श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1470, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/143-154 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला था। इन्होंने मुझसे कहा,—“मैं आपका दास हूँ। आपका आज्ञाकारी हूँ, मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ॥”143-144॥ श्रीरामकी उपासनाके त्यागकी चिन्तासे श्रीमुरारिकी अनिद्रा, रोना और मृत्युकी इच्छा :— एत बलि' घरे गेल, चिन्ति' रात्रिकाले। रघुनाथ-त्याग-चिन्ताय हइल विकले ॥ 145 ॥ केमने छाड़िब रघुनाथेर चरण। आजि रात्र्ये प्रभु मोर कराह मरण ॥ 146 ॥ एइमत सर्व-रात्रि करेन क्रन्दन। मने सोयास्ति नाहि, रात्रि करेन जागरण ॥ 147 ॥ अनुवाद—यह कहकर ये अपने घर चले गये। सारी रात श्रीरघुनाथकी उपासनाके त्यागके विषयमें चिन्ता करते-करते व्याकुल हो गये। मैं किस प्रकार श्रीरघुनाथके चरणोंको छोड़ूँगा ! हे प्रभो ! आप आज रात ही मेरी मृत्यु करा दो ! इस प्रकार ये सारी रात रोते रहे। इनका मन अशान्त था, इसलिये सारी रात सोये ही नहीं ॥ 145-147 ॥ प्रातःकाल आकर श्रीराम-भजनके त्यागने और महाप्रभुकी आज्ञा-पालनमें असमर्थता बतलाकर दो सङ्कटोंमें पड़कर मृत्युकी इच्छा :— प्रातःकाले आसि' मोर धरिल चरण। कान्दिते कान्दिते किछु करे निवेदन ॥ 148 ॥ 'रघुनाथेर पाय मुञि बेचियाछोँ माथा। काढ़िते ना पारि माथा, मने पाइ व्यथा ॥ 149 ॥ श्रीरघुनाथ-चरण छाड़ान ना याय। तव आज्ञा-भङ्ग हय, कि करि उपाय ॥ 150 ॥ ताते मोरे एइ कृपा कर, दयामय। तोमार आगे मृत्यु हउक, याउक संशय ॥' 151 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें आकर इन्होंने मेरे चरण पकड़ लिये। ये रोते-रोते कुछ निवेदन करने लगे,—'मैंने श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने सिरको बेच दिया है। मैं अपने सिरको उनके चरणोंसे नहीं उठा सकता, क्योंकि वह मेरे लिये बहुत पीड़ादायक होगा। मेरे लिये श्रीरघुनाथके चरणकमलोंको छोड़ना सम्भव नहीं है। परन्तु यदि मैं ऐसा नहीं करूँ, तो आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन होता है। मैं क्या कर सकता हूँ? इसलिये हे दयामय ! आप मुझपर यह कृपा कीजिये कि, आपके सामने ही मेरी मृत्यु हो जाय जिससे मेरी यह दुविधा दूर हो जायेगी ॥' 148-151 ॥ अनुभाष्य— “श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि। तथापि मम सर्वस्वः रामः कमलोचनः ॥ ” [अर्थात् “भगवान् श्रीनाथ और श्रीजानकीनाथ अभिन्न हैं, तो भी कमलनयन श्रीराम ही मेरे सर्वस्व हैं।”] ॥ 149 ॥ श्रीमुरारिके वचनोंसे महाप्रभुका हर्ष और प्रशंसा :— एत शुनि' आमि बड़ मने सुख पाइलुँ। इँहारे उठाञा तबे आलिङ्गन कैलुँ ॥ 152 ॥ साधु, साधु, गुप्त ! तोमार सुदृढ़ भजन। आमार वचनेह तोमार ना टलिल मन ॥ 153 ॥ अनुवाद—यह सुनकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ। तब मैंने इन्हें उठाकर इनका आलिङ्गन किया। अति सुन्दर, अति सुन्दर गुप्त ! तुम्हारा भजन बहुत ही सुदृढ़ है जो मेरे वचन सुनकर भी तुम्हारा मन परिवर्तित नहीं हुआ ॥ 152-153 ॥ सेवक और सेव्यका परस्परके प्रति आदर्श व्यवहार :— एइमत सेवकेर प्रीति चाहि प्रभु-पाय। प्रभु छाड़ाइलेह, पद छाड़ान ना याय ॥ 154 ॥ अनुवाद—प्रभुके प्रति सेवककी ऐसी ही प्रीति होनी चाहिये। प्रभुके द्वारा छुड़ानेपर भी, सेवक उनके चरणकमलोंको नहीं छोड़ सकता ॥ 154 ॥ अनुभाष्य— 'प्रभु'-जीवके नित्यसेव्य, आराध्य अथवा उपास्यतत्त्व श्रीकृष्ण; मध्यलीला 4/186, 7/8, तेरहवें 24 ।