श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1496, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/4-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायको बुलाकर महाप्रभुको नहीं जाने देनेके लिये प्रार्थना :- सार्वभौम, रामानन्द, आनि' दुइ जन। दुँहाके कहेन राजा विनय-वचन ॥ 4 ॥ “नीलाद्रि छाड़ि' प्रभुर मन अन्यत्र याइते। तोमरा करह यत्न ताँहारे राखिते ॥ 5 ॥ ताँहा बिना एइ राज्य मोर नाहि भाय। गोसाञि राखिते करह नाना उपाय॥” 6 ॥ अनुवाद-राजाने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द राय, इन दोनोंको अपने पास बुलवाकर दीनतापूर्वक कहा,-“महाप्रभुका मन नीलाचलको छोड़कर कहीं और जानेका है। आप दोनों कृपया उन्हें यहींपर ही रखनेका प्रयास कीजिये। महाप्रभुके बिना यह राज्य मुझे नहीं सुहाता, इसलिये श्रीचैतन्य गोसाईंको यहींपर रखनेका सब प्रकारके उपाय कीजिये॥” 4-6 ॥ महाप्रभुका वृन्दावन जानेके लिये श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके साथ परामर्श :- रामानन्द, सार्वभौम, दुइजना-स्थाने। तबे युक्ति करे प्रभु, -'याब वृन्दावने' ॥ 7 ॥ अनुवाद-इसके बाद स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द और श्रीसार्वभौमके साथ परामर्श करते हुए कहा,-'मैं वृन्दावन जाऊँगा॥' 7 ॥ वियोगके भयसे दोनोंका महाप्रभुको वृन्दावनकी बात भुलाकर वहाँ जानेसे मना करना :- दुँहे कहे,-“रथयात्रा कर दरशन। कार्त्तिक आइले, तबे करिह गमन ॥” 8 ॥ कार्त्तिक आइले कहे, - “एबे महा-शीत। दोलयात्रा देखि' याओ-एइ भाल रीत।” 9 ॥ आजि-कालि करि' उठाय विविध उपाय। याइते सम्मति ना देय विच्छेदेर भय ॥ 10 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द राय, दोनोंने कहा, -“आप अभी यहीं रहकर रथ-यात्राका दर्शन कीजिये। कार्तिक मासके आनेपर ही वृन्दावन जाना।” जब कार्तिक मास आया, तब उन्होंने कहा,- “अभी तो बहुत अधिक सर्दी है, आप दोलयात्राके दर्शन करके जाना। यही अच्छा होगा।” आज-कल करके वे बहुत प्रकारके उपाय निकालते और वियोगके भयसे महाप्रभुको जानेकी सम्मति नहीं देते ॥ 8-10 ॥ भगवान् स्वतन्त्र होनेपर भी भक्तके वशीभूत :- यद्यपि स्वतन्त्र प्रभु, नहे निवारण। भक्त-इच्छा बिना प्रभु ना करे गमन ॥ 11 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु स्वतन्त्र हैं, उन्हें कोई रोक नहीं सकता, तो भी भक्तकी इच्छाके बिना वे कभी नहीं जाते॥ 11 ॥ तीसरे वर्ष गौड़ीय भक्तोंकी महाप्रभुके दर्शन करनेकी इच्छा :- तृतीय वत्सरे सब गौड़ेर भक्तगण। नीलाचले चलिते सबार हैल मन ॥ 12 ॥ अनुवाद-तीसरे वर्ष भी गौड़देशके सभी भक्तोंका नीलाचल जानेका मन हुआ ॥ 12 ॥ सभीका श्रीअद्वैताचार्यके पास जाना और श्रीअद्वैतकी पुरी-यात्रा :- सबे मेलि' गेला अद्वैत-आचार्येर पाशे। प्रभु देखिते आचार्य चलिला उल्लासे ॥ 13 ॥ अनुवाद-सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके दर्शनके लिये उल्लसित होकर चल पड़े॥ 13 ॥ महाप्रभुके मना करनेपर भी महाप्रभु-प्रेमिक श्रीनिताइकी महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरी-यात्रा :- यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़ेते रहिते। नित्यानन्द-प्रभुके प्रेमभक्ति प्रकाशिते ॥ 14 ॥ 50 ।