श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1490, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/273-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—यह सुनते ही कृपामय महाप्रभु दौड़कर अमोघके पास पहुँचे और उसकी छातीपर हाथ रखकर उससे कहने लगे, — “ब्राह्मणका हृदय तो स्वाभाविक रूपसे निर्मल होता है, इसलिये श्रीकृष्णके वासके लिये वह योग्य स्थान होता है। तुमने इसमें 'मात्सर्य' - रूपी चण्डालको क्यों बैठाया है? तुमने परम पवित्र स्थानको अपवित्र कर दिया है ॥ 273-275 ॥ 'जाड्य' रूपी अपराधसे विमुक्त होनेपर ही शुद्ध नामका उदय :— सार्वभौम-सङ्गे तोमार 'कलुष' हैल क्षय। 'कल्मष' घुचिले जीव 'कृष्णनाम' लय ॥ 276 ॥ अमोघको श्रीकृष्णनाम-ग्रहण करनेकी आज्ञा :— उठह, अमोघ, तुमि लओ कृष्णनाम। अचिरे तोमारे कृपा करिबे भगवान् ॥ 277 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौमके सङ्गसे तुम्हारे हृदयकी कल्मष अब दूर हो गयी है। कल्मषके दूर होनेपर जीवका हृदय शुद्ध हो जाता है और वह श्रीकृष्णका नाम ले पाता है। इसलिये अमोघ, उठो और श्रीकृष्णनामका कीर्तन करो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही भगवान् तुमपर कृपा करेंगे॥” 276-277 ॥ अनुभाष्य—'ब्रह्म', 'परमात्मा' और 'भगवान्' अथवा 'विष्णु'—अद्वयज्ञानतत्त्वके ये तीन आविर्भाव हैं। ब्रह्मज्ञका (ब्रह्मको जाननेवालेका) नाम 'ब्राह्मण' है और ब्रह्मज्ञ भगवद्-उपासकका नाम ही 'वैष्णव' है। 'भगवान्' पूर्ण-आविर्भाव तत्त्व हैं और 'ब्रह्म' असम्पूर्ण-आविर्भाव तत्त्व है। जो केवल ब्राह्मण हैं, उनके मुखमें 'नामाभास' [शुद्धनाम नहीं] उदित होते हैं। किन्तु जो ब्राह्मण अद्वयज्ञान-तत्त्व विष्णुके साथ अपने सम्बन्धज्ञानको जानकर भक्तिपूर्वक विष्णुसेवामें नियुक्त होते हैं, उनकी उस सेवाको 'अभिधेय' कहते हैं। ऐसा भजन करनेसे वे 'भागवत' अथवा 'वैष्णव' हो सकते हैं। तभी अविद्यासे उत्पन्न 'कल्मष' अथवा 'अपराध' दूर होनेपर उसके मुखमें शुद्धनाम उदित होते हैं। निर्विशेषवादी विवर्त्तवादका अवलम्बन करके ब्रह्मकी जिन पाँच प्रकारकी सगुण उपासनाकी कल्पना करते हैं, वह कभी भी अद्वय-ज्ञानतत्त्वकी उपासना नहीं होती। विवर्त्तवादी स्वयंमें 'ब्राह्मण' होनेका अभिमान करके ऐसा मानते हैं कि सकाम अनुभूतिमें ही 'ब्राह्मणता' आबद्ध है, परन्तु जीवके स्वरूपमें 'ब्रह्मज्ञ'-धर्म ही नित्य वर्तमान है। विष्णुकी कृपासे मायावादको छोड़ देनेपर ब्राह्मण ही 'शुद्ध ब्राह्मण' अथवा 'वैष्णव' बनता है। इसलिये वैष्णवोंमें ब्राह्मणत्व नित्य ग्रथित है अर्थात् वैष्णव स्वतः ही ब्राह्मण हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। गरुड़पुराणमें— “ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः। सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते ॥ ” [अर्थात् “हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण श्रेष्ठ है, सहस्र सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक वेदान्तविद् ब्राह्मण श्रेष्ठ है, कोटि-कोटि वेदान्तविद् ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णुभक्त श्रेष्ठ है।"] इसलिये ब्राह्मण होनेकी योग्यताके बिना भक्तिपथमें कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। वास्तविक ब्राह्मणके हृदयमें अद्वयज्ञान विद्यमान रहनेके कारण उसकी नित्य-आराध्य विष्णु और वैष्णवोंमें भेद बुद्धि नहीं होती। इसलिये उसमें अपनी स्वार्थसिद्धि अथवा अपनी जड़ीय इन्द्रियोंके तर्पणकी वाञ्छासे उत्पन्न मात्सर्य, ईर्ष्या अथवा द्वन्द्वभाव रह ही नहीं सकता। जहाँ मात्सर्य आदि भाव विद्यमान होते हैं, वहाँपर अच्युतात्माके अभावमें निश्चय ही (भाः 11/5/3)—“न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्-भ्रष्टाः पतन्त्यधः।” अर्थात् अपने स्थानसे भ्रंश अथवा अधःपतन घटता है॥ 274-277 ॥ अमोघकी उसी समय इह-रोग और भवरोगसे मुक्ति और श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति :— शुनि' 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' अमोघ उठिला। प्रेमोन्मादे मत्त हञा नाचिते लागिला ॥ 278 ॥ 44