भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1472

[ 15/162-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—पश्चिमी-देशोंके ईसाईभक्तोंमें यह विश्वास है कि, उनके गुरु एकमात्र महामति यीशुमसीह ही जीवोंके सभी पापोंके भारको ग्रहण करनेके लिये तत्पर होकर ही जगत्में अवतीर्ण हुए थे। किन्तु श्रीगौरपार्षदोंमें श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरने श्रीहरिदास ठाकुरकी भाँति यीशुमसीहकी अपेक्षा अनन्त कोटिगुणा अधिकतर उन्नत और उदार सार्वजनिक विश्ववैष्णव-प्रेमभावकी जगत्के जीवोंको शिक्षा दी है। श्रीवासुदेव दत्त ठाकुरमें जड़ीय स्वार्थका त्यागरूप 'निःस्वार्थ', विष्णु-सेवारूप चिन्मय 'परार्थ' और 'स्वार्थ' अपूर्वरूपसे एकत्र सम्मिलित हैं। वे श्रीगौरसुन्दरको वास्तव-वस्तु, माया और मायाकी कपटतासे सर्वदा मुक्त स्वयं-भगवान् जानकर ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं। उन्होंने समस्त जीवोंके कृष्ण-विमुखतारूप भवरोग (केवल पाप नहीं, सब प्रकारके पापोंकी अपेक्षा भी भीषणतम 'अपराध'-राशि)को अपने कन्धोंपर ग्रहण करके उनके भवरोगको दूर करनेके लिये काय-मनो-वाक्यसे सम्पूर्ण निष्कपट़रूपसे प्रार्थना करके जिस दयाका आदर्श प्रदर्शित किया है, वह सम्पूर्ण जगत्में, केवल जगत्में ही क्यों, सम्पूर्ण चौदह भुवनोंमें सर्वश्रेष्ठ कर्मियों और ज्ञानियोंकी भी कल्पनासे अतीत है। मायाके वशीभूत, देहको ही मैं माननेवाले जीवोंकी अपने-परायेकी भेद-बुद्धिके कारण हिंसा-वृत्ति प्रधान होती है। वे (जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखादि रूप) द्वैत-जगत्में कर्म और ज्ञानके आदर्शका ही बहुत आदर करते हैं, इसलिये उनमेंसे अधिकांश व्यक्ति ही कुकर्मी और कुज्ञानी हैं। उनमें स्वाभाविक ईर्ष्या और द्वन्द्वभाव होनेके कारण वे वैकुण्ठसेवक श्रीवासुदेव दत्तठाकुरकी नरक-भोगकी प्रार्थनाको सुनकर उल्लसित होकर उन्हें एक 'पुण्यवान् सत्कर्मी' अथवा 'ब्रह्मज्ञानी'के स्तरका मानकर प्रचुर सम्मान अथवा प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते हैं। परन्तु दत्तठाकुर उसकी अपेक्षा भी अनन्त कोटि गुणा अधिक जीवोंके प्रति 'दया'-प्रवृत्तिसे युक्त हैं, यह बिल्कुल भी अतिरञ्जित प्रशंसा-वाक्य (अतिशयोक्ति) अथवा अर्थवाद नहीं है, बल्कि अति निरपेक्ष सत्य बात है। वास्तवमें उनके समान “परदुःखदुःखी” श्रीगौरदासगणोंके आगमनसे पृथ्वी धन्य हुई है, केवल प्रपञ्च ही नहीं, बल्कि समस्त जीवकुल भी धन्य हो गया है। ऐसे श्रीगौरभक्तोंके गुणगानमें ही जिह्वाकी सार्थकता है। और कवियों और ऐतिहासिक व्यक्तियोंकी लेखनी जब लौकिक भावोंको छोड़कर उनके समान अकिञ्चना भगवद्भक्तियुक्त महाभागवतोंके गुण-वर्णनके कार्यमें नियुक्त होगी, तभी उसकी सर्वश्रेष्ठ-सार्थकता होगी। महावदान्य श्रीकृष्णचैतन्यके दास इतने “महतोऽपि महीयान्” (महान्‌से भी महान्) और “गरीयसोऽपि गरीयान्” (श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ) हैं॥162-163॥ प्रियतम सेवककी प्रार्थनासे महाप्रभुका चित्त द्रवित :— एत शुनि' महाप्रभुर चित्त द्रविला। अश्रु-कम्प-स्वरभङ्गे कहिते लागिला॥164॥ श्रीवासुदेव-दत्तठाकुर—साक्षात् प्रह्लाद :— “तोमार विचित्र नहे, तुमि—साक्षात् प्रह्लाद। तोमार उपरे कृष्णेर सम्पूर्ण प्रसाद॥165॥ श्रीकृष्ण और भक्तका परस्परमें व्यवहार :— कृष्ण सेइ सत्य करे, येइ मागे भृत्य। भृत्य-वाञ्छा-पूरण बिना नाहि अन्य कृत्य॥166॥ सभी ब्रह्माण्डवासियोंके उद्धारके विषयमें सत्य आश्वासन-दान :— ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि वाञ्छिले निस्तार। बिना पाप-भोगे हवे सबार उद्धार॥167॥ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन :— असमर्थ नहे, कृष्ण धरे सर्वबल। तोमाके वा केने भुञ्जाइबे पाप-फल?॥168॥ तुमि याँर हित वाञ्छ', से हइल 'वैष्णव'। वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर करे सब॥169॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो गया। उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे, उनका शरीर काँपने लगा और वे गद्गद स्वरसे कहने लगे,—“हे 26