श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1489, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/269-275 ] युधिष्ठिरसे सहायताकी प्रार्थना की। उस समय भीमसेनने दुर्योधन आदिके पहले किये गये अत्याचारोंका स्मरण करके प्रतिशोध लेनेके इच्छासे कहा- महता (अतिशयेन) प्रयत्नेन (प्रयासेन) हस्त्यश्वरथपत्तिभिः (गजराजिरथैः पत्तिभिः पदातिभिः; 'सन्नह्य गजराजिभिः' इति पाठान्तरञ्च) यत् (दुर्योधनादि-कौरव-पराजयकार्यम्) अनुष्ठेयं (सम्पादनीयम् अद्य) गन्धर्वैः (चित्रसेनचालितैः कर्तृभूतैः) तत् अनुष्ठितं (सम्पादितं-कौरवादयः शत्रवः पराजिताः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-बहुत प्रयाससे हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिकोंको हम एकत्रित करके युद्धमें दुर्योधनादि कौरवोंको परास्त कर पाते, वह कार्य (कौरवोंकी पराजय) चित्रसेनके सञ्चालनमें गन्धर्वोंकी सेनाने कर दिया है॥ 269 ॥ विष्णु-वैष्णव-विद्वेषका फल :- श्रीमद्भागवत (10/4/46)में- आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च। हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ *270 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 270॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मनुष्यके द्वारा महान् व्यक्तिका अनादर करनेसे उसकी आयु, श्री (सम्पत्ति), यश, धर्म, लोक-परलोक और आशीर्वाद-ये सब श्रेष्ठ वस्तुएँ नाश हो जाती हैं॥ *270 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-भोजराज कंस बहन देवकीकी कन्यारूपी योगमायाको नहीं मार पाया और उसके मुखसे अपने पूर्वशत्रु विष्णुके आविर्भावकी बातको सुना। तब कंसने असुर स्वभाववाले विष्णु-वैष्णव-विद्वेषी मन्त्रियोंके साथ परामर्श करनेके बाद विष्णुभक्त-साधुओं-ऋषियोंको मारनेके लिये दानवोंको आज्ञा दी। श्रीशुकदेवने परीक्षितको विष्णु-वैष्णव-विद्वेषके फलका वर्णन करते हुए कहा- महदतिक्रमः (महतां विष्णुवैष्णवानाम् अतिक्रमः कायिक- मानसिक-वाचनिकानादरः, अतः वैष्णवापराधः) पुंसः (नरस्य) आयुः, श्रियं, यशः, धर्मं, लोकान् (धर्मसाध्यस्वर्गादीन्) आशिषः (निजवाञ्छितानि एव) च सर्वाणि श्रेयांसि (साध्यसाधनानि कल्याणानि) हन्ति (विनाशयति)। श्लोक-भावानुवाद-विष्णु-वैष्णवोंका कायिक- मानसिक-वाचिक अनादर करनेपर उस वैष्णवापराधके फलस्वरूप मनुष्यकी आयु, सम्पत्ति, यश, धर्म, धर्मके पालनसे इच्छित स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति और साध्य-साधन-कल्याणका विनाश हो जाता है। अन्त्यलीला 3/146 और 163 संख्या देखें ॥ 270 ॥ श्रीगोपीनाथसे महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यके बारेमें पूछना :- गोपीनाथाचार्य गेला प्रभु-दरशने। प्रभु ताँरे पुछिल भट्टाचार्य-विवरणे॥ 271 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य जब महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये गये, तब महाप्रभुने उनसे श्रीभट्टाचार्यके विषयमें पूछा ॥ 271 ॥ श्रीगोपीनाथके मुखसे पत्नी-सहित श्रीभट्टाचार्यका महाप्रभु-निन्दा श्रवण करनेके कारण उपवास और अमोघकी मरणासन्न दशाका श्रवण :- आचार्य कहे,- "उपवास कैल दुइजन। विसूचिका-व्याधिते अमोघ छाड़िछे जीवन॥ *272 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,- "दोनों पति और पत्नी उपवास कर रहे हैं। हैजेके कारण अमोघ मरनेवाला है॥ *272 ॥ महाप्रभुका शीघ्रतासे जाना और अमोघको सदुपदेश प्रदान करना :- शुनि' कृपामय प्रभु आइला धाञा। अमोघेरे कहे तार बुके हस्त दिया ॥ 273 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'ब्राह्मण'की संज्ञाका निर्देश :- "सहजे निर्मल एइ ब्राह्मण-हृदय। कृष्णेर बसिते एइ योग्यस्थान हय॥ 274 ॥ 'मात्सर्य'-चण्डाल केने इँहा बसाइला। परम पवित्र स्थान अपवित्र कैला॥ 275 ॥ । 43