श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1495, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुके द्वारा वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर श्रीरामानन्द और श्रीसार्वभौम अनेक प्रकारकी बाधाएँ उत्पन्न करने लगे। क्रमशः गौड़ीय-भक्त तीसरे वर्ष नीलाचल आये। इस बार वैष्णवोंकी पत्नियाँ श्रीमन्महाप्रभुको अपने वासस्थानपर निमन्त्रण करनेके लिये उनकी प्रिय बहुत सी खाद्य-वस्तुओंको बङ्गालसे लायी थीं। उन सबके श्रीक्षेत्रमें पहुँचनेपर महाप्रभुने मालायें भेजकर उनका सम्मान किया। उस वर्ष भी गुण्डिचा मन्दिरमें सफाईका कार्य पहलेकी भाँति हुआ। चातुर्मास्यके सम्पूर्ण होनेपर भक्तगण बङ्गाल जाने लगे। महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रत्येक वर्ष नीलाचलमें आनेसे मना किया। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नानुसार उन्होंने पुनः वैष्णवके लक्षणके विषयमें बतलाया। इस वर्ष श्रीविद्यानिधिने नीलाचलमें रहकर 'ओड़नषष्ठी'का दर्शन किया। भक्तोंके विदा होनेपर महाप्रभुने वृन्दावन जानेकी दृढ़ता प्रकाशित की और विजया-दशमीके दिन प्रस्थान किया। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुके जानेवाले मार्गमें अनेक प्रकारकी व्यवस्था की थी। चित्रोत्पला नदी पार होनेपर श्रीरामानन्द, मङ्गराज (मरदराज ?) और हरिचन्दन महाप्रभुको साथ लेकर चले। महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितको नीलाचल लौट जानेका अनुरोध किया, परन्तु उन्होंने वह सुना नहीं। कटकसे महाप्रभुने श्रीपण्डित गोस्वामीको शपथ देकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें भेजा और भद्रकसे श्रीरामानन्दको विदायी दी। (उसके बाद) उड़ीसाकी सीमापर पहुँचकर महाप्रभु नौकाके द्वारा यवन अधिकारीकी सहायतासे पाणिहाटि तक गये। उसके बाद महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरसे कुमारहट्ट होकर कुलिया-ग्राममें आये। महाप्रभुने वहाँ अनेक लोगोंके अपराधोंको दूर किया। वहाँसे रामकेलिमें जाकर श्रीरूप और श्रीसनातनको अङ्गीकार किया। रामकेलिसे लौटकर श्रीरघुनाथदासको शिक्षा देकर वापिस घरमें भेजा। पुनः नीलाचलमें आकर महाप्रभु अकेले वृन्दावन जानेका परामर्श करने लगे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौड़देशमें जाकर लोगोंके उद्धारमें रत श्रीगौरसुन्दर :- गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् स्वालोकनामृतैः। भवाग्निदग्धजनता-वीरुधः समजीवयत्॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशरूपी उद्यानमें गौररूप मेघने अपनी दर्शनामृतरूपी वर्षाके द्वारा भवाग्निमें दग्ध जनतारूपी लताको जीवित किया था॥1॥ अनुभाष्य— गौरमेघः (श्रीगौरजलधरः) स्वालोकनामृतैः (निजदर्शनसुधाभिः) गौड़ोद्यानं (गौड़देशरूपम् उद्यानं) सिञ्चन् (वर्षन्) भवाग्निदग्धजनता- वीरुधः (संसारदाव-वह्निना दग्धाः याः जनताः लोकपुञ्जाः ता एव वीरुधः लताः ताः) समजीवयत् (जीवयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥2॥ महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; राजाका विषाद :- प्रभुर हइल इच्छा याइते वृन्दावन। शुनिया प्रतापरुद्र हइला विमन॥3॥ अनुवाद—महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा हुई है, इसे सुनकर राजा प्रतापरुद्रका मन उदास हो गया॥3॥ । 49