श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 15/196-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अन्य आठ संन्यासी दो-दो दिन मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार एक-एक व्यक्तिको एक-एक दिन भिक्षा करानेसे पूरा मास हो जायेगा॥196॥ अनुभाष्य - 'आर अष्ट संन्यासी' अर्थात् 'और आठ संन्यासी'-श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीदामोदर स्वरूपके अतिरिक्त बाकी आठ लोग। 'पूर्ण हैल मासे' अर्थात् 'मास पूर्ण हो गया'-श्रीमहाप्रभुके 5 दिन, श्रीपरमानन्दपुरीके 5 दिन, श्रीदामोदर स्वरूपके 4 दिन, 8 अन्य संन्यासियोंके 16 दिन-कुल 30 दिन होनेसे एक मास पूर्ण हो गया॥196॥ दस संन्यासियोंको एक साथ भिक्षा करानेसे यथायोग्य मर्यादाकी रक्षामें असम्भावना-हेतु अपराधकी आशङ्का :- बहुत संन्यासी यदि आइसे एक ठाञि। सम्मान करिते नारि, अपराध पाइ ॥197॥ अनुवाद-बहुत संन्यासी यदि एक ही साथ आयेंगे, तो मैं उनका उचित सम्मान नहीं कर पाऊँगा, अपितु उनके प्रति अपराध हो जायेगा ॥197॥ कभी तो अकेले, और कभी श्रीस्वरूपके साथ निमन्त्रण :- तुमिह निज-छाये आसिबे मोर घरे। कभु सङ्गे आनिबे स्वरूप-दामोदरे॥”198॥ अनुवाद-आप भी केवल अपनी छायाके साथ अर्थात् अकेले ही मेरे घरपर आना और कभी श्रीस्वरूप दामोदरको अपने साथ लाना॥”198॥ अमृतप्रवाह भाष्य-निज-छायें'-अपनी छाया लेकर अर्थात् अकेले ॥198॥ महाप्रभुके अनुमोदनसे उस दिन उनको निमन्त्रण :- प्रभुर इङ्गित पाञा आनन्दित मन। सेइ दिन महाप्रभुर कैल निमन्त्रण ॥199॥ अनुवाद-सारी व्यवस्थाके लिये महाप्रभुकी सम्मतिसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका मन आनन्दित हो गया और उसी दिन उन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥ 199 ॥ श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी, षाठीकी माता-महाप्रभुकी भक्त :- ‘षाठीर माता' नाम, भट्टाचार्येर गृहिणी। प्रभुर महाभक्त तेंहो, स्नेहेते जननी ॥ 200 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी 'षाठीकी माता'-नामसे प्रसिद्ध थीं। वे महाप्रभुकी परम भक्त और स्नेहमें उनकी माताके समान ही थीं॥ 200 ॥ षाठीकी माताका रसोई बनाना :- घरे आसि' भट्टाचार्य ताँरे आज्ञा दिल। आनन्दे षाठीर माता पाक चड़ाइल ॥ 201 ॥ अनुवाद-घरमें आकर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें रसोई बनानेकी आज्ञा दी। षाठीकी माताने आनन्दसे रसोई बनाना आरम्भ कर दिया ॥ 201 ॥ साग-फल आदि अनेक नैवेद्यका संग्रह :- भट्टाचार्येर गृहे सब द्रव्य आछे भरि'। येबा शाकफलादिक, आनिल आहरि' ॥ 202 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यके घरमें खानेका सामान सदा पूर्ण मात्रामें रहता था। उसके अतिरिक्त जो कुछ साग, फल चाहिये था, उसे वे स्वयं संग्रह करके ले आये ॥ 202 ॥ अनुभाष्य- 'भरि"-पूर्ण; 'आहरि'-जुगाड़ करके ॥ 202 ॥ स्वयं श्रीभट्टाचार्यके द्वारा पत्नीकी रसोई बनानेमें सहायता :- आपनि भट्टाचार्य करे पाकेर सब कर्म। षाठीर माता-विचक्षणा, जाने पाकेर कर्म॥203॥ अनुवाद-स्वयं श्रीभट्टाचार्य रसोई बनानेमें अपनी पत्नीकी सहायता करने लगे। षाठीकी माता रसोई बनानेमें बहुत अनुभवी थीं और उन्हें बहुत अच्छा खाना बनाना आता था ॥ 203 ॥ 32 ।