भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1484, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1484

[ 15/242-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—गोवर्धनके अन्नकूटमें भी आपने जितना भोजन किया था, उसकी तुलनामें यह अन्न तो एक ग्रास भी नहीं है॥ 242 ॥ अनुभाष्य—'तार लेखाय'—उसकी तुलनामें अथवा अनुपातमें॥ 242 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दैन्य :- तुमि त' ईश्वर, मुञि-क्षुद्र जीव छार। एक-ग्रास माधुकरी करह अङ्गीकार ॥" 243 ॥ अनुवाद—आप तो ईश्वर हैं और मैं एक अति क्षुद्र जीव हूँ। कृपया मेरे घरमें इस एक ग्रासको स्वीकार कीजिये॥" 243 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'माधुकरी'—मधुमक्खीकी वृत्तिके द्वारा प्राप्त ग्रास॥ 243 ॥ श्रीभट्टाचार्यके वचन सुनकर महाप्रभुका प्रसाद-सेवन :- एत शुनि' हासि' प्रभु बसिला भोजने। जगन्नाथेर प्रसाद भट्ट देन हर्ष-मने ॥ 244 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु मुस्कुराये और भोजन करनेके लिये बैठे। श्रीभट्टाचार्यने बड़े आनन्दसे पहले उन्हें श्रीजगन्नाथका प्रसाद लाकर दिया॥ 244 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दामाद-षाठीका पति महाप्रभुका निन्दक 'अमोघ' :- हेनकाले 'अमोघ', —भट्टाचार्येर जामाता। कुलीन, निन्दक तैंहो षाठी-कन्यार भर्त्ता ॥ 245 ॥ अनुवाद—इसी समय श्रीभट्टाचार्यका दामाद अमोघ जो उनकी पुत्री षाठीका पति था, वहाँ आ गया। यद्यपि उसका जन्म उच्च ब्राह्मणकुलमें हुआ था, तथापि वह दूसरोंके दोष देखता और निन्दा करता था॥ 245 ॥ श्रीभट्टाचार्यको हाथमें लाठी लिये देखकर अमोघको भय :- भोजन देखिते चाहे, आसिते ना पारे। लाठी-हाते भट्टाचार्य आछेन दुआरे ॥ 246 ॥ अनुवाद—वह देखना चाहता था कि महाप्रभु क्या खा रहे हैं, किन्तु वह भीतर आ नहीं सका, क्योंकि श्रीभट्टाचार्य अपने हाथमें लाठी लेकर द्वारपर बैठे हुए थे॥ 246 ॥ श्रीभट्टाचार्यका ध्यान बँटनेपर महाप्रभुके पात्रमें बहुत अन्नको देखकर महाप्रभुकी निन्दा :- तैंहो यदि प्रसाद दिते हैला आन-मन। अमोघ आसि' अन्न देखि' करये निन्दन ॥ 247 ॥ “एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन। एकेला संन्यासी करे एतेक भक्षण !” ॥ 248 ॥ अनुवाद—जैसे ही श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुको भोजन परोसने लगे और थोड़ा असावधान हो गये, उसी समय अमोघ भीतर आ गया। इतनी सारी भोजन-सामग्रीको देखकर वह निन्दा करने लगा, —“इतने भोजनसे तो दस-बारह लोगोंका पेट भर सकता है और यहाँ केवल एक ही संन्यासी इतना सब खा रहा है॥" 247-248 ॥ श्रीभट्टाचार्यके मुड़कर देखते ही अमोघका वहाँसे भाग जाना :- शुनि' भट्टाचार्य तबे उलटि' चाहिल। ताँर अवधान देखि' अमोघ पलाइल ॥ 249 ॥ अनुवाद—अमोघकी बात सुनकर श्रीभट्टाचार्यने दृष्टि घुमाकर उसे देखा। श्रीभट्टाचार्यको सावधान देखकर अमोघ तुरन्त वहाँसे भाग गया॥ 249 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अवधान'—सावधान॥ 249 ॥ श्रीभट्टाचार्यका हाथमें लाठी लेकर उसके पीछे दौड़ना :- भट्टाचार्य लाठि लञा मारिते धाइल। पलाइल अमोघ, तार लाग ना पाइल ॥ 250 ॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्य लाठी लेकर उसे मारनेके लिये दौड़े, किन्तु अमोघ इतनी तेजीसे भागा कि श्रीभट्टाचार्य उसे पकड़ नहीं पाये॥ 250 ॥ 38 ।