भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1498, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1498

[ 16/24-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (4) श्रीचन्द्रशेखरकी पत्नीकी यात्रा :- आचार्यरत्न-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी। ताँहार प्रेमेर कथा कहिते ना जानि ॥ 24 ॥ अनुवाद—श्रीआचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर)के साथ उनकी पत्नी भी चल रही थीं। महाप्रभुके प्रति श्रीचन्द्रशेखरके प्रेमकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 24 ॥ महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे साथमें उनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंको लेना :- सब ठाकुरानी महाप्रभुके भिक्षा दिते। प्रभुर नाना प्रिय द्रव्य निल घर हैते ॥ 25 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंकी पत्नियोंने महाप्रभुको खानेमें प्रिय लगनेवाली बहुतसी वस्तुओंको अपने घरसे ले लिया ॥ 25 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा सभी कार्योंका सम्पादन :- शिवासेन-सेन करे सब समाधान। घाटियाल प्रबोधि' देन सबारे वासा-स्थान ॥ 26 ॥ भक्ष्य दिया करेन सबार सर्वत्र पालने। परम आनन्दे यान प्रभुर दरशने ॥ 27 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन मार्गका शुल्क लेनेवालोंको मधुर वचन बोलकर प्रसन्न करते और सभी भक्तोंके रहनेके स्थानकी व्यवस्था करते। पूरी यात्रामें सबको भोजन करवाते और उनका ध्यान रखते हुए वे परमानन्दसे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जा रहे थे॥ 26-27 ॥ अनुभाष्य—'घाटियाल'—मार्गदर्शक; ये यात्रियोंसे अन्यायपूर्वक अवैध रूपसे अधिक धन संग्रह करते थे; शिवानन्द उनसे वैध शुल्कसे अधिक धन न लेनेका अनुरोध करते ॥ 26 ॥ रेमुणामें सभीका श्रीगोपीनाथ-दर्शन, श्रीमाधवपुरीके अनुसरणमें श्रीअद्वैतका नृत्य-कीर्तन :- रेमुणाय आसिया कैल गोपीनाथ-दरशन। आचार्य करिल ताँहा कीर्त्तन, नर्त्तन ॥ 28 ॥ अनुवाद—रेमुणामें आकर सभीने श्रीक्षीरचोरा- गोपीनाथका दर्शन किया। श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ कीर्तन और नृत्य किया ॥ 28 ॥ पूर्व परिचयके कारण सेवकोंके द्वारा श्रीनित्यानन्दका अभिनन्दन :- नित्यानन्देर परिचय सब लोक-सने। बहुत सम्मान आसि' कैल सेवकगणे ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुका वहाँके सभी लोगोंके साथ पहलेका परिचय था, श्रीगोपीनाथके सेवकोंने आकर उनका बहुत सम्मान किया ॥ 29 ॥ सभीका वहाँ रात्रि व्यतीत करना और खीर प्रसादका सम्मान करना :- सेइ रात्रि सब महान्त ताहारि रहिला। बार क्षीर आनि' आगे सेवक धरिला ॥ 30 ॥ क्षीर बाँटि' सबारे दिल प्रभु-नित्यानन्द। क्षीर-प्रसाद पाञा सबार बाड़िल आनन्द ॥ 31 ॥ अनुवाद—उस रात्रि सभी महान् भक्त वहीं मन्दिरमें ही रहे। श्रीगोपीनाथके सेवकोंने बारह खीरके कुल्हड़ लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आगे रख दिये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस खीरको सभीमें बाँट दिया। खीर प्रसाद पाकर सभीका आनन्द बढ़ गया ॥ 30-31 ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीगोपालका और श्रीगोपीनाथके आगमनके वृत्तान्तका वर्णन :- माधवपुरीत कथा, गोपाल-स्थापन। ताँहारे गोपाल यैछे मागिल चन्दन ॥ 32 ॥ पिछली यात्रामें महाप्रभुके श्रीमुखसे सुनी कथाका वर्णन; भक्तोंको हर्ष :- ताँर लागि' गोपीनाथ क्षीर चुरि कैल। महाप्रभुर मुखे आगे ए कथा शुनिल ॥ 33 ॥ सेइ कथा सबार मध्ये कहे नित्यानन्द। शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 34 ॥ 52 ।

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