तियोंकी लेखनी जब लौकिक भावोंको छोड़कर उनके समान अकिञ्चना भगवद्भक्तियुक्त महाभागवतोंके गुण-वर्णनके कार्यमें नियुक्त होगी, तभी उसकी सर्वश्रेष्ठ-सार्थकता होगी। महावदान्य श्रीकृष्णचैतन्यके दास इतने “महतोऽपि महीयान्” (महान्‌से भी महान्) और “गरीयसोऽपि गरीयान्” (श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ) हैं॥162-163॥ प्रियतम सेवककी प्रार्थनासे महाप्रभुका चित्त द्रवित :— एत शुनि' महाप्रभुर चित्त द्रविला। अश्रु-कम्प-स्वरभङ्गे कहिते लागिला॥164॥ श्रीवासुदेव-दत्तठाकुर—साक्षात् प्रह्लाद :— “तोमार विचित्र नहे, तुमि—साक्षात् प्रह्लाद। तोमार उपरे कृष्णेर सम्पूर्ण प्रसाद॥165॥ श्रीकृष्ण और भक्तका परस्परमें व्यवहार :— कृष्ण सेइ सत्य करे, येइ मागे भृत्य। भृत्य-वाञ्छा-पूरण बिना नाहि अन्य कृत्य॥166॥ सभी ब्रह्माण्डवासियोंके उद्धारके विषयमें सत्य आश्वासन-दान :— ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि वाञ्छिले निस्तार। बिना पाप-भोगे हवे सबार उद्धार॥167॥ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन :— असमर्थ नहे, कृष्ण धरे सर्वबल। तोमाके वा केने भुञ्जाइबे पाप-फल?॥168॥ तुमि याँर हित वाञ्छ', से हइल 'वैष्णव'। वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर करे सब॥169॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो गया। उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे, उनका शरीर काँपने लगा और वे गद्गद स्वरसे कहने लगे,—“हे 26

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/164-172 ] वासुदेव ! तुम्हारा ऐसा कहना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि तुम साक्षात् प्रह्लाद हो। तुम्हारे ऊपर श्रीकृष्णकी सम्पूर्ण कृपा है। उनका दास जो कुछ माँगता है, श्रीकृष्ण उसे सत्य कर देते हैं। अपने दासकी इच्छाको पूर्ण करनेके अतिरिक्त श्रीकृष्णका अन्य कोई कार्य नहीं है। तुमने ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंके उद्धारकी कामना की है, इसलिये तुम्हारे द्वारा उन सबके पाप भोगे बिना ही उन सबका उद्धार होगा। श्रीकृष्ण असमर्थ नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण शक्तिको धारण करनेवाले हैं। वे तुम्हें सबके पापोंके फल किसलिये भोग करायेंगे ? तुम जिसके हितकी कामना करते हो, वह 'वैष्णव' बन जाता है और श्रीकृष्ण वैष्णवोंके समस्त पापोंको दूर कर देते हैं ॥ 164-169 ॥ सर्वफलप्रदाता श्रीगोविन्दकी वन्दना :- ब्रह्मसंहिता (5/54) में- यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म- बन्धानुरूप-फलभाजनमातनोति। कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजां गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 170 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो इन्द्रगोप नामक (क्षुद्र) कीटसे आरम्भ करके देवेन्द्र तक सभी जीवोंको उनके कर्मबन्धनके अनुरूप फलभोगका विधान करते हैं, किन्तु जो भक्तिमान् पुरुषके समस्त कर्मोंको ही सम्पूर्ण रूपसे नष्ट कर देते हैं, अहो ! मैं उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका भजन करता हूँ ॥ 170 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभु श्रीवासुदेवको कह रहे हैं,- "श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् हैं। वे समस्त जीवोंको उनकी जड़भोगवासनाओंसे मुक्त कर सकते हैं। तुमने जब समदर्शी होकर, उच्च-नीच सभी जीवोंकी ओरसे उनके मङ्गलकी प्रार्थना की है, तब तुम्हारी प्रार्थनाके अनुसार तुम्हारे पापभोगके बिना ही सभीका उद्धार होगा। उसके बदलेमें तुम्हें उनके लिये पापोंके फल भोग नहीं करने पड़ेंगे। तुम जिनके मङ्गलकी कामना करोगे, वे ही 'वैष्णव' बन जायेंगे। और श्रीकृष्ण वैष्णवोंके प्राचीन पापोंके फलभोगसे भी उनकी रक्षा करेंगे। अर्थात् वे पाप-पुण्यकी सेवाको छोड़कर शुद्ध श्रीकृष्णसेवक बन जायेंगे।" पद्मपुराणमें- "अप्रारब्ध-फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्। क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णुभक्ति-रतात्मनाम्॥" [अर्थात् "जिन लोगोंकी आत्मा और उनका शरीर, मन, प्राणादि सभी श्रीकृष्णकी भक्तिमें लगे हुए हैं, उनके अप्रारब्ध पाप, कूट पाप, बीजरूप पाप और फलोन्मुख पाप (जिनका फल भुगतना आरम्भ हो गया है), ये सब भक्तिसे क्रमशः विनष्ट हो जाते हैं।"] भाः 6/2/17 श्लोक देखें ॥ 167-169 ॥ अनुभाष्य- यः (गोविन्दः) तु इन्द्रगोपं (रक्तवर्णक्षुद्रकीटविशेषम्) अथवा इन्द्रं (देवाधिपतिं) स्वकर्मबन्धानुरूपफलभाजनं (स्वस्य कर्मबन्धानुरूपस्य फलस्य भाजनम्) आतनोति (सम्यक् विदधाति) किन्तु भक्तिभाजां (हरिसेवापराणां) च कर्माणि (प्रारब्धानि अप्रारब्धानि च भोगयोग्यानि कर्मफलानि) निर्दहति (विनाशयति), तम् आदिपुरुषं (मूलदेवं) गोविन्दम् (अहं) भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ भक्तकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा अनायास ही ब्रह्माण्डका मोचन करना :- तोमार इच्छा-मात्रे हवे ब्रह्माण्ड-मोचन। सर्व मुक्त करिते कृष्णेर नाहि परिश्रम ॥ 171 ॥ अनुवाद-तुम्हारे इच्छा करने मात्रसे ही ब्रह्माण्डका उद्धार हो जायेगा, क्योंकि ब्रह्माण्डके समस्त प्राणियोंको मुक्त करनेमें श्रीकृष्णको कोई परिश्रम नहीं करना पड़ेगा ॥ 171 ॥ विरजा अथवा कारण-समुद्रमें तैरते हुए अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड :- एकइ डुम्बुर-वृक्षे लागे कोटि-फले। कोटि ये ब्रह्माण्ड भासे विरजार जले ॥ 172 ॥ । 27

