भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1485, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1485

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/251-260 ] श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभु-निन्दक अमोघकी तीव्र निन्दा और शाप :- तबे गालि, शाप दिते भट्टाचार्य आइला। निन्दा शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला ॥ 251 ॥ अनुवाद-तब श्रीभट्टाचार्य उसे गाली निकालते हुए और शाप देते हुए लौट आये। उनके मुखसे अमोघकी निन्दाको सुनकर महाप्रभु हँसने लगे ॥ 251 ॥ महाप्रभुकी निन्दा सुनकर श्रीभट्टाचार्यकी पत्नीको दुःख :- शुनि' षाठीर माता शिरे-बुके घात मारे। 'षाठी राण्डी हउक'-इहा बले बारे बारे ॥ 252 ॥ अनुवाद-इस घटनाको सुनकर षाठीकी माता (श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी) अपने सिर और छातीको पीटने लगी और बार-बार कहने लगीं,- 'षाठी विधवा हो जाय ॥' 252 ॥ महाप्रभुके द्वारा दोनोंको सान्त्वना देनेके बाद प्रसाद-सेवन :- दुँहार दुःख देखि' प्रभु दुँहा प्रबोधिया। दुँहार इच्छाते भोजन कैल तुष्ट हञा ॥ 253 ॥ अनुवाद-दोनोंको दुःखी देखकर महाप्रभुने उन दोनोंको सान्त्वना प्रदान की। उन दोनोंकी इच्छासे महाप्रभुने भोजन ग्रहण किया और वे सन्तुष्ट हुए ॥ 253 ॥ महाप्रभुका आचमन :- आचमन कराञा भट्ट दिल मुखवास। तुलसी-मञ्जरी, लवङ्ग, एलाचि रसवास ॥ 254 ॥ सर्वाङ्गे लेपिल प्रभुर सुगन्धि चन्दन। दण्डवत् हञा बले सदैन्य वचन ॥ 255 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको आचमन करानेके बाद श्रीभट्टाचार्यने उन्हें तुलसी-मञ्जरी, लौंग, सुगन्धित रसीली इलायची आदि प्रस्तुत की। तब उन्होंने महाप्रभुके सभी अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया और उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके दीनतापूर्वक कहने लगे ॥ 254-255 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'एलाचि रसवास' - रस और सुगन्धयुक्त इलायची ॥ 254 ॥ अमोघके द्वारा की गयी निन्दाके लिये क्षमा-प्रार्थना :- निन्दा कराइते तोमा आनिनु निज-घरे। एइ अपराध, प्रभु, क्षमा कर मोरे ॥ 256 ॥ अनुवाद-मैंने आपकी निन्दा करवानेके लिये आपको अपने घरपर बुलाया था। मुझसे यह बहुत बड़ा अपराध हुआ है। हे प्रभो! कृपा करके आप मेरे इस अपराधको क्षमा कीजिये ॥ 256 ॥ अदोषदर्शी महाप्रभु :- प्रभु कहे, - "निन्दा नहे, 'सहज' कहिल। इहाते तोमार तार कि अपराध हैल?" ॥ 257 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"अमोघने निन्दा नहीं की, बल्कि 'सत्य' बात ही कही। इसमें तुम्हारा या उसका क्या अपराध हुआ? ॥ " 257 ॥ महाप्रभुके पीछे-पीछे श्रीभट्टाचार्यका चलना :- एत बलि' महाप्रभु चलिला भवने। भट्टाचार्य ताँर घरे गेला ताँर सने ॥ 258 ॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभु अपने वास-स्थानकी ओर चल दिये। श्रीभट्टाचार्य भी उनके साथ उनके घर तक गये ॥ 258 ॥ श्रीभट्टाचार्यका बहुत दैन्य और शरणागति :- प्रभु-पदे बहु आत्मनिवेदन कैल। ताँरे शान्त करि' प्रभु घरे पाठाइल ॥ 259 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणोंमें पड़कर अनेक प्रकारसे अपने हृदयकी ग्लानिको व्यक्त किया। तब महाप्रभुने उन्हें शान्त करके उनके घर वापिस भेजा ॥ 259 ॥ घरमें पत्नीके साथ श्रीभट्टाचार्यकी गम्भीर खेद-उक्ति :- घरे आसि' भट्टाचार्य षाठीर माता-सने। आपना निन्दिया किछु बलेन वचने ॥ 260 ॥ । 39