भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1474

[ 15/172-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—जिस प्रकार एक गूलरके वृक्षपर करोड़ों फल लगते हैं, उसी प्रकार विरजा नदीके जलमें करोड़ों ब्रह्माण्ड तैरते रहते हैं॥ 172 ॥ अनुभाष्य—अप्राकृत ब्रह्मधामके बाहरी भागमें विरजा नदी है। उसके उस पार आलोकमय ब्रह्मधामके द्वारा मण्डित सविशेष-वैकुण्ठ-धाम है। विरजा नदीके दूसरी ओर यह देवीधाम अथवा प्राकृत जगत् है। देवीधाममें त्रिगुण (सत्त्व, रज और तम) वर्तमान (अर्थात् सक्रिय) हैं और विरजा नदीमें तीनों गुण साम्यावस्थामें (अर्थात् निष्क्रिय अवस्थामें) विराजमान हैं॥ 172 ॥ ब्रह्माण्डके उद्धारके साथ गूलरके फलके गिरनेकी उपमा :— तार एक फल पड़ि' यदि नष्ट हय। तथापि वृक्ष नाहि जाने निज अपचय॥ 173 ॥ श्रीकृष्णके लिये केवल एक ब्रह्माण्डका उद्धार—अत्यन्त तुच्छ और ग्रहण करने अयोग्य कार्य :— तैछे एक ब्रह्माण्ड यदि मुक्त हय। तबु अल्प-हानि कृष्णेर मने नाहि लय॥ 174 ॥ परव्योमके बाहरी स्थानपर स्थित कारण-सागरका वर्णन :— अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर वैकुण्ठादि-धाम। तार गड़खाइ—कारणाब्धि यार नाम॥ 175 ॥ ताते भासे माया, लञा अनन्त ब्रह्माण्ड। गड़खाइते भासे येन राइ-पूर्ण भाण्ड॥ 176 ॥ तार एक राइ-नाशे, हानि नाहि मानि। ऐछे एक अण्ड-नाशे कृष्णेर नाहि हानि॥ 177 ॥ अनुवाद—उन करोड़ों फलोंमेंसे यदि एक फल गिरकर नष्ट हो जाता है, तो भी वह वृक्ष अपनी कोई हानि नहीं समझता। उसी प्रकार यदि एक ब्रह्माण्ड उसमें सभी जीवोंके मुक्त होनेपर खाली हो जाता है, तो श्रीकृष्ण उस कमीकी ओर ध्यान भी नहीं देते। असंख्य वैकुण्ठादि धाम श्रीकृष्णका अनन्त ऐश्वर्य है। उस वैकुण्ठलोकके चारों ओरकी खाई ही कारणसमुद्र कहलाती है। उस कारणसमुद्रमें माया अपने अनन्त ब्रह्माण्डोंको लेकर तैरते हुए सरसोंके दानोंसे भरे हुए पात्र जैसे प्रतीत होती है। जिस प्रकार करोड़ों राईके दानोंसे भरे पात्रमेंसे एक दानेके नष्ट होनेपर उसे कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसी प्रकार एक ब्रह्माण्डके नष्ट होनेपर श्रीकृष्णको कोई कमी अनुभव नहीं होती॥ 173-177 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/53 संख्या, 5/52-55, मध्यलीला 20/268-279, 21/52 संख्या देखें। वैकुण्ठधाममें मायाकी किसी भी प्रकारकी कुण्ठा नहीं है। वैकुण्ठ सभी ओरसे कारणसमुद्रसे घिरा हुआ है। प्राकृत देवीधामकी विचित्रताका कारण-जल ही कारणसमुद्र है। 'गड़खाइ'—घेरनेवाला जल। विरजा-नदी अथवा कारणसमुद्र खाईके समान है। अनन्त असंख्य ब्रह्माण्ड- समूह असंख्य 'छोटे-छोटे सरसोंके दानेके' समान और माया 'पात्र'के समान है॥ 175-176 ॥ मायाके साथ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके ध्वंस होनेसे भी श्रीकृष्णको कोई कमी नहीं :— सब ब्रह्माण्ड सह यदि 'माया'र हय क्षय। तथापि ना माने कृष्ण किछु अपचय॥ 178 ॥ कामधेनु-कोटि-पतिर छागी यैछे मरे। षडैश्वर्यपति कृष्णेर माया किवा करे? ॥ 179 ॥ अनुवाद—एक ब्रह्माण्डका तो कहना ही क्या, सभी ब्रह्माण्डोंके साथ यदि मायाका भी नाश हो जाता है, तब भी श्रीकृष्ण कोई कमी अनुभव नहीं करते। करोड़ों कामधेनुओंके स्वामीको एक बकरीके मर जानेसे जिस प्रकार कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार षडैश्वर्यपति श्रीकृष्णको मायाके नष्ट होनेसे क्या कमी हो सकती है? ॥ 178-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इन पद्योंका शब्दार्थ सरल है, किन्तु भावार्थ कठिन है। भावार्थ यह है—जीव श्रीकृष्णसे बहिर्मुख होकर मायाबन्धनमें पड़ जाते हैं और माया 28 |