[ 15/172-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—जिस प्रकार एक गूलरके वृक्षपर करोड़ों फल लगते हैं, उसी प्रकार विरजा नदीके जलमें करोड़ों ब्रह्माण्ड तैरते रहते हैं॥ 172 ॥ अनुभाष्य—अप्राकृत ब्रह्मधामके बाहरी भागमें विरजा नदी है। उसके उस पार आलोकमय ब्रह्मधामके द्वारा मण्डित सविशेष-वैकुण्ठ-धाम है। विरजा नदीके दूसरी ओर यह देवीधाम अथवा प्राकृत जगत् है। देवीधाममें त्रिगुण (सत्त्व, रज और तम) वर्तमान (अर्थात् सक्रिय) हैं और विरजा नदीमें तीनों गुण साम्यावस्थामें (अर्थात् निष्क्रिय अवस्थामें) विराजमान हैं॥ 172 ॥ ब्रह्माण्डके उद्धारके साथ गूलरके फलके गिरनेकी उपमा :— तार एक फल पड़ि' यदि नष्ट हय। तथापि वृक्ष नाहि जाने निज अपचय॥ 173 ॥ श्रीकृष्णके लिये केवल एक ब्रह्माण्डका उद्धार—अत्यन्त तुच्छ और ग्रहण करने अयोग्य कार्य :— तैछे एक ब्रह्माण्ड यदि मुक्त हय। तबु अल्प-हानि कृष्णेर मने नाहि लय॥ 174 ॥ परव्योमके बाहरी स्थानपर स्थित कारण-सागरका वर्णन :— अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर वैकुण्ठादि-धाम। तार गड़खाइ—कारणाब्धि यार नाम॥ 175 ॥ ताते भासे माया, लञा अनन्त ब्रह्माण्ड। गड़खाइते भासे येन राइ-पूर्ण भाण्ड॥ 176 ॥ तार एक राइ-नाशे, हानि नाहि मानि। ऐछे एक अण्ड-नाशे कृष्णेर नाहि हानि॥ 177 ॥ अनुवाद—उन करोड़ों फलोंमेंसे यदि एक फल गिरकर नष्ट हो जाता है, तो भी वह वृक्ष अपनी कोई हानि नहीं समझता। उसी प्रकार यदि एक ब्रह्माण्ड उसमें सभी जीवोंके मुक्त होनेपर खाली हो जाता है, तो श्रीकृष्ण उस कमीकी ओर ध्यान भी नहीं देते। असंख्य वैकुण्ठादि धाम श्रीकृष्णका अनन्त ऐश्वर्य है। उस वैकुण्ठलोकके चारों ओरकी खाई ही कारणसमुद्र कहलाती है। उस कारणसमुद्रमें माया अपने अनन्त ब्रह्माण्डोंको लेकर तैरते हुए सरसोंके दानोंसे भरे हुए पात्र जैसे प्रतीत होती है। जिस प्रकार करोड़ों राईके दानोंसे भरे पात्रमेंसे एक दानेके नष्ट होनेपर उसे कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसी प्रकार एक ब्रह्माण्डके नष्ट होनेपर श्रीकृष्णको कोई कमी अनुभव नहीं होती॥ 173-177 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/53 संख्या, 5/52-55, मध्यलीला 20/268-279, 21/52 संख्या देखें। वैकुण्ठधाममें मायाकी किसी भी प्रकारकी कुण्ठा नहीं है। वैकुण्ठ सभी ओरसे कारणसमुद्रसे घिरा हुआ है। प्राकृत देवीधामकी विचित्रताका कारण-जल ही कारणसमुद्र है। 'गड़खाइ'—घेरनेवाला जल। विरजा-नदी अथवा कारणसमुद्र खाईके समान है। अनन्त असंख्य ब्रह्माण्ड- समूह असंख्य 'छोटे-छोटे सरसोंके दानेके' समान और माया 'पात्र'के समान है॥ 175-176 ॥ मायाके साथ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके ध्वंस होनेसे भी श्रीकृष्णको कोई कमी नहीं :— सब ब्रह्माण्ड सह यदि 'माया'र हय क्षय। तथापि ना माने कृष्ण किछु अपचय॥ 178 ॥ कामधेनु-कोटि-पतिर छागी यैछे मरे। षडैश्वर्यपति कृष्णेर माया किवा करे? ॥ 179 ॥ अनुवाद—एक ब्रह्माण्डका तो कहना ही क्या, सभी ब्रह्माण्डोंके साथ यदि मायाका भी नाश हो जाता है, तब भी श्रीकृष्ण कोई कमी अनुभव नहीं करते। करोड़ों कामधेनुओंके स्वामीको एक बकरीके मर जानेसे जिस प्रकार कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार षडैश्वर्यपति श्रीकृष्णको मायाके नष्ट होनेसे क्या कमी हो सकती है? ॥ 178-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इन पद्योंका शब्दार्थ सरल है, किन्तु भावार्थ कठिन है। भावार्थ यह है—जीव श्रीकृष्णसे बहिर्मुख होकर मायाबन्धनमें पड़ जाते हैं और माया 28 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/171-180 ] अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके उन जीवोंको श्रीकृष्ण-विमुखताके फलस्वरूप कर्मफल भोग कराती है। श्रीकृष्ण-बहिर्मुख लोगोंको कर्मफल अवश्य ही भोग करना पड़ता है। श्रीकृष्ण-सम्मुख (श्रीकृष्णोन्मुख) व्यक्तियोंका वह कर्मबन्धन श्रीकृष्णकी इच्छासे सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाता है। इसमें यदि वितर्क किया जाय कि, 'भक्त होनेसे ही यदि कर्म बन्धन नष्ट हो जाय और किसी भक्तकी इच्छा होनेपर ही यदि बिना दण्डके ही सभी जीवोंका उद्धार हो जाय, तब भक्तकी इच्छासे ही ब्रह्माण्ड रहे, या नहीं रहे, ऐसा होनेपर फिर श्रीकृष्णका जगत् किस प्रकारसे अच्छी प्रकारसे नियमित हो सकता है?' इसलिये महाप्रभुने कहा, - 'श्रीकृष्णका चिद्-जगत् अनन्त और अपरमेय (जिसे मापा नहीं जा सकता) है; स्वरूप-शक्तिके सभी गण वहाँ कामधेनु-स्वरूपमें स्वामीरूप श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। वह (स्वरूप शक्तिका वैभव) चिद्-जगत् त्रिपाद (श्रीकृष्णकी तीन चौथाई विभूति) है। उस चिद्-जगत्की छायारूप मायाके अधिकारमें यह जड़जगत् एकपाद (एक चौथाई) है। माया स्वरूपशक्तिकी छायामात्र है। इसलिये करोड़ों कामधेनुओंके स्वामी श्रीकृष्णके लिये यह माया एक बकरी-मात्र है [यहाँ कामधेनु और बकरीका उपमा रूपमें प्रयोग हुआ है]। शुद्धभक्तोंकी इच्छानुसार अथवा शुद्धभक्तोंके अनुरोधसे यदि एक मायिक ब्रह्माण्डका उद्धार हो जाय, तो उससे श्रीकृष्णको कोई क्षति प्रतीत नहीं होती। उसकी बात तो दूर रहे, यदि समस्त मायिक ब्रह्माण्डोंके साथ बकरीरूपी मायाका अस्तित्व भी लोप हो जाय, तो भी करोड़ों कामधेनु-स्वामीरूप षडैश्वर्योंके ईश्वर श्रीकृष्णकी लेशमात्र भी हानि नहीं होती अर्थात् छायाके नष्ट होनेपर स्वरूप-वस्तुकी क्या हानि हो सकती है? ॥ 171-179 ॥ श्रीमद्भागवतमें (10/87/14) :- जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः। अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते क्वचिदजयात्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥”180॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिसके (द्वारा) सत्त्व-रज-तमोगुण दोषके रूपमें गृहीत हुआ है, हे अजित, उस चराचर अजा (अविद्या अथवा माया)को आप विनष्ट करके (अपनी विजय दिखलाओ, विजय दिखलाओ); क्योंकि, आत्मशक्तिके द्वारा मायातीत आपमें (स्वरूपतः) समस्त ऐश्वर्य अवरुद्ध (आबद्ध) है, आप ही जगत्की समस्त शक्तियोंके ज्ञापक (ज्ञान करानेवाले अन्तर्यामी) हैं। आप आत्म-शक्तिसे ही विपुल चिद्-जगत्में लीला करते हैं और किसी कारणसे आप अपनी छायाशक्ति मायाके प्रति ईक्षण (दृष्टिपात) करके उसके द्वारा (सृष्टि आदि) लीला करते हैं, - वेद आपकी इन दो प्रकारकी लीलाओंका ही वर्णन (करके उसका प्रतिपादन) करते हैं॥”180॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें सेवा करनेके अभिलाषी ऋषियोंसे चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दन श्रुतियोंके द्वारा की गयी भगवद्-स्तुतिका वर्णन कर रहे हैं- हे अजित (मायाद्यनभिभूत,) जय जय (निजोट्कर्षमवश्यमाविष्कुरु, कथं वा न करोषीति आदरे वीप्सा) दोषगृभीतगुणां (दोषाय आनन्दाद्यावरणाय गृभीता गृहीताः गुणाः यया तां) अगजगदोकसां (अङ्गानि स्थावराणि जगन्ति जङ्गमानि ओकांसि शरीराणि येषां तेषां जीवानाम्) अजां (मायाम् अविद्यां) जहि (नाशय-यथा पुनरेषा सृष्ट्यादौ प्रवृत्तान् जीवान् न दुनोतीति भावः), यत् (यस्मात्) त्वम् आत्मना (स्वरूपभूतेन परमानन्देनैव तदभिन्नयैव शक्त्या) समवरुद्धसमस्तभगः (सम्प्राप्तसमग्रैश्वर्यः) असि [वशीकृतमायत्वात् त्वमेव] अखिलशक्त्यवबोधक (अखिलाः प्राकृताप्राकृताः याः शक्त्यः तासां सर्वासाम् अवबोधक, भोक्तः, अधीश्वर, इति यावत्) क्वचित् (कदाचित् सृष्ट्यादिसमये) अजया (मायया सह) आत्मना (अङ्गाभासेन, स्वयं तु निर्लेप्सः) चरतः (ईक्षण-क्रीड़तः) ते (तव त्वां-कर्मणि षष्ठी) निगमः (वेदः) । 29

