श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1473, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/164-172 ] वासुदेव ! तुम्हारा ऐसा कहना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि तुम साक्षात् प्रह्लाद हो। तुम्हारे ऊपर श्रीकृष्णकी सम्पूर्ण कृपा है। उनका दास जो कुछ माँगता है, श्रीकृष्ण उसे सत्य कर देते हैं। अपने दासकी इच्छाको पूर्ण करनेके अतिरिक्त श्रीकृष्णका अन्य कोई कार्य नहीं है। तुमने ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंके उद्धारकी कामना की है, इसलिये तुम्हारे द्वारा उन सबके पाप भोगे बिना ही उन सबका उद्धार होगा। श्रीकृष्ण असमर्थ नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण शक्तिको धारण करनेवाले हैं। वे तुम्हें सबके पापोंके फल किसलिये भोग करायेंगे ? तुम जिसके हितकी कामना करते हो, वह 'वैष्णव' बन जाता है और श्रीकृष्ण वैष्णवोंके समस्त पापोंको दूर कर देते हैं ॥ 164-169 ॥ सर्वफलप्रदाता श्रीगोविन्दकी वन्दना :- ब्रह्मसंहिता (5/54) में- यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म- बन्धानुरूप-फलभाजनमातनोति। कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजां गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 170 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो इन्द्रगोप नामक (क्षुद्र) कीटसे आरम्भ करके देवेन्द्र तक सभी जीवोंको उनके कर्मबन्धनके अनुरूप फलभोगका विधान करते हैं, किन्तु जो भक्तिमान् पुरुषके समस्त कर्मोंको ही सम्पूर्ण रूपसे नष्ट कर देते हैं, अहो ! मैं उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका भजन करता हूँ ॥ 170 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभु श्रीवासुदेवको कह रहे हैं,- "श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् हैं। वे समस्त जीवोंको उनकी जड़भोगवासनाओंसे मुक्त कर सकते हैं। तुमने जब समदर्शी होकर, उच्च-नीच सभी जीवोंकी ओरसे उनके मङ्गलकी प्रार्थना की है, तब तुम्हारी प्रार्थनाके अनुसार तुम्हारे पापभोगके बिना ही सभीका उद्धार होगा। उसके बदलेमें तुम्हें उनके लिये पापोंके फल भोग नहीं करने पड़ेंगे। तुम जिनके मङ्गलकी कामना करोगे, वे ही 'वैष्णव' बन जायेंगे। और श्रीकृष्ण वैष्णवोंके प्राचीन पापोंके फलभोगसे भी उनकी रक्षा करेंगे। अर्थात् वे पाप-पुण्यकी सेवाको छोड़कर शुद्ध श्रीकृष्णसेवक बन जायेंगे।" पद्मपुराणमें- "अप्रारब्ध-फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्। क्रमेणैव प्रलीयेत विष्णुभक्ति-रतात्मनाम्॥" [अर्थात् "जिन लोगोंकी आत्मा और उनका शरीर, मन, प्राणादि सभी श्रीकृष्णकी भक्तिमें लगे हुए हैं, उनके अप्रारब्ध पाप, कूट पाप, बीजरूप पाप और फलोन्मुख पाप (जिनका फल भुगतना आरम्भ हो गया है), ये सब भक्तिसे क्रमशः विनष्ट हो जाते हैं।"] भाः 6/2/17 श्लोक देखें ॥ 167-169 ॥ अनुभाष्य- यः (गोविन्दः) तु इन्द्रगोपं (रक्तवर्णक्षुद्रकीटविशेषम्) अथवा इन्द्रं (देवाधिपतिं) स्वकर्मबन्धानुरूपफलभाजनं (स्वस्य कर्मबन्धानुरूपस्य फलस्य भाजनम्) आतनोति (सम्यक् विदधाति) किन्तु भक्तिभाजां (हरिसेवापराणां) च कर्माणि (प्रारब्धानि अप्रारब्धानि च भोगयोग्यानि कर्मफलानि) निर्दहति (विनाशयति), तम् आदिपुरुषं (मूलदेवं) गोविन्दम् (अहं) भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ भक्तकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा अनायास ही ब्रह्माण्डका मोचन करना :- तोमार इच्छा-मात्रे हवे ब्रह्माण्ड-मोचन। सर्व मुक्त करिते कृष्णेर नाहि परिश्रम ॥ 171 ॥ अनुवाद-तुम्हारे इच्छा करने मात्रसे ही ब्रह्माण्डका उद्धार हो जायेगा, क्योंकि ब्रह्माण्डके समस्त प्राणियोंको मुक्त करनेमें श्रीकृष्णको कोई परिश्रम नहीं करना पड़ेगा ॥ 171 ॥ विरजा अथवा कारण-समुद्रमें तैरते हुए अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड :- एकइ डुम्बुर-वृक्षे लागे कोटि-फले। कोटि ये ब्रह्माण्ड भासे विरजार जले ॥ 172 ॥ । 27