भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1477, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1477

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/186-196 ] अनुवाद-एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके पास आकर हाथ जोड़कर कुछ निवेदन किया,-"अब तो सब वैष्णव बङ्गाल लौट गये हैं, इसलिये अब आप मेरा निमन्त्रण अवश्य ही स्वीकार कर लेंगे। अब आप एक मास तक प्रतिदिन मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये।" महाप्रभुने कहा, - "मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि यह धर्म-सङ्गत नहीं है॥" 186-188॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा भिक्षाके समयको बढ़ाना और महाप्रभुके द्वारा उसे कम करनेकी चेष्टासे एक दिन मात्र भिक्षामें ही महाप्रभुकी सम्मति :- सार्वभौम कहे,- "भिक्षा करह 'विंश' दिन।" प्रभु कहे, - "ए नहे यतिधर्म-चिह्न ॥" 189 ॥ सार्वभौम कहे पुनः, - दिन 'पञ्चदश' । प्रभु कहे,-"तोमार भिक्षा 'एक' दिवस ॥" 190 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौमने कहा, - "कृपया फिर बीस दिन तक भिक्षा स्वीकार कीजिये।" महाप्रभुने कहा, - "ऐसा करना संन्यासीका धर्म नहीं है।" श्रीसार्वभौमने पुनः कहा कि पन्द्रह दिन तो भिक्षा स्वीकार कर लीजिये। महाप्रभुने कहा, - "तुम्हारे घर एक दिन भिक्षा ग्रहण करूँगा॥" 189-190 ॥ बहुत दैन्य-विनयसे श्रीभट्टाचार्यकी भिक्षाकालको दस दिन करनेकी चेष्टा :- तबे सार्वभौम प्रभुर चरणे धरिया। 'दशदिन भिक्षा कर' कहे विनति करिया ॥ 191 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुके चरण पकड़कर विनती करते हुए कहा कि अन्ततः दस दिन तो भिक्षा ग्रहण कीजिये ॥ 191 ॥ अन्तमें पाँच दिनकी भिक्षा स्वीकार :- प्रभु क्रमे क्रमे पाँच-दिन घटाइल। पाँच-दिन ताँर भिक्षा-निमन्त्रण निल ॥ 192 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने एक-एक करके पाँच दिन कम किये और श्रीसार्वभौमके घर पाँच दिन भिक्षाका निमन्त्रण स्वीकार किया ॥ 192 ॥ अनुभाष्य-भक्तवत्सल होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा [संन्यास] आश्रम-धर्मका पालन ॥ 188-192 ॥ दस संन्यासियोंके निमन्त्रणकी व्यवस्था :- तबे सार्वभौम करे आर निवेदन। "तोमार सङ्गे संन्यासी आछे दशजन ॥ 193 ॥ श्रीपरमानन्द-पुरीको पाँच दिन भिक्षा-दान :- पुरी-गोसाञिर भिक्षा पाँचदिन मोर घरे। पूर्वे आमि कहियाछौं तोमार गोचरे ॥ 194 ॥ अनुवाद-तब श्रीसार्वभौमने एक और निवेदन करते हुए कहा, - "आपके साथ दस संन्यासी हैं। उनमेंसे श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी मेरे घरपर पाँच दिन भिक्षा ग्रहण करेंगे, इस विषयमें मैंने आपको पहले भी अवगत कराया था ॥ 193-194 ॥ अनुभाष्य - 'दस संन्यासी'-1) श्रीपरमानन्द पुरी, 2) श्रीदामोदर-स्वरूप, 3) श्रीब्रह्मानन्द पुरी, 4) श्रीब्रह्मानन्द- भारती, 5) श्रीविष्णुपूरी, 6) श्रीकेशव-पुरी, 7) श्रीकृष्णानन्दपुरी, 8) श्रीनृसिंह-तीर्थ, 9) श्रीसुखानन्द- पुरी, 10) श्रीसत्यानन्द-भारती ॥ 193 ॥ श्रीस्वरूपको कभी तो महाप्रभुके साथ, कभी अकेले चार दिन भिक्षा-दान देना स्वीकार :- दामोदर-स्वरूप, - एइ बान्धव आमार। कभु तोमार सङ्गे याबे, कभु एकेश्वर ॥ 195 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर मेरे बान्धव हैं। ये कभी तो आपके साथ और कभी अकेले ही मेरे घरपर भिक्षाके लिये आयेंगे ॥ 195 ॥ बाकी आठ संन्यासियोंको सोलह दिन भिक्षा-दान :- आर अष्ट संन्यासीर भिक्षा दुइ दुइ दिवसे। एक एक दिन, एक एक जने पूर्ण हइल मासे ॥ 196 ॥ । 31

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