[ 15/180–188 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुचरेत् (प्रतिपादयेत्—"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते", “यो ब्राह्मणे विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै”, “यः आत्मनि तिष्ठन्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि श्रुतिभ्यः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (श्रुतिके ये मन्त्र इसी बातका प्रतिपादन करते हैं— “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' अर्थात् जिनसे समस्त प्राणी-समुदाय उत्पन्न हुआ है, “यो ब्राह्मणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै” अर्थात् प्रारम्भमें श्रीकृष्णने ब्रह्माको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया और उन्होंने बादमें वैदिक ज्ञानका प्रचार किया, “यः आत्मनि तिष्ठन्” अर्थात् जो आत्मामें स्थित है, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञानस्वरूप है॥180॥ महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंको विदायी देना :- एइ मत सर्वभक्तेरे कहिं सब गुण। सबारे विदाय दिल करि' आलिङ्गन॥181॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंके समस्त गुणोंका वर्णन करनेके बाद महाप्रभुने उन सभी भक्तोंको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी॥181॥ परस्परके भावि-विरहकी आशङ्कासे भक्त और भगवान्‌का विषाद :- प्रभुर विच्छेदे भक्त करेन रोदन। भक्तेर विच्छेदे प्रभुर विषण्ण हैल मन॥182॥ अनुवाद—महाप्रभुसे विच्छेद होनेपर भक्त रोने लगे और भक्तके विच्छेदसे महाप्रभुका मन भी उदास हो गया॥182॥ श्रीगदाधरको टोटा-गोपीनाथकी सेवा देना :- गदाधर-पण्डित रहिला प्रभुर पाशे। यमेश्वरे प्रभु याँरे कराइला आवासे॥183॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित महाप्रभुके पास ही रह गये। महाप्रभुने उन्हें यमेश्वरमें आवास-स्थान प्रदान किया॥183॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें 'जलेश्वर' अर्थात् 'जलेश्वरमें' है। यह पाठ शुद्ध और सार्थक नहीं लगता क्योंकि, जलेश्वर-ग्राममें श्रीगदाधर पण्डितकी किसी लीलाका उल्लेख नहीं है। समुद्र-बालुके पथसे यमेश्वर-टोटामें श्रीटोटा-गोपीनाथका मन्दिर है, वहीं श्रीगदाधर पण्डित (गोस्वामी) श्रीगोपीनाथकी सेवा और महाप्रभुकी सेवामें आविष्ट होकर रहते थे॥183॥ अनुभाष्य—'यमेश्वर'—पुरुषोत्तममें श्रीमन्दिरके दक्षिण-पश्चिम कोणमें बालुकाके ऊपर यमेश्वर-टोटा अथवा बागान है। महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितको वहीं वासस्थान दिया॥183॥ छः भक्तोंके साथ महाप्रभुका पुरीमें अवस्थान :- पुरी-गोसाञि, जगदानन्द, स्वरूप-दामोदर। दामोदर-पण्डित, आर गोविन्द, काशीश्वर॥184॥ इसब-सङ्गे प्रभु कैसे नीलाचले। जगन्नाथ-दरशन नित्य प्रातःकाले॥185॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीगोविन्द प्रभु और श्रीकाशीश्वरके साथ महाप्रभुने नीलाचलमें वास किया। वे प्रतिदिन प्रातःकालमें भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करते थे॥184-185॥ श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको एक मास भिक्षा ग्रहण करनेका निमन्त्रण :- प्रभु-पाश आसिं सार्वभौम एक दिन। जोड़हात करि' किछु कैल निवेदन॥186॥ “एबे सब वैष्णव गौड़देशे चलि' गेल। एबे प्रभुर निमन्त्रणे अवसर हैल॥187॥ 'एक सम्पूर्ण मासके निमन्त्रण'को सुनकर महाप्रभुकी आपत्ति; और संन्यासधर्मके विरुद्ध कहकर भिक्षाका समय कम करना :- एबे मोर घरे भिक्षा करह 'मास' भरि'।” प्रभु कहे,—“धर्म नहे, करिते ना पारि॥”188॥ 30 |

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/186-196 ] अनुवाद-एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके पास आकर हाथ जोड़कर कुछ निवेदन किया,-"अब तो सब वैष्णव बङ्गाल लौट गये हैं, इसलिये अब आप मेरा निमन्त्रण अवश्य ही स्वीकार कर लेंगे। अब आप एक मास तक प्रतिदिन मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये।" महाप्रभुने कहा, - "मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि यह धर्म-सङ्गत नहीं है॥" 186-188॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा भिक्षाके समयको बढ़ाना और महाप्रभुके द्वारा उसे कम करनेकी चेष्टासे एक दिन मात्र भिक्षामें ही महाप्रभुकी सम्मति :- सार्वभौम कहे,- "भिक्षा करह 'विंश' दिन।" प्रभु कहे, - "ए नहे यतिधर्म-चिह्न ॥" 189 ॥ सार्वभौम कहे पुनः, - दिन 'पञ्चदश' । प्रभु कहे,-"तोमार भिक्षा 'एक' दिवस ॥" 190 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौमने कहा, - "कृपया फिर बीस दिन तक भिक्षा स्वीकार कीजिये।" महाप्रभुने कहा, - "ऐसा करना संन्यासीका धर्म नहीं है।" श्रीसार्वभौमने पुनः कहा कि पन्द्रह दिन तो भिक्षा स्वीकार कर लीजिये। महाप्रभुने कहा, - "तुम्हारे घर एक दिन भिक्षा ग्रहण करूँगा॥" 189-190 ॥ बहुत दैन्य-विनयसे श्रीभट्टाचार्यकी भिक्षाकालको दस दिन करनेकी चेष्टा :- तबे सार्वभौम प्रभुर चरणे धरिया। 'दशदिन भिक्षा कर' कहे विनति करिया ॥ 191 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुके चरण पकड़कर विनती करते हुए कहा कि अन्ततः दस दिन तो भिक्षा ग्रहण कीजिये ॥ 191 ॥ अन्तमें पाँच दिनकी भिक्षा स्वीकार :- प्रभु क्रमे क्रमे पाँच-दिन घटाइल। पाँच-दिन ताँर भिक्षा-निमन्त्रण निल ॥ 192 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने एक-एक करके पाँच दिन कम किये और श्रीसार्वभौमके घर पाँच दिन भिक्षाका निमन्त्रण स्वीकार किया ॥ 192 ॥ अनुभाष्य-भक्तवत्सल होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा [संन्यास] आश्रम-धर्मका पालन ॥ 188-192 ॥ दस संन्यासियोंके निमन्त्रणकी व्यवस्था :- तबे सार्वभौम करे आर निवेदन। "तोमार सङ्गे संन्यासी आछे दशजन ॥ 193 ॥ श्रीपरमानन्द-पुरीको पाँच दिन भिक्षा-दान :- पुरी-गोसाञिर भिक्षा पाँचदिन मोर घरे। पूर्वे आमि कहियाछौं तोमार गोचरे ॥ 194 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौमने एक और निवेदन करते हुए कहा, - "आपके साथ दस संन्यासी हैं। उनमेंसे श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी मेरे घरपर पाँच दिन भिक्षा ग्रहण करेंगे, इस विषयमें मैंने आपको पहले भी अवगत कराया था ॥ 193-194 ॥ अनुभाष्य - 'दस संन्यासी'-1) श्रीपरमानन्द पुरी, 2) श्रीदामोदर-स्वरूप, 3) श्रीब्रह्मानन्द पुरी, 4) श्रीब्रह्मानन्द- भारती, 5) श्रीविष्णुपूरी, 6) श्रीकेशव-पुरी, 7) श्रीकृष्णानन्दपुरी, 8) श्रीनृसिंह-तीर्थ, 9) श्रीसुखानन्द- पुरी, 10) श्रीसत्यानन्द-भारती ॥ 193 ॥ श्रीस्वरूपको कभी तो महाप्रभुके साथ, कभी अकेले चार दिन भिक्षा-दान देना स्वीकार :- दामोदर-स्वरूप, - एइ बान्धव आमार। कभु तोमार सङ्गे याबे, कभु एकेश्वर ॥ 195 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर मेरे बान्धव हैं। ये कभी तो आपके साथ और कभी अकेले ही मेरे घरपर भिक्षाके लिये आयेंगे ॥ 195 ॥ बाकी आठ संन्यासियोंको सोलह दिन भिक्षा-दान :- आर अष्ट संन्यासीर भिक्षा दुइ दुइ दिवसे। एक एक दिन, एक एक जने पूर्ण हइल मासे ॥ 196 ॥ । 31

