भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1481, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1481

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/222-234 ] धोये। तब महाप्रभु भोजन करनेके लिये कमरेके अन्दर गये॥ 222-223 ॥ नैवेद्यको देखकर महाप्रभुका विस्मय और भोगकी प्रशंसा :- अन्नादि देखिया प्रभु विस्मित हञा। भट्टाचार्ये कहे किछु भङ्गी करिया॥ 224 ॥ “अलौकिक एइ सब अन्न-व्यञ्जन। दुइ प्रहर भितरे केमने हैल रन्धन? ॥ 225 ॥ शत चुलाय शत जन पाक यदि करे। तबु शीघ्र एत द्रव्य रान्धिते ना पारे॥ 226 ॥ अनुवाद-महाप्रभु इतने सारे अन्न-व्यञ्जनादिको देखकर बहुत विस्मित हुए और उनकी ओर सङ्केत करते हुए उन्होंने श्रीभट्टाचार्यसे कहा,-“ये सब अन्न-व्यञ्जन तो बहुत अलौकिक हैं। दो प्रहर (छः घण्टे)के समयमें इतने प्रकारके व्यञ्जन कैसे तैयार हो गये? सौ चूलहोंपर सौ व्यक्ति भी यदि रसोई बनायें, तब भी इतनी जल्दी इतने सारे व्यञ्जन नहीं बना सकते॥ 224-226 ॥ तुलसी-मञ्जरीके दर्शनसे श्रीकृष्णके भोगका अनुमान :- कृष्णेर भोग लागाञाछ, — अनुमान करि। उपरे देखिये याते तुलसी-मञ्जरी ॥ 227 ॥ भाग्यवान् तुमि, तोमार सफल उद्योग। राधाकृष्णे लागाञाछ एतादृश भोग॥ 228 ॥ अन्नेर सौरभ्य, वर्ण—अति मनोरम। राधाकृष्ण साक्षात् इँहा करयाछेन भोजन ॥ 229 ॥ अनुवाद-सभी व्यञ्जनोंपर तुलसी मञ्जरीको देखकर मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने श्रीकृष्णको इनका भोग लगाया है। आप बहुत भाग्यवान् है, आपके द्वारा किया गया परिश्रम सफल है, क्योंकि आपने श्रीराधाकृष्णको ऐसा अद्भुत भोग लगाया है। अन्नकी सुगन्धि, वर्ण आदि अत्यन्त मनोरम हैं, इसलिये अवश्य ही श्रीराधाकृष्णने साक्षात् रूपसे इसको ग्रहण किया है॥ 227-229॥ अनुभाष्य-‘सौरभ्य'–सुगन्ध; ‘वर्ण'–सफेद वर्ण॥ 229 ॥ भोगकी प्रशंसाके बाद महाप्रभुके द्वारा अपने भाग्यकी प्रशंसा :- तोमार बहुत भाग्य कत प्रशंसिब। आमि-भाग्यवान्, इहार अवशेष पाब ॥ 230 ॥ अनुवाद-आपका भाग्य बहुत महान् है, उसकी कितनी प्रशंसा करूँगा? मैं भी बहुत भाग्यवान् हूँ जो कि इस भोगका अवशेष प्राप्त करूँगा॥ 230 ॥ श्रीकृष्णके आसनको उठाकर अलग पात्रमें प्रसादकी प्रार्थना :- कृष्णेर आसन-पीठ राखह उठाञा। मोरे प्रसाद देह' भिन्न पात्र करिया ॥ 231 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके आसन-चौकीको उठाकर ले जाओ। तब मुझे अलग पात्रमें प्रसाद दो॥" 231 ॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी कृपाके प्रभावका वर्णन :- भट्टाचार्य बले, — “प्रभु, ना करह विस्मय। येइ खाबे, ताँर शक्त्ये भोग सिद्ध हय ॥ 232 ॥ उद्योग ना छिल मोर गृहिणीर रन्धने। याँर शक्त्ये सिद्ध अन्न, सेइ ताहा जाने॥ 233 ॥ महाप्रभुको भोगका आसन अङ्गीकार करनेके लिये अनुरोध, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके आसनके प्रति मर्यादा-बुद्धिके कारण उसे स्वीकार करनेमें असम्मति :- एइ त' आसने बसि' करह भोजन।” प्रभु कहे, — “पूज्य एइ कृष्णेर आसन ॥” 234 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-“हे प्रभु, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। जो भी इस भोजनको ग्रहण करेगा, उसकी शक्ति और कृपासे ही यह सम्भव हुआ है। मैंने और मेरी पत्नीने रसोई बनानेमें कोई विशेष । 35

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