श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1486, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/260-261 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीचैतन्य-निन्दकका वध ही उसके द्वारा किये गये अपराधका प्रायश्चित :- “चैतन्य-गोसाञिर निन्दा शुनि याहा हैते। तारे वध कैले, हय पाप-प्रायश्चित्ते॥ 261 ॥ अनुवाद-घरमें लौटकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य अपनी पत्नी, षाठीकी माताके साथ बैठकर अपनी निन्दा करने लगे। तब उन्होंने कहा,-“श्रीचैतन्य गोसाईंकी निन्दा जिसके मुखसे सुनी है, उसका वध करनेसे ही उसके पापोंका प्रायश्चित हो सकता है॥ 260-261 ॥ अनुभाष्य - वैष्णव-निन्दाका फल'-(हःभःविः, 10वें विः में उद्धृत स्कन्दपुराणके मार्कण्डेय-भगीरथ-संवादमें)- “यो हि भागवतं लोकमुपहासं नृपोत्तम। करोति तस्य नश्यन्ति अर्थधर्मयशःसुताः॥ निन्दां कुर्वन्ति ये मूढ़ा वैष्णवानां महात्मनाम्। पतन्ति पितृभिः सार्द्धं महारौरवसंज्ञिते ॥ हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनन्दति। क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने 'पतनानि षट्' ॥” (हःभःविः, 10वें विः में उद्धृत द्वारकामाहात्म्यमें प्रह्लाद-बलि-संवादमें)- “करपत्रैश्च फाल्यन्ते सुतीब्रैर्यमशासनैः। निन्दां कुर्वन्ति ये पापाः वैष्णवानां महात्मनाम्॥” [अर्थात् “हे नृपवर ! जो वैष्णवका उपहास करते हैं, उनके अर्थ, धर्म, यश और सन्तान आदि विनष्ट हो जाते हैं। जो सब मूढ़ व्यक्ति महात्मा वैष्णवोंकी निन्दा करते हैं, वे पितृ-पुरुषों सहित महारौरव-नामक नरकमें पतित होते हैं। वैष्णवपर प्रहार, उनकी निन्दा, उनसे विद्वेष, प्रणामादिके द्वारा उनका अभिनन्दन नहीं करना, वैष्णवके प्रति क्रोध प्रकाशित करना और वैष्णवके दर्शनसे आनन्दित नहीं होना-ये छः पतनके कारण हैं। जो समस्त पापी महात्मा वैष्णवोंकी निन्दा करते हैं, वे यमके शासनके कारण अत्यन्त तीखे आरेके जैसे अस्त्रके द्वारा खण्डित किये जाते हैं।”] 'विष्णुनिन्दा-फल'-(भक्तिसन्दर्भमें 314 संख्यामें उद्धृत भाः 7/1/16, 22 श्लोककी टीका देखें)। “ये निन्दन्ति हृषीकेशं तद्भक्तं पुण्यरूपिणम्। शतजन्मार्जितं पुण्यं तेषां नश्यति निश्चितम्॥ ते पच्यन्ते महाघोरे कुम्भीपाके भयानके। भक्षिताः कीटसङ्घेन यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ श्रीविष्णोरवमानाद् गुरुतरं श्रीवैष्णवोल्लङ्घनम्। तदीयदूषकजनान् न पश्येत् पुरुषाधमान्। तैः सार्द्धं वञ्चकजनैः सहवासं न कारयेत् ॥” श्रीजीवप्रभु कृत 'भक्तिसन्दर्भमें' - नामपराधान्तर्गत 'साधुनिन्दा'-फल-वर्णन-प्रसङ्गमें 265 संख्यामें उद्धृत (भाः 10/74/40)- 'निन्दां भगवतः शृण्वन् तत्परस्य जनस्य वा। ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्च्युतः ॥' ततोऽपगमश्चासमर्थस्य एव; समर्थेन तु निन्दकजिह्वा छेत्तव्या; तत्राप्यसमर्थेन स्वप्राणपरित्यागोऽपि कर्तव्यः। यथोक्तं देव्या - (भाः 4/4/17)- “कर्णौ पिधाय निरयात् यदकल्प ईशे धर्मावितर्यशृणिभिर्नृभिरस्यमाने। छिन्द्यात् प्रसह्य रुषतीमसतां प्रभुश्चे- ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत् स धर्मः ॥” इति। [अर्थात् “जो श्रीहृषीकेश एवं उनके पवित्र भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंमें अर्जित पुण्य निश्चित रूपसे विनष्ट हो जाते हैं। जब तक चन्द्र और सूर्य विद्यमान रहते हैं, तब तक भयानक महाघोर कुम्भीपाक नरकमें वे कीटोंके द्वारा खाये जाते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी अवज्ञाकी अपेक्षा श्रीवैष्णवका उल्लङ्घन अधिक भारी अपराध है। इसलिये विष्णुभक्तोंकी निन्दा करनेवाले अधम पुरुषोंका दर्शन नहीं करना चाहिये और ऐसे झूठे आक्षेप करनेवालोंके साथ एक स्थानपर भी नहीं रहना चाहिये।” श्रीभक्तिसन्दर्भमें साधुनिन्दाके फलके वर्णनके प्रसङ्गमें-“श्रीभगवान्की अथवा भगवद्भक्तकी निन्दा सुनकर जो उस स्थानको छोड़कर नहीं चले जाते, वे भी सुकृतिसे च्युत होकर अधोगतिको प्राप्त करते हैं।”-यहाँ जो उस स्थानसे चले जानेका विधान 40 ।