[ 15/196-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अन्य आठ संन्यासी दो-दो दिन मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार एक-एक व्यक्तिको एक-एक दिन भिक्षा करानेसे पूरा मास हो जायेगा॥196॥ अनुभाष्य - 'आर अष्ट संन्यासी' अर्थात् 'और आठ संन्यासी'-श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीदामोदर स्वरूपके अतिरिक्त बाकी आठ लोग। 'पूर्ण हैल मासे' अर्थात् 'मास पूर्ण हो गया'-श्रीमहाप्रभुके 5 दिन, श्रीपरमानन्दपुरीके 5 दिन, श्रीदामोदर स्वरूपके 4 दिन, 8 अन्य संन्यासियोंके 16 दिन-कुल 30 दिन होनेसे एक मास पूर्ण हो गया॥196॥ दस संन्यासियोंको एक साथ भिक्षा करानेसे यथायोग्य मर्यादाकी रक्षामें असम्भावना-हेतु अपराधकी आशङ्का :- बहुत संन्यासी यदि आइसे एक ठाञि। सम्मान करिते नारि, अपराध पाइ ॥197॥ अनुवाद-बहुत संन्यासी यदि एक ही साथ आयेंगे, तो मैं उनका उचित सम्मान नहीं कर पाऊँगा, अपितु उनके प्रति अपराध हो जायेगा ॥197॥ कभी तो अकेले, और कभी श्रीस्वरूपके साथ निमन्त्रण :- तुमिह निज-छाये आसिबे मोर घरे। कभु सङ्गे आनिबे स्वरूप-दामोदरे॥”198॥ अनुवाद-आप भी केवल अपनी छायाके साथ अर्थात् अकेले ही मेरे घरपर आना और कभी श्रीस्वरूप दामोदरको अपने साथ लाना॥”198॥ अमृतप्रवाह भाष्य-निज-छायें'-अपनी छाया लेकर अर्थात् अकेले ॥198॥ महाप्रभुके अनुमोदनसे उस दिन उनको निमन्त्रण :- प्रभुर इङ्गित पाञा आनन्दित मन। सेइ दिन महाप्रभुर कैल निमन्त्रण ॥199॥ अनुवाद-सारी व्यवस्थाके लिये महाप्रभुकी सम्मतिसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका मन आनन्दित हो गया और उसी दिन उन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥ 199 ॥ श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी, षाठीकी माता-महाप्रभुकी भक्त :- ‘षाठीर माता' नाम, भट्टाचार्येर गृहिणी। प्रभुर महाभक्त तेंहो, स्नेहेते जननी ॥ 200 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी 'षाठीकी माता'-नामसे प्रसिद्ध थीं। वे महाप्रभुकी परम भक्त और स्नेहमें उनकी माताके समान ही थीं॥ 200 ॥ षाठीकी माताका रसोई बनाना :- घरे आसि' भट्टाचार्य ताँरे आज्ञा दिल। आनन्दे षाठीर माता पाक चड़ाइल ॥ 201 ॥ अनुवाद-घरमें आकर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें रसोई बनानेकी आज्ञा दी। षाठीकी माताने आनन्दसे रसोई बनाना आरम्भ कर दिया ॥ 201 ॥ साग-फल आदि अनेक नैवेद्यका संग्रह :- भट्टाचार्येर गृहे सब द्रव्य आछे भरि'। येबा शाकफलादिक, आनिल आहरि' ॥ 202 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यके घरमें खानेका सामान सदा पूर्ण मात्रामें रहता था। उसके अतिरिक्त जो कुछ साग, फल चाहिये था, उसे वे स्वयं संग्रह करके ले आये ॥ 202 ॥ अनुभाष्य- 'भरि"-पूर्ण; 'आहरि'-जुगाड़ करके ॥ 202 ॥ स्वयं श्रीभट्टाचार्यके द्वारा पत्नीकी रसोई बनानेमें सहायता :- आपनि भट्टाचार्य करे पाकेर सब कर्म। षाठीर माता-विचक्षणा, जाने पाकेर कर्म॥203॥ अनुवाद-स्वयं श्रीभट्टाचार्य रसोई बनानेमें अपनी पत्नीकी सहायता करने लगे। षाठीकी माता रसोई बनानेमें बहुत अनुभवी थीं और उन्हें बहुत अच्छा खाना बनाना आता था ॥ 203 ॥ 32 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/204–218 ] रसोई और भोगगृहका वर्णन :- पाकपालार दक्षिणे—दुइ भोगालय। एक घरे शालग्रामेर भोग–सेवा हय॥ 204॥ आर घर महाप्रभुर भिक्षार लागिया। निभृते करियाछे भट्ट नूतन करिया॥ 205॥ बाह्ये एक द्वार तार, प्रभु प्रवेशिते। पाकपालार एक द्वार अन्न प्रवेशिते॥ 206॥ अनुवाद—रसोई घरके दाहिनी ओर भोग लगानेके लिये दो कमरे थे। उनमेंसे एक कमरेमें शालग्राम भगवान्की भोग-सेवा होती थी। श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुकी भिक्षाके लिये एकान्तमें दूसरा नया कमरा बनवाया था। उस कमरेको ऐसे बनाया गया था कि बाहरकी ओर उसका एक ही द्वार था जो महाप्रभुके प्रवेश करनेके लिये था। उस कमरेका दूसरा द्वार रसोई घरसे जुड़ा हुआ था, जहाँसे परिवेशनेके लिये भोजन लाया जाता था॥ 204–206॥ विचित्र नैवेद्यका वर्णन :- बत्तिशा-आठिया कलार आङ्गटिया पाते। तिन-मान तण्डुलेर उभारिल भाते॥ 207॥ पीत-सुगन्धि-घृते अन्न सिक्त कैल। चारिदिके पाते घृत बहिया चलिल॥ 208॥ केयापत्र-कलाखोला-डोंगा सारि सारि। चारिदिक धरियाछे नाना व्यञ्जन भरि'॥ 209॥ दशप्रकार शाक, निम्ब-तिक्त-सुखत्-झोल। मरिचेर झाल, छानाबड़ा, बड़ा, घोल॥ 210॥ दुग्धतुम्बी, दुग्धकुष्माण्ड, बेसर, लाफ्रा। मोचाघण्ट, मोचाभाजा, विविध शाक्रा॥ 211॥ वृद्धकुष्माण्डबड़ीर व्यञ्जन अपार। फुलबड़ी-फल-मूल विविध प्रकार॥ 212॥ नव-निम्बपत्र-सह भृष्ट-वार्त्ताकी। फुलबड़ी, पटोल-भाजा, कुष्माण्ड-मान-चाकी॥ 213॥ भृष्ट-माष-मुद्ग-सूप अमृत निन्दय। मधुराम्ल, बड़ाम्लादि अम्ल पाँच छय॥ 214॥ मुद्गबड़ा, माषबड़ा, कलाबड़ा, मिष्ट। क्षीरपुलि, नारिकेल, आर यत पिष्ट॥ 215॥ काँजिबड़ा, दुग्धचिड़ा, दुग्ध-लक्लकी। आर यत पिठा कैल, कहिते ना शक्ति॥ 216॥ घृत-सिक्त परमान्न, मृत्कुण्डिका भरि'। चाँपाकला-घनदुग्ध आम्र ताहा धरि॥ 217॥ रसाला-मथित दधि, सन्देश अपार। गौड़े उत्कले यत भक्ष्येरे प्रकार॥ 218॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने बत्तिशा-आठिया केलेके पत्तेपर तीन मान (बारह किलो) चावलको परोसा। फिर चावलको पीले सुगन्धित घीसे इतना सिक्त किया कि घी पत्तेसे चारों ओरसे बहने लगा। उन्होंने नाना प्रकारके व्यञ्जनोंसे भरे केवड़ेके पत्ते और केलेके तनेसे बने दोनोंको उस पत्तेके चारों ओर साथ-साथ रखा। उन व्यञ्जनोंमें दस प्रकारके साग, नीमके कड़वे पत्तोंसे बना सूप जिसे शुक्त कहते हैं, काली मिर्चका सूप, पनीरका बड़ा और अन्यान्य वस्तुओंके बने बड़े, मट्ठा, दूधमें पकी हुई लौकी, दूधमें पका हुआ कद्दू, पिसी सरसों डालकर बनायी गयी सब्जियाँ, मिश्रित सब्जियाँ, केलेके फूलकी सब्जी, तले हुए केलेके फूल, मीठा डालकर अनेक प्रकारकी बनायी गयी सब्जियाँ, पके हुए कद्दू और उड़दकी दालकी बड़ीसे बने अनेक व्यञ्जन, फुलबड़ी, फल तथा अनेक प्रकारके कन्द, कोमल नीमकी पत्तियोंके साथ बैंगनका भाजा, फूलबड़ी, परमलकी भाजी, कच्चे पेठेकी सब्जी, पेठा और अरबीके टुकड़े करके तलकर बनायी सब्जी, अमृतको भी परास्त करनेवाला तली हुई । 33

