श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1499, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/32-41] अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कथा, उनके द्वारा गोवर्धनमें श्रीगोपालकी स्थापना, श्रीगोपालके द्वारा उनसे चन्दन माँगना और उनके लिये श्रीगोपीनाथके द्वारा खीरकी चोरी करना—ये सब कथाएँ जो श्रीनित्यानन्द प्रभुने पहले महाप्रभुके मुखसे सुनी थीं, उन्होंने सभी भक्तोंको उन कथाओंका श्रवण कराया। इन कथाओंको सुनकर वैष्णवोंके मनमें आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 32-34 ॥ अनुभाष्य—'महाप्रभु मुखे'—महाप्रभुने पहले श्रीपाद ईश्वरीपुरीके मुखसे श्रवण किया था (मध्यलीला 4/18 संख्या); [संन्यास लेनेके बाद] शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घरपर कुछ दिन रहनेके पश्चात् महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्दके साथ नीलाचल जानेके मार्गमें रेमुणा आकर उन्हें—श्रीमाधवेन्द्रपुरी, वृन्दावनके श्रीगिरिधारी-गोपाल और रेमुणाके श्रीक्षीरचोरा- गोपीनाथके उपाख्यानका वर्णन किया था। (मध्यलीला 4/19-190 संख्या देखें) ॥ 32-34 ॥ सभीका कटकमें आगमन, साक्षिगोपाल-दर्शन और श्रीनिताइके द्वारा साक्षिगोपालकी कहानीका वर्णन :- एइमत चलि' चलि' कटक आइला। साक्षिगोपाल देखि' सबे से दिन रहिला ॥ 35 ॥ साक्षिगोपालेर कथा कहे नित्यानन्द। शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 36 ॥ अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते सभी भक्त कटक आ पहुँचे और वहाँ श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन करके वे उस दिन वहीं रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसाक्षिगोपालकी कथा सुनायी, जिसे सुनकर वैष्णवोंके मनका आनन्द और बढ़ गया ॥ 35-36 ॥ अनुभाष्य—'साक्षिगोपालकी कथा'—मध्यलीला 5/8-138 संख्या देखें ॥ 36 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये व्यग्र सभीका द्रुत-गतिसे पुरीमें आगमन :- प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठा अन्तर। शीघ्र करि' आइला सबे श्रीनीलाचल ॥ 37 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंके हृदयमें महाप्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा थी, इसलिये वे शीघ्रतासे श्रीनीलाचल पहुँच गये ॥ 37 ॥ गौड़ीय-भक्तोंके आठारनालामें आगमनके संवादको सुनकर भक्तोंकी अगवानीके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दके हाथसे मालायें भेजना :- आठारनालाके आइला गोसाञि शुनिया। दुइ माला पाठाइला गोविन्द-हस्त दिया ॥ 38 ॥ अनुवाद—जब श्रीचैतन्य गोसाईंने सुना कि भक्त आठारनाला आ पहुँचे हैं, तब उन्होंने श्रीगोविन्दके हाथसे दो मालायें भिजवायीं ॥ 38 ॥ अनुभाष्य—'आठारनाला'—श्रीपुरुषोत्तम-नगरकी एक सीमापर विशेष पुल ॥ 38 ॥ श्रीनिताइ और श्रीअद्वैतका माला ग्रहण करना :- दुइ माला गोविन्द दुइजने पराइल। अद्वैत, अवधूत-गोसाञि बड़ सुख पाइल ॥ 39 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने वे दो मालाएँ श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायीं और वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए ॥ 39 ॥ सभीका वहींसे चलते हुए नृत्य-कीर्तन-आरम्भ :- ताहानि आरम्भ कैल कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। नाचिते नाचिते चलि' आइला दुइजन ॥ 40 ॥ अनुवाद—वहींसे ही सभीने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन करना आरम्भ कर दिया। श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों नाचते-नाचते हुए चलने लगे ॥ 40 ॥ श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुका फिरसे मालायें भेजना :- पुनः माला दिया स्वरूपादि निजगुणे। आगु बाड़ि' पाठाइल शचीर नन्दने ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीशचीनन्दनने भक्तोंके स्वागतके लिये पुनः श्रीस्वरूपादि निजगणोंको मालायें देकर आगे भेजा ॥ 41 ॥ । 53