भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1469

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/133-144 ] अनुवाद-श्रीसार्वभौम और श्रीविद्यावाचस्पति-ये दोनों भाई हैं। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करके श्रीचैतन्य गोसाईंने कहा, - "इस कलियुगमें श्रीकृष्ण काष्ठ और जलके रूपमें प्रकट हैं तथा (काष्ठके रूपमें) दर्शन और (जलके रूपमें) स्नानसे जीवोंको मुक्त करते हैं। वे 'दारुब्रह्म' के रूपमें साक्षात् श्रीपुरुषोत्तम (श्रीजगन्नाथदेव) हैं और भागीरथी (गङ्गा) साक्षात् 'जलब्रह्म'के समान हैं॥ 133-135॥ श्रीसार्वभौमको श्रीजगन्नाथ और श्रीवाचस्पतिको गङ्गाकी सेवाकी आज्ञा :- सार्वभौम ! कर 'दारुब्रह्म' - आराधन । वाचस्पति ! कर जलब्रह्मरे सेवन ॥' 136 ॥ अनुवाद-हे सार्वभौम ! आप दारुब्रह्म (श्रीजगन्नाथ) की आराधना करें और हे वाचस्पति ! आप जलब्रह्म (गङ्गा)की सेवा करें ॥' 136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सार्वभौम, आप दारुब्रह्मरूपी श्रीजगन्नाथदेवकी आराधना करो; और हे विद्यावाचस्पति, आप श्रीनवद्वीपधामके अन्तर्गत विद्यानगरमें रहकर जल-ब्रह्मरूप गङ्गाकी सेवा करो ॥ 136 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिकी अपने सेव्यमें निष्ठाकी महिमाका वर्णन :- मुरारि-गुप्तरे प्रभु करि' आलिङ्गन । ताँर भक्तिनिष्ठा कहेन, - "शुन भक्तगण ॥ 137 ॥ पहले महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिको श्रीकृष्णभजनका प्रलोभन :- पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल बार बार । 'परम मधुर, गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार ॥ 138 ॥ स्वयं भगवान् कृष्ण - सर्वांशी, सर्वाश्रय । विशुद्ध-निर्मल-प्रेम, सर्वरसमय ॥ 139 ॥ सकल-सद्गुण-वृन्द-रत्न-रत्नाकर । विदग्ध, चतुर, धीर, रसिक-शेखर ॥ 140 ॥ मधुर-चरित्र कृष्णेर मधुर-विलास । चातुर्य, वैदग्ध्य करे याँर लीला-रस ॥ 141 ॥ श्रीकृष्णोपासनाकी ही सर्वश्रेष्ठताका कथन :- सेइ कृष्ण भज तुमि, हओ कृष्णाश्रय । कृष्ण बिना अन्य-उपासना मने नाहि लय ॥' 142 ॥ अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आलिङ्गन करके महाप्रभु उनकी भक्तिकी निष्ठाका वर्णन करते हुए कहने लगे,- "हे भक्तों सुनो ! पहले मैंने इनको बार-बार श्रीकृष्णका लोभ दिखलाया। मैंने कहा, - 'हे मुरारि गुप्त ! व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण परम मधुर हैं। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, वे सबके अंशी, सभीके आश्रय, विशुद्ध निर्मल प्रेमरूप और समस्त रसोंके भण्डार हैं। वे समस्त प्रकारके सद्गुणरूपी रत्नोंकी खान हैं, विदग्ध अर्थात् सभी कार्योंमें प्रवीण हैं, अत्यन्त बुद्धिमान, धीर और रसिकशेखर भी हैं। उनका चरित्र भी मधुर है और उनका विलास भी मधुर है। वे अपने चातुर्य और विदग्धतासे लीला-रसका आस्वादन करते हैं। इसलिये आप उन्हीं श्रीकृष्णका भजन करो। श्रीकृष्णके आश्रित हो जाओ। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी उपासनाकी बातको मनमें भी मत लाओ ॥' 137-142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- "हे गुप्त, श्रीव्रजेन्द्र-कुमार-परम मधुर" हैं आदि, बातें बोलकर (पहले) मैंने उनको कृष्णभजनमें अधिक लोभ दिया था ॥ 138 ॥ महाप्रभुके प्रलोभनसे मुरारिका क्षणिक चित्त-परिवर्तन :- एइमत बार बार शुनिया वचन । आमार गौरवे किछु फिरि' गेला मन ॥ 143 ॥ महाप्रभुके वचनोंमें दृढ़ विश्वास और दैन्य-ज्ञापन :- आमारे कहेन, - "आमि तोमार किङ्कर । तोमार आज्ञाकारी आमि, नाहि स्वतन्तर ॥ "144 ॥ अनुवाद-बार-बार इस प्रकारके वचन सुनकर मेरे प्रति गौरव बुद्धिके कारण इनका मन कुछ बदल गया । 23