[ 15/207–223 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उड़द और मूँगकी दालका सूप था। अन्य दोनोंमें खट्टी-मीठी चटनी, दालकी बड़ी देकर पाँच-छः प्रकारकी खट्टी चटनी आदि, मूँगकी दालका मीठा बड़ा, उड़दकी दालका मीठा बड़ा, पके केलेका मीठा बड़ा, मीठे-घने दूधसे बनी मिठाइयाँ, नारियलका पीठा और जितने भी प्रकारके मीठे व्यञ्जन हो सकते हैं, उन सबको परोसा। काँजी-बड़ा, दूधमें भिगोकर बनाया गया चिड़वा, लौकीकी खीर और अन्यान्य जितने प्रकारके मीठे व्यञ्जन बनाये, उनका वर्णन करनेमें भी मैं असमर्थ हूँ। घी डालकर बनायी गयी खीरको मिट्टीके पात्रमें भरकर उसमें चाँपाकला (एक प्रकारका केला), घना दूध और आमको मिला दिया। अति स्वादिष्ट लस्सी और भाँति-भाँतिके सन्देश (खोयेकी मिठाई) भी बनाये थे। बङ्गाल और उड़ीसामें खाये जानेवाले अनेक खाद्य पदार्थोंको बनाया ॥ 207-218 ॥ अनुभाष्य- 'उभारिल'—उड़ेल दिया। 'दुग्धतुम्बी'—दूधमें पकी हुई लौकी। 'बेसर'—पिसी सरसों डालकर बनायी गयी सब्जी, उड़ीसामें उसे 'बेसर' कहते हैं। 'शाक्रा'—चीनी डालकर बनायी गयी सब्जी। 'भृष्ट-वार्त्ताकी'—बैंगन-भाजा; 'कुष्माण्ड-मान-चाकी'—छोटे-छोटे टुकड़े करके पेठे और अरबीकी सब्जी। 'मधुराम्ल'—चटनी अथवा खट्टा-मीठा। 'बड़ाम्ल'—दालकी बड़ीके साथ बनायी गयी खट्टी चटनी। 'भृष्ट-माष-मुद्ग-सूप'—भुनी उड़दकी दाल और भुनी मूँगकी दाल। 'माष-बड़ा'—उड़दकी दालका बड़ा। 'दुग्ध-लकुलकी'—लौकीकी खीर ॥ 207-216 ॥ आसन और नैवेद्य-सज्जा :- श्रद्धा करि' भट्टाचार्य सब कराइल। शुभ्र-पीठोपरि सूक्ष्म वसन पातिल ॥ 219 ॥ दुइ-पाशे, सुगन्धि शीतल जल-झारी। अन्न-व्यञ्जनोपरि दिल तुलसी-मञ्जरी ॥ 220 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रद्धापूर्वक श्रीभट्टाचार्यने सब प्रकारके व्यञ्जनोंको बनाया। तब उन्होंने सफेद लकड़ीके आसनपर एक महीन वस्त्र बिछाया। उन्होंने आसनके दोनों ओर सुगन्धित शीतल जलसे भरी सुराहियाँ रखीं। उन्होंने चावल और अन्य व्यञ्जनोंपर तुलसी मञ्जरियोंको रखा ॥ 219-220 ॥ अनुभाष्य— 'शुभ्रपीठ'—सफेद चौकीके ऊपर एक सूक्ष्म-वस्त्रके द्वारा आसन दिया गया ॥ 219 ॥ अमृतगुटिका, पिठा-पानादि आइल। जगन्नाथ-प्रसाद सब पृथक् धरिल ॥ 221 ॥ अनुवाद—उन्होंने श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे अमृत-गुटिका और पीठा-पाना आदि जो मँगावाया था, उस जगन्नाथजीके प्रसादको अलगसे रखा ॥ 221 ॥ अनुभाष्य—ग्रन्थकार श्रीमद् कविराज गोस्वामीने भोगके अति सुन्दर वर्णनके द्वारा अपने अति उत्कृष्ट पाककला (रसोई बनानेकी कला) और प्रस्तुत करनेकी निपुणताको यहाँ प्रकाशित किया है। मध्यलीला 3/44-45 संख्या देखें। श्रीजगन्नाथ-प्रसादके साथ अपने घरपर बनाये गये अप्रसादी या अनर्पित-नैवेद्यको उन्होंने मिलाकर एक नहीं किया। वे इसके प्रति सावधान थे कि दोनों मिल नहीं जाँय, इसलिये उन्हें पृथक्-पृथक् रखा ॥ 207-221 ॥ मध्याह्न-स्नानके बाद अकेले महाप्रभुका आगमन :- हेनकाले महाप्रभु मध्याह्न करिया। एकले आइल ताँर हृदय जानिया ॥ 222 ॥ चरण धुलाकर श्रीभट्टाचार्यका महाप्रभुको घरके भीतर लाना :- भट्टाचार्य कैल तब पाद-प्रक्षालन। घरेर भितरे गेला करिते भोजन ॥ 223 ॥ अनुवाद—जब सब कुछ तैयारी हो गयी, तब महाप्रभु दोपहरका स्नानादि कृत्य करनेके बाद श्रीभट्टाचार्यकी हृदयकी अभिलाषा जानकर अकेले ही उनके घरपर आये। श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणकमल 34 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/222-234 ] धोये। तब महाप्रभु भोजन करनेके लिये कमरेके अन्दर गये॥ 222-223 ॥ नैवेद्यको देखकर महाप्रभुका विस्मय और भोगकी प्रशंसा :- अन्नादि देखिया प्रभु विस्मित हञा। भट्टाचार्ये कहे किछु भङ्गी करिया॥ 224 ॥ “अलौकिक एइ सब अन्न-व्यञ्जन। दुइ प्रहर भितरे केमने हैल रन्धन? ॥ 225 ॥ शत चुलाय शत जन पाक यदि करे। तबु शीघ्र एत द्रव्य रान्धिते ना पारे॥ 226 ॥ अनुवाद-महाप्रभु इतने सारे अन्न-व्यञ्जनादिको देखकर बहुत विस्मित हुए और उनकी ओर सङ्केत करते हुए उन्होंने श्रीभट्टाचार्यसे कहा,-“ये सब अन्न-व्यञ्जन तो बहुत अलौकिक हैं। दो प्रहर (छः घण्टे)के समयमें इतने प्रकारके व्यञ्जन कैसे तैयार हो गये? सौ चूलहोंपर सौ व्यक्ति भी यदि रसोई बनायें, तब भी इतनी जल्दी इतने सारे व्यञ्जन नहीं बना सकते॥ 224-226 ॥ तुलसी-मञ्जरीके दर्शनसे श्रीकृष्णके भोगका अनुमान :- कृष्णेर भोग लागाञाछ, — अनुमान करि। उपरे देखिये याते तुलसी-मञ्जरी ॥ 227 ॥ भाग्यवान् तुमि, तोमार सफल उद्योग। राधाकृष्णे लागाञाछ एतादृश भोग॥ 228 ॥ अन्नेर सौरभ्य, वर्ण—अति मनोरम। राधाकृष्ण साक्षात् इँहा करयाछेन भोजन ॥ 229 ॥ अनुवाद-सभी व्यञ्जनोंपर तुलसी मञ्जरीको देखकर मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने श्रीकृष्णको इनका भोग लगाया है। आप बहुत भाग्यवान् है, आपके द्वारा किया गया परिश्रम सफल है, क्योंकि आपने श्रीराधाकृष्णको ऐसा अद्भुत भोग लगाया है। अन्नकी सुगन्धि, वर्ण आदि अत्यन्त मनोरम हैं, इसलिये अवश्य ही श्रीराधाकृष्णने साक्षात् रूपसे इसको ग्रहण किया है॥ 227-229॥ अनुभाष्य-‘सौरभ्य'–सुगन्ध; ‘वर्ण'–सफेद वर्ण॥ 229 ॥ भोगकी प्रशंसाके बाद महाप्रभुके द्वारा अपने भाग्यकी प्रशंसा :- तोमार बहुत भाग्य कत प्रशंसिब। आमि-भाग्यवान्, इहार अवशेष पाब ॥ 230 ॥ अनुवाद-आपका भाग्य बहुत महान् है, उसकी कितनी प्रशंसा करूँगा? मैं भी बहुत भाग्यवान् हूँ जो कि इस भोगका अवशेष प्राप्त करूँगा॥ 230 ॥ श्रीकृष्णके आसनको उठाकर अलग पात्रमें प्रसादकी प्रार्थना :- कृष्णेर आसन-पीठ राखह उठाञा। मोरे प्रसाद देह' भिन्न पात्र करिया ॥ 231 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके आसन-चौकीको उठाकर ले जाओ। तब मुझे अलग पात्रमें प्रसाद दो॥" 231 ॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी कृपाके प्रभावका वर्णन :- भट्टाचार्य बले, — “प्रभु, ना करह विस्मय। येइ खाबे, ताँर शक्त्ये भोग सिद्ध हय ॥ 232 ॥ उद्योग ना छिल मोर गृहिणीर रन्धने। याँर शक्त्ये सिद्ध अन्न, सेइ ताहा जाने॥ 233 ॥ महाप्रभुको भोगका आसन अङ्गीकार करनेके लिये अनुरोध, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके आसनके प्रति मर्यादा-बुद्धिके कारण उसे स्वीकार करनेमें असम्मति :- एइ त' आसने बसि' करह भोजन।” प्रभु कहे, — “पूज्य एइ कृष्णेर आसन ॥” 234 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-“हे प्रभु, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। जो भी इस भोजनको ग्रहण करेगा, उसकी शक्ति और कृपासे ही यह सम्भव हुआ है। मैंने और मेरी पत्नीने रसोई बनानेमें कोई विशेष । 35

[ 15/232–237 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

प्रयास नहीं किया। जिनकी कृपासे भोग बना है, वे सब कुछ जानते हैं। आप इस आसनपर ही बैठकर भोजन कीजिये।” परन्तु महाप्रभुने कहा,–“श्रीकृष्णका यह आसन तो पूजनीय है॥” 232–234॥ श्रीकृष्णके द्वारा ग्रहण किया गया अन्न और आसन—दोनों ही प्रसाद :— भट्ट कहे,—“अन्न, पीठ,—समान प्रसाद। अन्न खाबे, पीठे बसिते काँहा अपराध?॥” 235॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,–“अन्नके समान आसन भी श्रीकृष्णका प्रसाद है। यदि अन्न खानेमें कोई अपराध नहीं है, तो फिर आसनपर बैठनेमें अपराध कैसे है?॥” 235॥ अनुभाष्य—अन्न और पीठ अथवा चौकी—दोनों ही श्रीकृष्णके द्वारा भोग किये गये निर्मल प्रसाद हैं। भोगके अन्नको ‘भगवान्का उच्छिष्ट’ जानकर भोजन करके सम्मान और भगवान्के आसनके कार्यमें लगी हुई जानकर चौकीको भी उनका अवशेष ‘प्रसाद’ समझकर ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे अपराध होगा?॥ 235॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यके सुसिद्धान्तकी प्रशंसा और (आसन) अङ्गीकार :— प्रभु कहे,—“भाल कैले, शास्त्र-आज्ञा हय। कृष्णेर सकल शेष भृत्य आस्वादय॥ 236॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आपका विचार अति सुन्दर है। शास्त्रकी भी आज्ञा है कि श्रीकृष्णके द्वारा छोड़ी गयी सभी वस्तुओंका ही दास आस्वादन करता है॥ 236॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णप्रसादी समस्त वस्तुएँ भक्तके लिये आस्वादनीय हैं, परन्तु मर्यादा और पूजनीयत्वकी रक्षा करते हुए। ये वस्तुएँ बाह्येन्द्रियोंके द्वारा पूर्ण रूपसे आस्वादनीय नहीं हैं, अन्तरेन्द्रियोंके द्वारा ही इनका पूर्ण आस्वादन सम्भव है।

