श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1487, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/261-264 ] है, वह केवल असमर्थ व्यक्तिके लिये है। किन्तु सामर्थ्य होनेपर उक्त निन्दककी जिह्वा काट देनी चाहिये। ऐसा करनेमें असमर्थ होनेपर अपने प्राणोंका परित्याग करना ही कर्त्तव्य बन जाता है। जैसे, श्रीपार्वतीने कहा,—“कोई दुस्साहसी व्यक्ति धर्मरक्षक महापुरुषकी निन्दा करे और यदि उक्त निन्दकके विनाश करनेमें अथवा अपने प्राणोंके त्यागमें कोई समर्थ नहीं हो, तो उसके लिये दोनों कानोंको बन्द करके उस स्थानसे चले जाना ही कर्तव्य है। समर्थ होनेपर उस दुर्जनकी कटुभाषिणी जिह्वाको बलपूर्वक काटकर (निन्दा श्रवणरूपी पापका प्रायश्चित करनेके लिये) स्वयं प्राण त्याग करना चाहिये—यही धर्मके रूपमें कहा गया है।”] ॥ 261 ॥ ऐसे करनेमें असमर्थ व्यक्तिके लिये प्राण-त्याग; किन्तु स्वयं और दामाद, दोनों ही 'शौक्र-ब्राह्मण' होनेके कारण हत्याके अयोग्य :— किम्वा निज-प्राण यदि करि विमोचन। दुइ योग्य नहे, दुइ—शरीर ब्राह्मण ॥ 262 ॥ हरि-गुरु-वैष्णवके निन्दकका सङ्ग सम्पूर्ण रूपसे परित्याग करने योग्य, उनके मुखका दर्शन भी अनुचित :— पुनः सेइ निन्दकेर मुख ना देखिब। परित्याग कैलुँ, तार नाम ना लइब ॥ 263 ॥ अनुवाद—अथवा अपने प्राणोंका त्याग कर दूँ। किन्तु ये दोनों कार्य ही उचित नहीं हैं, क्योंकि हम दोनों ही शरीरसे ब्राह्मण हैं। मैं फिर कभी भी उस निन्दकका मुख नहीं देखूँगा। मैं उसका सदाके लिये परित्याग करता हूँ, आजके बाद मैं उसका नाम तक भी नहीं लूँगा ॥ 262-263 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अमोघ-ब्राह्मण है, उसका वध नहीं किया जा सकता; [श्रीभट्टाचार्य] स्वयं भी ब्राह्मण हैं, आत्महत्या भी अनुचित हैं, दोनों कार्य ही करनेके योग्य नहीं हैं। इसलिये उस निन्दकका मुख नहीं देखना ही कर्त्तव्य है ॥ 262-263 ॥ अनुभाष्य—भाः 1/7/53 श्लोक—“ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः”—इसकी श्रीधरटीकामें उद्धृत स्मृतिके वचनमें ब्रह्म-बन्धुके वध-समर्थनकी व्यवस्था— “आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम्। जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्।” पुनः (भाः 1/7/57 श्लोक)—“वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्वापनं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः॥” [अर्थात् (भाः 1/7/53)—“ब्राह्मणके अधम होनेपर भी उसे मारना उचित नहीं है, आततायी वधके योग्य है।” इसकी श्रीधरपाद-कृत टीकामें,—“वध करनेकी इच्छासे आनेवाले वेदान्तमें निपुण आततायीको मारनेसे उसके द्वारा ब्रह्महत्या नहीं होती।” (भाः 1/7/57)—“सिरका मुण्डन, धन-छीन लेना और उसे उसके स्थानसे निकाल देना—इस प्रकार ही अधम ब्राह्मणोंका वध हुआ करता है; उनके लिये सिर काटना आदि अन्य दैहिक वधका विधान नहीं है।”] ॥ 262 ॥ हरि-गुरु-वैष्णव-द्वेषी पति-पत्नीके द्वारा निश्चित रूपसे त्याग करने योग्य :— षाठीरे कह—तारे छाड़ुक, से हइल 'पतित'। 'पतित' हइले भर्त्ता, त्यजिते उचित ॥ 264 ॥ अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्यने अपनी पत्नीसे कहा—तुम षाठीसे कहो कि वह उसे छोड़ दे, क्योंकि वह पतित हो गया है। पतिके पतित हो जानेपर उसे त्याग करना ही उचित है ॥ 264 ॥ अनुभाष्य—(भाः 5/5/18)—“न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्” अर्थात् जो स्वयं श्रीकृष्णभजन नहीं करते, और न ही श्रीकृष्णविमुखता अथवा श्रीकृष्ण-विस्मृतिरूपी निकट उपस्थित मृत्युके हाथसे पत्नीकी रक्षा कर सकते हैं, वे पतित हैं, इसलिये वे पति नहीं हैं। बाहरी दृष्टिकोणसे,—श्रीकृष्णके प्रति समर्पित आत्मा पत्नीरूपी कोई भक्त यदि निष्कपटरूपसे शुद्ध श्रीकृष्णभजनके उद्देश्यसे द्विजपत्नियोंकी भाँति श्रीकृष्णके अभक्त अथवा विरोधी 'पति'-अभिमानी । 41