भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1488, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1488

[ 15/264–269 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला व्यक्तिके सङ्गको त्याग करके घरमें ही रहे, तो भी उसके द्वारा किसी भी विधिका उल्लङ्घन नहीं होता। स्वयं भगवान्ने ही इस विषयमें द्विजपत्नियोंसे कहा (भाः 10/23/31-32)—“मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पति, पिता, भाई, पुत्र आदि कोई भी बन्धु-बान्धव तुमसे असूया (गुणमें भी दोष-दर्शन) नहीं कर पायेंगे; मेरी आज्ञासे देवता भी तुम्हारे आचरणका सदैव अनुमोदन करेंगे। वास्तवमें, इस जगत्में केवल मेरा अङ्ग-सङ्ग ही मेरे प्रति अनुरागकी उत्पत्तिका कारण नहीं होता। मुझमें शुद्ध भावसे निरन्तर मनका संयोग करनेसे शीघ्र ही मेरी प्राप्ति होती है॥” 264॥ स्मृति वचन :- “पतिञ्च पतितं त्यजेत्॥”265॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 265॥ अमृतप्रवाह भाष्य–पतित पतिका परित्याग करना चाहिये। (भा: 7/11/28)– “सन्तुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रिय-सत्यवाक्। अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत्॥” [अर्थात् “जो कुछ मिल जाय, पत्नी उसमें सन्तुष्ट रहे, किसी वस्तुके लिये न ललचाये, सभी कार्योंमें चतुर और धर्मज्ञ हो, सत्य और प्रिय बोले। अपने कर्त्तव्यमें सावधान रहे। पवित्रता और स्नेहयुक्त होकर यदि पति पतित न हो तो उसका सहवास करे।”] ॥ 265॥ अनुभाष्य–भा: 7/11/28 श्लोककी श्रीधरटीकामें उद्धृत याज्ञवल्क्य-वाक्य– “आशुद्धेः संप्रतीक्ष्यो हि महापातक-दूषितः।” अर्थात् “महापातकसे दूषित पतिकी अन्य सेवाएँ करते हुए भी जब तक उसकी शुद्धि न हो जाय, तब तक पत्नीको उसके साथ सहवास करनेकी प्रतीक्षा करनी चाहिये॥” 265॥ अमोघको हैजेका रोग :- सेइ रात्रे अमोघ काँहा पालाञा राहिल। प्रातःकाले तार विसूचिका-व्याधि हैल॥ 266॥ अनुवाद–उस रात अमोघ कहीं भाग गया। और प्रातःकालमें ही उसे हैजेका रोग हो गया॥ 266॥ श्रीचैतन्यके विद्वेषीकी मृत्युकी सम्भावनाको सुनकर श्रीभट्टाचार्यका हर्ष :- अमोघ मरेन—शुनि' कहे भट्टाचार्य। “सहाय हइल दैव, कैल मोर कार्य॥ 267॥ ईश्वर-अपराधका फल तत्क्षणात् दिखा :- ईश्वरे त' अपराध फले ततक्षणे। एत बलि' पड़े दुइ शास्त्रेर वचने॥ 268॥ अनुवाद–अमोघ हैजेसे मर रहा है, ऐसा सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“विधाता मेरे अनुकूल हो गये हैं। मैं जो करना चाहता था, वह कार्य वे स्वयं कर रहे हैं। ईश्वरके प्रति किये गये अपराधका फल तुरन्त मिलता है। यह कहकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने शास्त्रोंके दो श्लोक बोले॥ 267-268॥ महाभारतके वनपर्व (241/15)में :— महता हि प्रयत्नेन हस्त्यश्वरथपत्तिभिः। अस्माभिर्यदनुष्ठेयं गन्धर्वैस्तदनुष्ठितम्॥ 269॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 269॥ अमृतप्रवाह भाष्य–हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिकोंका प्रचुर रूपसे संग्रह करके बड़े प्रयाससे हमें जो करना पड़ता, गन्धर्वोंने वह कर दिया है॥ 269॥ अनुभाष्य–दुर्योधन कर्णके द्वारा सञ्चालित अपनी सेनाके साथ वनमें जा रहा था और गन्धर्वोंके साथ उसका युद्ध हुआ। परन्तु गन्धर्वराज चित्रसेनकी सेना अधिक बलशाली थी, इसलिये उसने सभी कौरवोंको बन्दी बना लिया। उस समय पाण्डव उसी वनमें अज्ञातवासमें रह रहे थे। दुर्योधनके मन्त्रियोंने वनवासी 42 ।

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