श्रीहरिभक्तिविलास (1/80)में श्रीगुरुसेवाविधिके प्रसङ्गमें कूर्मपुराणमें श्रीव्यासगीतासे उद्धृत श्लोकमें कहा गया है— “नास्य निर्माल्यशयनं पादुकोपासनहावपि। आक्रामेदासनं छायामासन्दीं वा कदाचन॥” अर्थात् “शिष्यको श्रीगुरुदेवके निर्माल्य, काष्ठ-पादुका, चर्म-पादुका, आसन, छाया और चौकीका कभी भी लङ्घन नहीं करना चाहिये।” श्रीगुरुदेवकी पादुका शिष्यके लिये पूजनीय वस्तु है, शिष्य कभी उसे अपनी पादुकाके रूपमें स्वीकार नहीं करता है॥ 236॥ भगवान्के द्वारा भुक्त प्रसादको स्वीकार करनेसे ही दुष्पार मायाकी जय :— श्रीमद्भागवत (11/6/46)में— त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः। उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि॥ 237॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपको माला, गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार आदि जो कुछ अर्पित हुआ है, उससे विभूषित होकर आपके दासस्वरूप हम आपके समस्त उच्छिष्टका भोजन करते-करते ही आपकी मायाको जय करनेमें निश्चय ही समर्थ होंगे॥ 237॥ अनुभाष्य—भगवान् और उद्धवके वार्तालाप अथवा उद्धवगीताके आरम्भ होनेसे पूर्व भगवान्की इच्छासे द्वारकामें महा उत्पात आरम्भ होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा प्रपञ्चमें प्रकट-लीलाका सङ्गोपन और अप्रकट-लीलामें प्रवेश करनेकी इच्छाको जानकर प्रियतम सेवक उद्धव गाढ़ प्रीतिपूर्वक श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः (भवदुपभुक्त-माल्य- सुरभिवस्त्रभूषणैः चर्चिताः अलंकृताः) उच्छिष्टभोजिनः (उच्छिष्टं प्रसादान्नं भोक्तुं शीलं येषां ते) दासाः वयं (किङ्कराः) हि (निश्चयार्थे) तव मायां (दुरत्ययां प्रकृतिं) जयेम (जेतुं शक्नुयाम)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥

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पन्द्रहवाँ अध्याय [ 15/238–242 ]

महाप्रभुकी प्रचुर अन्न ग्रहण करनेमें आपत्ति; श्रीभट्टाचार्यकी उनसे शिकायत :— तथापि एतेक अन्न खाओन ना याय।” भट्ट कहे,—“जानि, खाओ यतेक युयाय॥ २३८ ॥ नीलाचले भोजन तुमि कर बायान्न बार। एक एक भोगेरे अन्न शत शत भार॥ २३९ ॥

अनुवाद—महाप्रभुने आगे कहा कि तो भी इतना अन्न नहीं खाया जा सकता।” श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“किन्तु मैं जानता हूँ कि आप कितना खा सकते हैं। नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें) आप दिनमें बावन बार भोजन करते हैं और हर बार आप सैकड़ों पात्रोंमें भरे भोगको खाते हैं॥ २३८-२३९ ॥

महाप्रभुका द्वारका, मथुरा और ब्रजलीलामें भोजन-प्रकार :— द्वारकाते षोल-सहस्र महिषीर घरे। अष्टादश माता, आर यादवेर घरे॥ २४० ॥ व्रजे ज्येठा, खुड़ा, मामा, पिसादि गोपगण। सखावृन्द सबार घरे द्विसन्ध्या-भोजन॥ २४१ ॥

अनुवाद—द्वारकामें सोलह हजार महिषियोंके घरोंमें, अठारह माताओं और यादवोंके घरोंमें एवं व्रजमें ताऊ, चाचा, मामा, फूफा आदि गोपों और सभी सखाओंके घरोंमें दोनों सन्ध्याओंमें आप भोजन करते हो॥ २४०-२४१ ॥

अनुभाष्य—'अष्टादश माता'—देवकी, रोहिणी आदि। 'व्रजे ज्येठा'—अर्थात् ताऊ। (श्रीरूपप्रभु कृत श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)— “उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितुः” अर्थात् 'उपनन्द' और 'अभिनन्द'—ये दोनों श्रीकृष्णके ताऊजी हैं। 'खुड़ा'—अर्थात् चाचा। (श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)— “पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सत्रन्द-नन्दनौ” अर्थात् 'सन्नन्द' और 'नन्दन' अथवा 'सुनन्द' और 'पाण्डव'—ये कृष्णके चाचा हैं।

'मामा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)— “यशोधर-यशोदेव-सुदेवाद्यास्तु मातुलाः” अर्थात् 'यशोधर', 'यशोदेव' और 'सुदेव' आदि श्रीकृष्णके मामा हैं। 'फूफा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)— “महानीलः सुनीलश्च रमणावेतयोः क्रमात्” अर्थात् 'महानील' और 'सुनील'—श्रीकृष्णके ये दो फूफा हैं, वे 'सानन्दा' और 'नन्दिनी'-नामक दो बुआओंके पति हैं। 'सखावृन्द'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकाके परिशिष्टमें)— “विशाल-वृषभौर्जस्वि-देवप्रस्थ-वरुथपाः। मन्दारः कुसुमापीडमणिबन्धकरास्तथाः॥ मन्दरश्चन्दनः कुन्दः कलिन्द-कुलिकादयः। 'कनिष्ठकल्पाः' सेवायां सखायो विपुलाग्रहाः॥ ” “श्रीदामा दामा सुदामा वसुदाम तथैव च। किङ्किणी-भद्रसेनांशु स्तोककृष्णाः विलासिनः। पुण्डरीक-विटङ्काक्ष-कलविङ्क-प्रियङ्गराः। एते 'प्रियसखाः' शान्ताः कृष्णप्राणसमा मताः॥ ” “सुबलाज्जुन-गन्धर्व-वसन्तोज्ज्वल-कोकिलाः। स-नन्दन-विदाग्धाद्याः प्रियनर्मसखा मताः॥ ” [अर्थात् “विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ, वरुथप, मन्दार, कुसुमापीड़, मणिबन्धकर, मन्दर, चन्दन, कुन्द, कलिन्द, कुलिक आदि अनेक श्रीकृष्णके 'सखा' हैं। ये श्रीकृष्णसे आयुमें छोटे हैं और सदा श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर रहते हैं। श्रीदाम, दाम, सुदाम, वसुदाम, किङ्किणी, भद्रसेन, अंशु, स्तोककृष्ण, विलासी, पुण्डरीक, विटङ्काक्ष, कलविङ्क, प्रियङ्कर—ये श्रीकृष्णके 'प्रियसखा' हैं और उनके समान आयुके हैं। सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दन और विदग्ध श्रीकृष्णके 'प्रियनर्मसखा' हैं।”] ॥ २४०-२४१ ॥

उस परिमाणकी तुलनामें श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अर्पित अन्न तो अति अल्प :— गोवर्धन-यज्ञे अन्न खाइला राशि राशि। तार लेखाय एइ अन्न नहे एक ग्रासी॥ २४२ ॥

