भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1475

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/171-180 ] अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके उन जीवोंको श्रीकृष्ण-विमुखताके फलस्वरूप कर्मफल भोग कराती है। श्रीकृष्ण-बहिर्मुख लोगोंको कर्मफल अवश्य ही भोग करना पड़ता है। श्रीकृष्ण-सम्मुख (श्रीकृष्णोन्मुख) व्यक्तियोंका वह कर्मबन्धन श्रीकृष्णकी इच्छासे सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाता है। इसमें यदि वितर्क किया जाय कि, 'भक्त होनेसे ही यदि कर्म बन्धन नष्ट हो जाय और किसी भक्तकी इच्छा होनेपर ही यदि बिना दण्डके ही सभी जीवोंका उद्धार हो जाय, तब भक्तकी इच्छासे ही ब्रह्माण्ड रहे, या नहीं रहे, ऐसा होनेपर फिर श्रीकृष्णका जगत् किस प्रकारसे अच्छी प्रकारसे नियमित हो सकता है?' इसलिये महाप्रभुने कहा, - 'श्रीकृष्णका चिद्-जगत् अनन्त और अपरमेय (जिसे मापा नहीं जा सकता) है; स्वरूप-शक्तिके सभी गण वहाँ कामधेनु-स्वरूपमें स्वामीरूप श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। वह (स्वरूप शक्तिका वैभव) चिद्-जगत् त्रिपाद (श्रीकृष्णकी तीन चौथाई विभूति) है। उस चिद्-जगत्की छायारूप मायाके अधिकारमें यह जड़जगत् एकपाद (एक चौथाई) है। माया स्वरूपशक्तिकी छायामात्र है। इसलिये करोड़ों कामधेनुओंके स्वामी श्रीकृष्णके लिये यह माया एक बकरी-मात्र है [यहाँ कामधेनु और बकरीका उपमा रूपमें प्रयोग हुआ है]। शुद्धभक्तोंकी इच्छानुसार अथवा शुद्धभक्तोंके अनुरोधसे यदि एक मायिक ब्रह्माण्डका उद्धार हो जाय, तो उससे श्रीकृष्णको कोई क्षति प्रतीत नहीं होती। उसकी बात तो दूर रहे, यदि समस्त मायिक ब्रह्माण्डोंके साथ बकरीरूपी मायाका अस्तित्व भी लोप हो जाय, तो भी करोड़ों कामधेनु-स्वामीरूप षडैश्वर्योंके ईश्वर श्रीकृष्णकी लेशमात्र भी हानि नहीं होती अर्थात् छायाके नष्ट होनेपर स्वरूप-वस्तुकी क्या हानि हो सकती है? ॥ 171-179 ॥ श्रीमद्भागवतमें (10/87/14) :- जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः। अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते क्वचिदजयात्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥”180॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिसके (द्वारा) सत्त्व-रज-तमोगुण दोषके रूपमें गृहीत हुआ है, हे अजित, उस चराचर अजा (अविद्या अथवा माया)को आप विनष्ट करके (अपनी विजय दिखलाओ, विजय दिखलाओ); क्योंकि, आत्मशक्तिके द्वारा मायातीत आपमें (स्वरूपतः) समस्त ऐश्वर्य अवरुद्ध (आबद्ध) है, आप ही जगत्की समस्त शक्तियोंके ज्ञापक (ज्ञान करानेवाले अन्तर्यामी) हैं। आप आत्म-शक्तिसे ही विपुल चिद्-जगत्में लीला करते हैं और किसी कारणसे आप अपनी छायाशक्ति मायाके प्रति ईक्षण (दृष्टिपात) करके उसके द्वारा (सृष्टि आदि) लीला करते हैं, - वेद आपकी इन दो प्रकारकी लीलाओंका ही वर्णन (करके उसका प्रतिपादन) करते हैं॥”180॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें सेवा करनेके अभिलाषी ऋषियोंसे चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दन श्रुतियोंके द्वारा की गयी भगवद्-स्तुतिका वर्णन कर रहे हैं- हे अजित (मायाद्यनभिभूत,) जय जय (निजोट्कर्षमवश्यमाविष्कुरु, कथं वा न करोषीति आदरे वीप्सा) दोषगृभीतगुणां (दोषाय आनन्दाद्यावरणाय गृभीता गृहीताः गुणाः यया तां) अगजगदोकसां (अङ्गानि स्थावराणि जगन्ति जङ्गमानि ओकांसि शरीराणि येषां तेषां जीवानाम्) अजां (मायाम् अविद्यां) जहि (नाशय-यथा पुनरेषा सृष्ट्यादौ प्रवृत्तान् जीवान् न दुनोतीति भावः), यत् (यस्मात्) त्वम् आत्मना (स्वरूपभूतेन परमानन्देनैव तदभिन्नयैव शक्त्या) समवरुद्धसमस्तभगः (सम्प्राप्तसमग्रैश्वर्यः) असि [वशीकृतमायत्वात् त्वमेव] अखिलशक्त्यवबोधक (अखिलाः प्राकृताप्राकृताः याः शक्त्यः तासां सर्वासाम् अवबोधक, भोक्तः, अधीश्वर, इति यावत्) क्वचित् (कदाचित् सृष्ट्यादिसमये) अजया (मायया सह) आत्मना (अङ्गाभासेन, स्वयं तु निर्लेप्सः) चरतः (ईक्षण-क्रीड़तः) ते (तव त्वां-कर्मणि षष्ठी) निगमः (वेदः) । 29