श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1500, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/42–50 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नरेन्द्र सरोवरपर मिलकर सभीको माला देना :— नरेन्द्र आसिया, ताँहा सबारे मिलिला। महाप्रभुर दत्त माला सबारे पराइला॥ 42॥ अनुवाद—वे नरेन्द्र सरोवरपर गौड़देशसे आनेवाले सभी भक्तोंसे मिले और उन्होंने उन सबको महाप्रभुके द्वारा भेजी मालायें पहनायीं॥ 42॥ स्वयं सिंहद्वारपर आकर सभी भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन :— सिंहद्वार-निकटे आइला शुनि' गौरराय। आपने आसिया प्रभु मिलिला सबाय॥ 43॥ अनुवाद—'भक्तजन सिंहद्वारके निकट आ गये हैं'—ऐसा सुनकर श्रीगौरराय स्वयं आकर सभी भक्तोंसे मिले॥ 43॥ जगन्नाथ-दर्शनके बाद सभी भक्तोंके साथ वासस्थानपर आगमन :— सबा लञा कैल जगन्नाथ-दरशन। सबा लञा आइला पुनः आपन-भवन॥ 44॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभीको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शन किये। उसके बाद सभी भक्तोंको साथमें लेकर वे अपने वासस्थानपर आये॥ 44॥ सभीको श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके द्वारा लाया गया प्रसाद खिलाना :— वाणीनाथ, काशीमिश्र प्रसाद आनिल। स्वहस्ते सबारे प्रभु प्रसाद खाओयाइल॥ 45॥ अनुवाद—श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्र भगवान् श्रीजगन्नाथका प्रसाद लेकर आये और महाप्रभुने स्वयं अपने हाथोंसे सभीको प्रसाद परोसा॥ 45॥ सभीको पूर्ववर्षकी भाँति, निर्दिष्ट वास-स्थानादि देना :— पूर्व-वत्सरे याँर येइ वासा-स्थान। ताँहा सबा पाठाञा कराइल विश्राम॥ 46॥ अनुवाद—पिछले वर्ष जिस भक्तका जो वासस्थान था, इस वर्ष भी महाप्रभुने उसे वही स्थान दिया। तब महाप्रभुने सबको वहाँ विश्राम करनेके लिये भेज दिया॥ 46॥ भक्तोंका महाप्रभुके साथ पुरीमें चार मास रहना :— एइमत भक्तगण रहिला चारिमास। प्रभुर सहित करे कीर्त्तन-विलास॥ 47॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंने चार मास तक वहीं रहकर महाप्रभुके साथ कीर्त्तनका आनन्द लिया॥ 47॥ रथयात्राके समय सभीके द्वारा गुण्डिचा-मार्जन :— पूर्ववत् रथयात्रा-काल यबे आइल। सबा लञा गुण्डिचा-मन्दिर प्रक्षालिल॥ 48॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति जब रथयात्राका समय आया, तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर गुण्डिचा-मन्दिरकी धुलाई की॥ 48॥ महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीसत्यराजादिका श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी रस्सियाँ देना :— कुलीनग्रामी पट्टडोरी जगन्नाथे दिल। पूर्ववत् रथ-अग्रे नर्त्तन करिल॥ 49॥ अनुवाद—कुलीनग्रामवासी भक्तोंने अपने साथ लायी हुई रेशमी रस्सियाँ श्रीजगन्नाथके लिये दीं। पहलेकी भाँति सभीने रथके आगे नृत्य किया॥ 49॥ रथके आगे नृत्यके बाद सभीका उपवनमें विश्राम :— बहु नृत्य करि' पुनः चलिल उद्याने। वापी-तीरे ताँहा याइ' करिल विश्रामे॥ 50॥ अनुवाद—बहुत नृत्य करनेके बाद सभी उद्यानमें चले गये। वहाँ सरोवरके तटपर पहुँचकर सबने विश्राम किया॥ 50॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वापी'—कुआँ (?), जलाशय॥ 50॥ अनुभाष्य—'उद्याने'—जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें; 'वापी-तीरे'—नरेन्द्र सरोवरके तटपर॥ 50॥ 54 ।