श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1501, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/51-59 ] राढ़-देशके ब्राह्मण श्रीकृष्णदासके द्वारा महाप्रभुका अभिषेक और महाप्रभुको सुख :- राढ़ी एक विप्र, तेंहो-नित्यानन्द-दास। महा-भाग्यवान् तेंहो, नाम-कृष्णदास ॥ 51 ॥ घट भरि' प्रभुर तेंहो अभिषेक कैल। ताँर अभिषेके प्रभु महातृप्त हैल ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके आश्रित राढ़देशके एक महाभाग्यशाली ब्राह्मण जिनका नाम कृष्णदास था, उन्होंने एक घड़ेको भरकर वहीं महाप्रभुका अभिषेक किया। उनके अभिषेकसे महाप्रभु अत्यन्त सन्तुष्ट हुए॥ 51-52 ॥ सभीके द्वारा बलगण्डिमें लगे भोगके प्रसादका सम्मान :- बलगण्डि-भोगेरे बहु प्रसाद आइल। सबा सङ्गे महाप्रभु प्रसाद खाइल ॥ 53 ॥ अनुवाद—बलगण्डिमें श्रीजगन्नाथको लगे भोगका बहुत सा प्रसाद आया और महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ उस प्रसादको ग्रहण किया॥ 53 ॥ सभीके द्वारा हेरा-पञ्चमी-यात्राका दर्शन :- पूर्ववत् रथयात्रा कैल दरशन। हेरापञ्चमी-यात्रा देखे लञा भक्तगण ॥ 54 ॥ अनुवाद—पूर्व वर्षकी भाँति ही महाप्रभुने भक्तोंके साथ रथयात्राका दर्शन किया और हेरापञ्चमी-यात्राका भी दर्शन किया ॥ 54 ॥ आँधी-वर्षा में महाप्रभुका अकेले श्रीअद्वैतके घरमें भिक्षा-ग्रहण करना :- आचार्य गोसाञि प्रभुर कैल निमन्त्रण। तार मध्ये कैल यैछे झड़-वरिषण ॥ 55 ॥ चैतन्यभागवतमें उसका वर्णन :- विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ ॥ श्रीवास प्रभुरे तबे कैल निमन्त्रण ॥ 56 ॥ श्रीमालिनीदेवीके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- प्रभुर प्रिय-व्यञ्जन सब रान्धेन मालिनी। 'भक्त्ये दासी'-अभिमान, 'स्नेहेते जननी' ॥ 57 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको प्रसाद पानेके लिये अपने वासस्थानपर निमन्त्रण किया और तब आँधी-वर्षा आयी। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्य- भागवतमें इन घटनाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। तब एक दिन श्रीवास पण्डितने भी महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भक्तिके कारण स्वयंमें महाप्रभुकी दासी होनेका अभिमान रखती थीं, परन्तु वात्सल्य-भावसे वे महाप्रभुमें माताकी भाँति स्नेह रखती थीं। उन्होंने महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले सब व्यञ्जनोंको बनाया॥ 55-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैः भाः अन्त्यखण्ड, नौवाँ अध्याय— एकदिन श्रीअद्वैतने महाप्रभुको निमन्त्रित करनेका मन बनाया,-'यदि अन्य कोई संन्यासी महाप्रभुके साथ न आये, तो महाप्रभुको अच्छी तरहसे खिलाऊँगा।' अन्यान्य सभी संन्यासी मध्याह्न-क्रियाके लिये बाहर निकले थे, परन्तु उस समय आँधी-वर्षाके आ जानेसे वे श्रीअद्वैतके स्थानपर पहुँच नहीं पाये। श्रीअद्वैतकी इच्छानुसार महाप्रभुने अकेले ही आकर श्रीअद्वैतके अन्न-व्यञ्जनोंका भोजन किया॥ 55-56 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- आचार्यरत्न-आदि यत मुख्य भक्तगण। मध्ये मध्ये प्रभुरे करेन निमन्त्रण ॥ 58 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर (आचार्यरत्न) आदि सभी मुख्य-मुख्य भक्त बीच-बीचमें महाप्रभुको निमन्त्रण देते ॥ 58 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें श्रीनिताइके साथ एकान्तमें विचार :- चातुर्मास्य-अन्ते पुनः नित्यानन्दे लञा। किंवा युक्ति करे नित्य निभृते बसिया ॥ 59 ॥ । 55