भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1482, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1482

[ 15/232–237 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

प्रयास नहीं किया। जिनकी कृपासे भोग बना है, वे सब कुछ जानते हैं। आप इस आसनपर ही बैठकर भोजन कीजिये।” परन्तु महाप्रभुने कहा,–“श्रीकृष्णका यह आसन तो पूजनीय है॥” 232–234॥ श्रीकृष्णके द्वारा ग्रहण किया गया अन्न और आसन—दोनों ही प्रसाद :— भट्ट कहे,—“अन्न, पीठ,—समान प्रसाद। अन्न खाबे, पीठे बसिते काँहा अपराध?॥” 235॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,–“अन्नके समान आसन भी श्रीकृष्णका प्रसाद है। यदि अन्न खानेमें कोई अपराध नहीं है, तो फिर आसनपर बैठनेमें अपराध कैसे है?॥” 235॥ अनुभाष्य—अन्न और पीठ अथवा चौकी—दोनों ही श्रीकृष्णके द्वारा भोग किये गये निर्मल प्रसाद हैं। भोगके अन्नको ‘भगवान्का उच्छिष्ट’ जानकर भोजन करके सम्मान और भगवान्के आसनके कार्यमें लगी हुई जानकर चौकीको भी उनका अवशेष ‘प्रसाद’ समझकर ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे अपराध होगा?॥ 235॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यके सुसिद्धान्तकी प्रशंसा और (आसन) अङ्गीकार :— प्रभु कहे,—“भाल कैले, शास्त्र-आज्ञा हय। कृष्णेर सकल शेष भृत्य आस्वादय॥ 236॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आपका विचार अति सुन्दर है। शास्त्रकी भी आज्ञा है कि श्रीकृष्णके द्वारा छोड़ी गयी सभी वस्तुओंका ही दास आस्वादन करता है॥ 236॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णप्रसादी समस्त वस्तुएँ भक्तके लिये आस्वादनीय हैं, परन्तु मर्यादा और पूजनीयत्वकी रक्षा करते हुए। ये वस्तुएँ बाह्येन्द्रियोंके द्वारा पूर्ण रूपसे आस्वादनीय नहीं हैं, अन्तरेन्द्रियोंके द्वारा ही इनका पूर्ण आस्वादन सम्भव है।

श्रीहरिभक्तिविलास (1/80)में श्रीगुरुसेवाविधिके प्रसङ्गमें कूर्मपुराणमें श्रीव्यासगीतासे उद्धृत श्लोकमें कहा गया है— “नास्य निर्माल्यशयनं पादुकोपासनहावपि। आक्रामेदासनं छायामासन्दीं वा कदाचन॥” अर्थात् “शिष्यको श्रीगुरुदेवके निर्माल्य, काष्ठ-पादुका, चर्म-पादुका, आसन, छाया और चौकीका कभी भी लङ्घन नहीं करना चाहिये।” श्रीगुरुदेवकी पादुका शिष्यके लिये पूजनीय वस्तु है, शिष्य कभी उसे अपनी पादुकाके रूपमें स्वीकार नहीं करता है॥ 236॥ भगवान्के द्वारा भुक्त प्रसादको स्वीकार करनेसे ही दुष्पार मायाकी जय :— श्रीमद्भागवत (11/6/46)में— त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः। उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि॥ 237॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपको माला, गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार आदि जो कुछ अर्पित हुआ है, उससे विभूषित होकर आपके दासस्वरूप हम आपके समस्त उच्छिष्टका भोजन करते-करते ही आपकी मायाको जय करनेमें निश्चय ही समर्थ होंगे॥ 237॥ अनुभाष्य—भगवान् और उद्धवके वार्तालाप अथवा उद्धवगीताके आरम्भ होनेसे पूर्व भगवान्की इच्छासे द्वारकामें महा उत्पात आरम्भ होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा प्रपञ्चमें प्रकट-लीलाका सङ्गोपन और अप्रकट-लीलामें प्रवेश करनेकी इच्छाको जानकर प्रियतम सेवक उद्धव गाढ़ प्रीतिपूर्वक श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— त्वयोपयुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिताः (भवदुपभुक्त-माल्य- सुरभिवस्त्रभूषणैः चर्चिताः अलंकृताः) उच्छिष्टभोजिनः (उच्छिष्टं प्रसादान्नं भोक्तुं शीलं येषां ते) दासाः वयं (किङ्कराः) हि (निश्चयार्थे) तव मायां (दुरत्ययां प्रकृतिं) जयेम (जेतुं शक्नुयाम)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 237॥

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