श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1491, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/278-289 ] अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर और उनके स्पर्शसे अमोघ 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए उठ बैठा। वह प्रेमोन्मादमें मत्त होकर नृत्य करने लगा॥ 278 ॥ अमोघके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :- कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, स्वरभङ्ग। प्रभु हासे देखि' तार प्रेमेर तरङ्ग ॥ 279 ॥ प्रभुर चरणे धरि' करये विनय। “अपराध क्षम मोरे, प्रभु, दयामय ॥ 280 ॥ अपने द्वारा किये गये अपराधके स्मरणसे अपने गालोंपर थप्पड़ मारना :- एइ छार मुखे तोमार करिनु निन्दने।” एत बलि' आपन गाले चड़ाय आपने ॥ 281 ॥ अनुवाद—नृत्य करते हुए अमोघमें कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद और स्वरभङ्ग आदि सात्त्विक भावोंको देखकर महाप्रभु हँसने लगे। अमोघ महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर दीनतापूर्वक कहने लगा,—“हे दयामय प्रभो! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। इस घृणित मुखसे मैंने आपकी निन्दा की है।” यह कहकर अमोघ अपने हाथोंसे अपने गालोंपर थप्पड़ मारने लगा॥ 279-281 ॥ फूले हुए गालोंको देखकर श्रीगोपीनाथका उसे रोकना :- चड़ाइते चड़ाइते गाल फुलाइल। हाते धरि' गोपीनाथाचार्य निषेधिल ॥ 282 ॥ अनुवाद—थप्पड़ मारते-मारते अमोघने अपने गालोंको फुला दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने उसका हाथ पकड़कर उसे ऐसा करनेके लिये मना किया॥ 282 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसे सान्त्वना और श्रीभट्टाचार्यके सम्बन्धके कारण स्नेह-आशीर्वाद :- प्रभु आश्वासन करे स्पर्शि' तार गात्र। “सार्वभौम-सम्बन्धे तुमि मोर स्नेहपात्र ॥ 283 ॥ शुद्धभक्त श्रीभट्टाचार्यके परिवारसे महाप्रभुकी प्रीति :- सार्वभौम-गृहे दास-दासी, ये कुक्कुर। सेह मोर प्रिय, अन्य जन रहु दूर ॥ 284 ॥ अमोघको श्रीकृष्णनाम लेनेका आदेश :- अपराध नाहि तब, लओ कृष्णनाम।” एत बलि' प्रभु आइला सार्वभौम-स्थान ॥ 285 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उसकी देहको स्पर्श करके उसे आश्वासन दिया,—“सार्वभौमके सम्बन्धसे तुम मेरे स्नेहके पात्र हो। जब सार्वभौमके घरके दास-दासी और यहाँ तक कि जो कुत्ता है, वह भी मुझे प्रिय है, तब उनके सम्बन्धियोंके विषयमें तो कहना ही क्या है। अब तुम्हारा कोई अपराध नहीं रह गया, अब तुम श्रीकृष्णके नामका कीर्तन करो।” यह कहकर महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर आ गये॥ 283-285 ॥ श्रीभट्टाचार्यके निकट आकर महाप्रभुका बैठना :- प्रभु देखि' सार्वभौम धरिला चरणे। प्रभु ताँरे आलिङ्गिया बसिला आसने ॥ 286 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर श्रीसार्वभौमने उनके चरण पकड़ लिये। तब महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और आसनपर बैठ गये ॥ 286 ॥ बालक तुल्य अमोघके अपराधके कारण क्रोध अथवा उपवास अनावश्यक :- प्रभु कहे,—“अमोघ शिशु, किवा तार दोष। केने उपवास कर, केने कर रोष ॥ 287 ॥ भोजन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यसे अनुरोध :- उठ, स्नान कर, देख जगन्नाथ-मुख। शीघ्र आसि' भोजन कर, तबे मोर सुख ॥ 288 ॥ श्रीभट्टाचार्यके प्रसाद-सम्मान तक प्रतीक्षाकी प्रतिज्ञा :- तावत् रहिब आमि एथाय बसिया। यावत् ना पाइबा तुमि प्रसाद आसिया ॥” 289 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अमोघ तो बालक है, इसमें उसका क्या दोष है? आप उपवास क्यों कर रहे हैं? और आप क्रोध क्यों कर रहे हैं? अब उठो, स्नान करो और जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथके मुखका दर्शन करो। जल्दीसे लौटकर भोजन करो, तभी मैं । 45