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[ 15/242-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—गोवर्धनके अन्नकूटमें भी आपने जितना भोजन किया था, उसकी तुलनामें यह अन्न तो एक ग्रास भी नहीं है॥ 242 ॥ अनुभाष्य—'तार लेखाय'—उसकी तुलनामें अथवा अनुपातमें॥ 242 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दैन्य :- तुमि त' ईश्वर, मुञि-क्षुद्र जीव छार। एक-ग्रास माधुकरी करह अङ्गीकार ॥" 243 ॥ अनुवाद—आप तो ईश्वर हैं और मैं एक अति क्षुद्र जीव हूँ। कृपया मेरे घरमें इस एक ग्रासको स्वीकार कीजिये॥" 243 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माधुकरी'—मधुमक्खीकी वृत्तिके द्वारा प्राप्त ग्रास॥ 243 ॥ श्रीभट्टाचार्यके वचन सुनकर महाप्रभुका प्रसाद-सेवन :- एत शुनि' हासि' प्रभु बसिला भोजने। जगन्नाथेर प्रसाद भट्ट देन हर्ष-मने ॥ 244 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मुस्कुराये और भोजन करनेके लिये बैठे। श्रीभट्टाचार्यने बड़े आनन्दसे पहले उन्हें श्रीजगन्नाथका प्रसाद लाकर दिया॥ 244 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दामाद-षाठीका पति महाप्रभुका निन्दक 'अमोघ' :- हेनकाले 'अमोघ', —भट्टाचार्येर जामाता। कुलीन, निन्दक तैंहो षाठी-कन्यार भर्त्ता ॥ 245 ॥ अनुवाद—इसी समय श्रीभट्टाचार्यका दामाद अमोघ जो उनकी पुत्री षाठीका पति था, वहाँ आ गया। यद्यपि उसका जन्म उच्च ब्राह्मणकुलमें हुआ था, तथापि वह दूसरोंके दोष देखता और निन्दा करता था॥ 245 ॥ श्रीभट्टाचार्यको हाथमें लाठी लिये देखकर अमोघको भय :- भोजन देखिते चाहे, आसिते ना पारे। लाठी-हाते भट्टाचार्य आछेन दुआरे ॥ 246 ॥ अनुवाद—वह देखना चाहता था कि महाप्रभु क्या खा रहे हैं, किन्तु वह भीतर आ नहीं सका, क्योंकि श्रीभट्टाचार्य अपने हाथमें लाठी लेकर द्वारपर बैठे हुए थे॥ 246 ॥ श्रीभट्टाचार्यका ध्यान बँटनेपर महाप्रभुके पात्रमें बहुत अन्नको देखकर महाप्रभुकी निन्दा :- तैंहो यदि प्रसाद दिते हैला आन-मन। अमोघ आसि' अन्न देखि' करये निन्दन ॥ 247 ॥ “एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन। एकेला संन्यासी करे एतेक भक्षण !” ॥ 248 ॥ अनुवाद—जैसे ही श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुको भोजन परोसने लगे और थोड़ा असावधान हो गये, उसी समय अमोघ भीतर आ गया। इतनी सारी भोजन-सामग्रीको देखकर वह निन्दा करने लगा, —“इतने भोजनसे तो दस-बारह लोगोंका पेट भर सकता है और यहाँ केवल एक ही संन्यासी इतना सब खा रहा है॥" 247-248 ॥ श्रीभट्टाचार्यके मुड़कर देखते ही अमोघका वहाँसे भाग जाना :- शुनि' भट्टाचार्य तबे उलटि' चाहिल। ताँर अवधान देखि' अमोघ पलाइल ॥ 249 ॥ अनुवाद—अमोघकी बात सुनकर श्रीभट्टाचार्यने दृष्टि घुमाकर उसे देखा। श्रीभट्टाचार्यको सावधान देखकर अमोघ तुरन्त वहाँसे भाग गया॥ 249 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अवधान'—सावधान॥ 249 ॥ श्रीभट्टाचार्यका हाथमें लाठी लेकर उसके पीछे दौड़ना :- भट्टाचार्य लाठि लञा मारिते धाइल। पलाइल अमोघ, तार लाग ना पाइल ॥ 250 ॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्य लाठी लेकर उसे मारनेके लिये दौड़े, किन्तु अमोघ इतनी तेजीसे भागा कि श्रीभट्टाचार्य उसे पकड़ नहीं पाये॥ 250 ॥ 38 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/251-260 ] श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभु-निन्दक अमोघकी तीव्र निन्दा और शाप :- तबे गालि, शाप दिते भट्टाचार्य आइला। निन्दा शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला ॥ 251 ॥ अनुवाद-तब श्रीभट्टाचार्य उसे गाली निकालते हुए और शाप देते हुए लौट आये। उनके मुखसे अमोघकी निन्दाको सुनकर महाप्रभु हँसने लगे ॥ 251 ॥ महाप्रभुकी निन्दा सुनकर श्रीभट्टाचार्यकी पत्नीको दुःख :- शुनि' षाठीर माता शिरे-बुके घात मारे। 'षाठी राण्डी हउक'-इहा बले बारे बारे ॥ 252 ॥ अनुवाद-इस घटनाको सुनकर षाठीकी माता (श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी) अपने सिर और छातीको पीटने लगी और बार-बार कहने लगीं,- 'षाठी विधवा हो जाय ॥' 252 ॥ महाप्रभुके द्वारा दोनोंको सान्त्वना देनेके बाद प्रसाद-सेवन :- दुँहार दुःख देखि' प्रभु दुँहा प्रबोधिया। दुँहार इच्छाते भोजन कैल तुष्ट हञा ॥ 253 ॥ अनुवाद-दोनोंको दुःखी देखकर महाप्रभुने उन दोनोंको सान्त्वना प्रदान की। उन दोनोंकी इच्छासे महाप्रभुने भोजन ग्रहण किया और वे सन्तुष्ट हुए ॥ 253 ॥ महाप्रभुका आचमन :- आचमन कराञा भट्ट दिल मुखवास। तुलसी-मञ्जरी, लवङ्ग, एलाचि रसवास ॥ 254 ॥ सर्वाङ्गे लेपिल प्रभुर सुगन्धि चन्दन। दण्डवत् हञा बले सदैन्य वचन ॥ 255 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको आचमन करानेके बाद श्रीभट्टाचार्यने उन्हें तुलसी-मञ्जरी, लौंग, सुगन्धित रसीली इलायची आदि प्रस्तुत की। तब उन्होंने महाप्रभुके सभी अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया और उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके दीनतापूर्वक कहने लगे ॥ 254-255 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'एलाचि रसवास' - रस और सुगन्धयुक्त इलायची ॥ 254 ॥ अमोघके द्वारा की गयी निन्दाके लिये क्षमा-प्रार्थना :- निन्दा कराइते तोमा आनिनु निज-घरे। एइ अपराध, प्रभु, क्षमा कर मोरे ॥ 256 ॥ अनुवाद-मैंने आपकी निन्दा करवानेके लिये आपको अपने घरपर बुलाया था। मुझसे यह बहुत बड़ा अपराध हुआ है। हे प्रभो! कृपा करके आप मेरे इस अपराधको क्षमा कीजिये ॥ 256 ॥ अदोषदर्शी महाप्रभु :- प्रभु कहे, - "निन्दा नहे, 'सहज' कहिल। इहाते तोमार तार कि अपराध हैल?" ॥ 257 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"अमोघने निन्दा नहीं की, बल्कि 'सत्य' बात ही कही। इसमें तुम्हारा या उसका क्या अपराध हुआ? ॥ " 257 ॥ महाप्रभुके पीछे-पीछे श्रीभट्टाचार्यका चलना :- एत बलि' महाप्रभु चलिला भवने। भट्टाचार्य ताँर घरे गेला ताँर सने ॥ 258 ॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभु अपने वास-स्थानकी ओर चल दिये। श्रीभट्टाचार्य भी उनके साथ उनके घर तक गये ॥ 258 ॥ श्रीभट्टाचार्यका बहुत दैन्य और शरणागति :- प्रभु-पदे बहु आत्मनिवेदन कैल। ताँरे शान्त करि' प्रभु घरे पाठाइल ॥ 259 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणोंमें पड़कर अनेक प्रकारसे अपने हृदयकी ग्लानिको व्यक्त किया। तब महाप्रभुने उन्हें शान्त करके उनके घर वापिस भेजा ॥ 259 ॥ घरमें पत्नीके साथ श्रीभट्टाचार्यकी गम्भीर खेद-उक्ति :- घरे आसि' भट्टाचार्य षाठीर माता-सने। आपना निन्दिया किछु बलेन वचने ॥ 260 ॥ । 39

