श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1471, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/154-163 ] अध्यायका (पूर्वार्द्ध) देखें; अन्त्यलीला 4/46-47 संख्या- “सेइ भक्त-धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण। सेइ प्रभु-धन्य, ये ना छाड़े निजजन॥ दुर्द्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने। सेइ ठाकुर धन्य-ये तारे चुले धरि' आने॥" [अर्थात् “वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वे प्रभु धन्य हैं जो अपने निजजनोंको कभी नहीं त्यागते। दुर्भाग्यवश यदि सेवक अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो वे प्रभु धन्य हैं, जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर खींचकर ले आते हैं।”] ॥ 154 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी उपास्यके प्रति निष्ठाकी परीक्षा, श्रीमुरारिका परीक्षामें उत्तीर्ण होना :- एइमत तोमार निष्ठा जानिवार तरे। तोमारे आग्रह आमि कैलुँ बारे बारे ॥ 155 ॥ अनुवाद-इस प्रकार आपकी निष्ठाकी परीक्षा लेनेके लिये ही मैंने आपसे बार-बार आग्रह किया था ॥ 155 ॥ अनुभाष्य - 'जानिवार' - परीक्षा करनेके लिये; 'आग्रह'- कृष्णभजन करवानेके लिये आज्ञा देना ॥ 155 ॥ दैन्यके अवतार श्रीमुरारि- साक्षात् हनुमत्-विग्रह :- साक्षात् हनुमान् तुमि श्रीराम-किङ्कर। तुमि केने छाड़िबे ताँर चरण-कमल ॥ 156 ॥ सेइ मुरारि-गुप्त एइ-मोर प्राण सम। इँहार दैन्य शुनि' मोर फाटये जीवन॥” 157 ॥ अनुवाद - आप तो श्रीरामके दास साक्षात् हनुमान् हो। आप उनके चरण-कमलोंको क्यों छोड़ोगे? ये वही मुरारि गुप्त मेरे प्राणोंके समान हैं। इनका दैन्य सुनकर मेरा हृदय फटता है॥” 156-157 ॥ अनुभाष्य - इस प्रसङ्गमें अन्त्यलीला 4/30-45 संख्यामें श्रीजीवके पिता श्रीअनुपम अथवा श्रीवल्लभकी श्रीराम-निष्ठा विचारणीय है ॥ 137-157 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीवासुदेव दत्तकी प्रशंसा :- तबे वासुदेवे प्रभु करि' आलिङ्गन। ताँर गुण कहे हञा सहस्र-वदन ॥ 158 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीवासुदेव दत्तका आलिङ्गन किया और उनके गुणोंका ऐसे बखान करने लगे, मानो उनके सैकड़ों मुख हों ॥ 158 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवासुदेवका कातर-हृदयसे निवेदन :- निज-गुण शुनि' दत्त मने लज्जा पाञा। निवेदन करे प्रभुर चरणे धरिया ॥ 159 ॥ “जगत् तारिते प्रभु तोमार अवतार। मोर निवेदन एक करह अङ्गीकार ॥ 160 ॥ करिते समर्थ तुमि, हओ दयामय। तुमि मन कर, तबे अनायासे हय ॥ 161 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके मुखसे अपने गुणोंको सुनकर श्रीवासुदेव दत्त मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर निवेदन करने लगे, - “हे प्रभो! जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है, आप कृपया मेरा एक निवेदन स्वीकार कीजिये। हे दयामय! उसे पूर्ण करनेमें आप समर्थ हैं। यदि आप इच्छा करें, तो वह अनायास ही पूर्ण हो सकता है ॥ 159-161 ॥ अलौकिक परदुःखदुःखी गौरदास श्रीवासुदेव-दत्त-ठाकुर :- जीवेर दुःख देखि' मोर हृदय विदरे। सर्वजीवेर पाप प्रभु देह' मोर शिरे ॥ 162 ॥ जीवेर पाप लञा मुञि करि नरक भोग। सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह भवरोग ॥” 163 ॥ अनुवाद-संसारमें जीवोंके दुःख देखकर मेरा हृदय फटता है। हे प्रभो! सब जीवोंके पापोंको मेरे सिरपर मढ़ दीजिये। जीवोंके पापोंको लेकर मैं नरक भोग करूँ। और आप सभी जीवोंके भवरोगको दूर कर दीजिये ॥” 162-163 ॥ । 25