[ 15/260-261 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीचैतन्य-निन्दकका वध ही उसके द्वारा किये गये अपराधका प्रायश्चित :- “चैतन्य-गोसाञिर निन्दा शुनि याहा हैते। तारे वध कैले, हय पाप-प्रायश्चित्ते॥ 261 ॥ अनुवाद-घरमें लौटकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य अपनी पत्नी, षाठीकी माताके साथ बैठकर अपनी निन्दा करने लगे। तब उन्होंने कहा,-“श्रीचैतन्य गोसाईंकी निन्दा जिसके मुखसे सुनी है, उसका वध करनेसे ही उसके पापोंका प्रायश्चित हो सकता है॥ 260-261 ॥ अनुभाष्य - वैष्णव-निन्दाका फल'-(हःभःविः, 10वें विः में उद्धृत स्कन्दपुराणके मार्कण्डेय-भगीरथ-संवादमें)- “यो हि भागवतं लोकमुपहासं नृपोत्तम। करोति तस्य नश्यन्ति अर्थधर्मयशःसुताः॥ निन्दां कुर्वन्ति ये मूढ़ा वैष्णवानां महात्मनाम्। पतन्ति पितृभिः सार्द्धं महारौरवसंज्ञिते ॥ हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनन्दति। क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने 'पतनानि षट्' ॥” (हःभःविः, 10वें विः में उद्धृत द्वारकामाहात्म्यमें प्रह्लाद-बलि-संवादमें)- “करपत्रैश्च फाल्यन्ते सुतीब्रैर्यमशासनैः। निन्दां कुर्वन्ति ये पापाः वैष्णवानां महात्मनाम्॥” [अर्थात् “हे नृपवर ! जो वैष्णवका उपहास करते हैं, उनके अर्थ, धर्म, यश और सन्तान आदि विनष्ट हो जाते हैं। जो सब मूढ़ व्यक्ति महात्मा वैष्णवोंकी निन्दा करते हैं, वे पितृ-पुरुषों सहित महारौरव-नामक नरकमें पतित होते हैं। वैष्णवपर प्रहार, उनकी निन्दा, उनसे विद्वेष, प्रणामादिके द्वारा उनका अभिनन्दन नहीं करना, वैष्णवके प्रति क्रोध प्रकाशित करना और वैष्णवके दर्शनसे आनन्दित नहीं होना-ये छः पतनके कारण हैं। जो समस्त पापी महात्मा वैष्णवोंकी निन्दा करते हैं, वे यमके शासनके कारण अत्यन्त तीखे आरेके जैसे अस्त्रके द्वारा खण्डित किये जाते हैं।”] 'विष्णुनिन्दा-फल'-(भक्तिसन्दर्भमें 314 संख्यामें उद्धृत भाः 7/1/16, 22 श्लोककी टीका देखें)। “ये निन्दन्ति हृषीकेशं तद्भक्तं पुण्यरूपिणम्। शतजन्मार्जितं पुण्यं तेषां नश्यति निश्चितम्॥ ते पच्यन्ते महाघोरे कुम्भीपाके भयानके। भक्षिताः कीटसङ्घेन यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ श्रीविष्णोरवमानाद् गुरुतरं श्रीवैष्णवोल्लङ्घनम्। तदीयदूषकजनान् न पश्येत् पुरुषाधमान्। तैः सार्द्धं वञ्चकजनैः सहवासं न कारयेत् ॥” श्रीजीवप्रभु कृत 'भक्तिसन्दर्भमें' - नामपराधान्तर्गत 'साधुनिन्दा'-फल-वर्णन-प्रसङ्गमें 265 संख्यामें उद्धृत (भाः 10/74/40)- 'निन्दां भगवतः शृण्वन् तत्परस्य जनस्य वा। ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्च्युतः ॥' ततोऽपगमश्चासमर्थस्य एव; समर्थेन तु निन्दकजिह्वा छेत्तव्या; तत्राप्यसमर्थेन स्वप्राणपरित्यागोऽपि कर्तव्यः। यथोक्तं देव्या - (भाः 4/4/17)- “कर्णौ पिधाय निरयात् यदकल्प ईशे धर्मावितर्यशृणिभिर्नृभिरस्यमाने। छिन्द्यात् प्रसह्य रुषतीमसतां प्रभुश्चे- ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत् स धर्मः ॥” इति। [अर्थात् “जो श्रीहृषीकेश एवं उनके पवित्र भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंमें अर्जित पुण्य निश्चित रूपसे विनष्ट हो जाते हैं। जब तक चन्द्र और सूर्य विद्यमान रहते हैं, तब तक भयानक महाघोर कुम्भीपाक नरकमें वे कीटोंके द्वारा खाये जाते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी अवज्ञाकी अपेक्षा श्रीवैष्णवका उल्लङ्घन अधिक भारी अपराध है। इसलिये विष्णुभक्तोंकी निन्दा करनेवाले अधम पुरुषोंका दर्शन नहीं करना चाहिये और ऐसे झूठे आक्षेप करनेवालोंके साथ एक स्थानपर भी नहीं रहना चाहिये।” श्रीभक्तिसन्दर्भमें साधुनिन्दाके फलके वर्णनके प्रसङ्गमें-“श्रीभगवान्‌की अथवा भगवद्भक्तकी निन्दा सुनकर जो उस स्थानको छोड़कर नहीं चले जाते, वे भी सुकृतिसे च्युत होकर अधोगतिको प्राप्त करते हैं।”-यहाँ जो उस स्थानसे चले जानेका विधान 40 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/261-264 ] है, वह केवल असमर्थ व्यक्तिके लिये है। किन्तु सामर्थ्य होनेपर उक्त निन्दककी जिह्वा काट देनी चाहिये। ऐसा करनेमें असमर्थ होनेपर अपने प्राणोंका परित्याग करना ही कर्त्तव्य बन जाता है। जैसे, श्रीपार्वतीने कहा,—“कोई दुस्साहसी व्यक्ति धर्मरक्षक महापुरुषकी निन्दा करे और यदि उक्त निन्दकके विनाश करनेमें अथवा अपने प्राणोंके त्यागमें कोई समर्थ नहीं हो, तो उसके लिये दोनों कानोंको बन्द करके उस स्थानसे चले जाना ही कर्तव्य है। समर्थ होनेपर उस दुर्जनकी कटुभाषिणी जिह्वाको बलपूर्वक काटकर (निन्दा श्रवणरूपी पापका प्रायश्चित करनेके लिये) स्वयं प्राण त्याग करना चाहिये—यही धर्मके रूपमें कहा गया है।”] ॥ 261 ॥ ऐसे करनेमें असमर्थ व्यक्तिके लिये प्राण-त्याग; किन्तु स्वयं और दामाद, दोनों ही 'शौक्र-ब्राह्मण' होनेके कारण हत्याके अयोग्य :— किम्वा निज-प्राण यदि करि विमोचन। दुइ योग्य नहे, दुइ—शरीर ब्राह्मण ॥ 262 ॥ हरि-गुरु-वैष्णवके निन्दकका सङ्ग सम्पूर्ण रूपसे परित्याग करने योग्य, उनके मुखका दर्शन भी अनुचित :— पुनः सेइ निन्दकेर मुख ना देखिब। परित्याग कैलुँ, तार नाम ना लइब ॥ 263 ॥ अनुवाद—अथवा अपने प्राणोंका त्याग कर दूँ। किन्तु ये दोनों कार्य ही उचित नहीं हैं, क्योंकि हम दोनों ही शरीरसे ब्राह्मण हैं। मैं फिर कभी भी उस निन्दकका मुख नहीं देखूँगा। मैं उसका सदाके लिये परित्याग करता हूँ, आजके बाद मैं उसका नाम तक भी नहीं लूँगा ॥ 262-263 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अमोघ-ब्राह्मण है, उसका वध नहीं किया जा सकता; [श्रीभट्टाचार्य] स्वयं भी ब्राह्मण हैं, आत्महत्या भी अनुचित हैं, दोनों कार्य ही करनेके योग्य नहीं हैं। इसलिये उस निन्दकका मुख नहीं देखना ही कर्त्तव्य है ॥ 262-263 ॥ अनुभाष्य—भाः 1/7/53 श्लोक—“ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः”—इसकी श्रीधरटीकामें उद्धृत स्मृतिके वचनमें ब्रह्म-बन्धुके वध-समर्थनकी व्यवस्था— “आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम्। जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्।” पुनः (भाः 1/7/57 श्लोक)—“वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्वापनं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः॥” [अर्थात् (भाः 1/7/53)—“ब्राह्मणके अधम होनेपर भी उसे मारना उचित नहीं है, आततायी वधके योग्य है।” इसकी श्रीधरपाद-कृत टीकामें,—“वध करनेकी इच्छासे आनेवाले वेदान्तमें निपुण आततायीको मारनेसे उसके द्वारा ब्रह्महत्या नहीं होती।” (भाः 1/7/57)—“सिरका मुण्डन, धन-छीन लेना और उसे उसके स्थानसे निकाल देना—इस प्रकार ही अधम ब्राह्मणोंका वध हुआ करता है; उनके लिये सिर काटना आदि अन्य दैहिक वधका विधान नहीं है।”] ॥ 262 ॥ हरि-गुरु-वैष्णव-द्वेषी पति-पत्नीके द्वारा निश्चित रूपसे त्याग करने योग्य :— षाठीरे कह—तारे छाड़ुक, से हइल 'पतित'। 'पतित' हइले भर्त्ता, त्यजिते उचित ॥ 264 ॥ अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्यने अपनी पत्नीसे कहा—तुम षाठीसे कहो कि वह उसे छोड़ दे, क्योंकि वह पतित हो गया है। पतिके पतित हो जानेपर उसे त्याग करना ही उचित है ॥ 264 ॥ अनुभाष्य—(भाः 5/5/18)—“न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्” अर्थात् जो स्वयं श्रीकृष्णभजन नहीं करते, और न ही श्रीकृष्णविमुखता अथवा श्रीकृष्ण-विस्मृतिरूपी निकट उपस्थित मृत्युके हाथसे पत्नीकी रक्षा कर सकते हैं, वे पतित हैं, इसलिये वे पति नहीं हैं। बाहरी दृष्टिकोणसे,—श्रीकृष्णके प्रति समर्पित आत्मा पत्नीरूपी कोई भक्त यदि निष्कपटरूपसे शुद्ध श्रीकृष्णभजनके उद्देश्यसे द्विजपत्नियोंकी भाँति श्रीकृष्णके अभक्त अथवा विरोधी 'पति'-अभिमानी । 41