भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1511

सोलहवाँ अध्याय 16/113-121 ] एक नव्य-नौका आनि' राखह नदीतीरे। याँहा स्नान करि' प्रभु यान नदी-पारे ॥ 114 ॥ राजाका प्रगाढ़ श्रीगौरप्रेम :- ताँहा स्तम्भ रोपण कर 'महातीर्थ' करि'। नित्य स्नान करिब ताँहा, ताँहा येन मरि ॥ 115 ॥ श्रीरामानन्दको महाप्रभुके निकट जानेका अनुरोध :- चतुद्वारि करह उत्तम नव्य वास। रामानन्द, याह तुमि महाप्रभु-पाश ॥" 116 ॥ अनुवाद— राजा प्रतापरुद्रने श्रीहरिचन्दन तथा श्रीमङ्गराज नामक अपने दो वरिष्ठ कर्मचारियोंको आज्ञा दी,—“मेरे इन (आदेश-पत्रके) आदेशोंका पालन करनेके लिये जो भी उचित हो, वह करना। नदीके तटपर एक नयी नौका तैयार रखना और महाप्रभु जहाँ स्नान करें अथवा नदीके दूसरी पार जाँय, उस स्थानको महातीर्थ जानकर वहाँ उसकी स्मृतिमें एक 'स्तम्भ' स्थापित कर देना। मैं नित्य वहीं स्नान करूँगा और मेरी इच्छा है कि मैं उसी स्थानपर ही प्राण त्याग करूँ। चतुर्द्वार नामक ग्राममें उत्तम नये घरोंका निर्माण करो। हे रामानन्द ! अब आप महाप्रभुके पास चले जाइये ॥ 113-116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चतुर्द्वार'—कटकसे महानदी पार करके चतुर्द्वार-ग्राममें जाया जा सकता है; उसीको ही साधारणतः 'चौदार' कहते हैं ॥ 116 ॥ अनुभाष्य— 'मङ्गराज'—'मरदराज' (?)। 'नव्यवास'—रहने योग्य नया घर ॥ 113-116 ॥ सन्ध्यामें स्त्रियोंके द्वारा महाप्रभुके गमनका दर्शन :- सन्ध्याते चलिबे प्रभु,—नृपति शुनिल। हस्ती-उपर ताम्बुगृहे स्त्रीगणे चड़ाइल ॥ 117 ॥ अनुवाद— जब राजा प्रतापरुद्रने सुना कि सन्ध्याके समय महाप्रभु चले जायेंगे, तब तुरन्त उन्होंने कुछ हाथियोंकी पीठके ऊपर तम्बू बँधवा दिये। फिर वे अपने महलकी स्त्रियोंको उन तम्बुओंमें बिठाकर उन्हें महाप्रभुके दर्शनोंके लिये ले गये ॥ 117 ॥ सन्ध्याके समय महाप्रभुकी कटकसे यात्रा :- प्रभुर चलिवार पथे रहे सारि हञा। सन्ध्याते चलिला प्रभु निजगण लञा ॥ 118 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके जानेके मार्गपर वे पंक्ति बनाकर खड़ी हो गयीं। सन्ध्याके समय महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ वहाँसे चल पड़े ॥ 118 ॥ महानदीमें स्नान, रानियोंके द्वारा प्रणाम :- 'चित्रोत्पला-नदी' आसि' घाटे कैल स्नान। महिषीसकल देखे करये प्रणाम ॥ 119 ॥ अनुवाद— 'चित्रोत्पला-नदी' पहुँचकर महाप्रभुने घाटपर स्नान किया। सभी रानियों और महलकी स्त्रियोंने महाप्रभुके दर्शन किये और उन्हें प्रणाम किया ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चित्रोत्पला-नदी'—कटकसे चलते हुए जिस स्थानपर महानदीकी एक शाखा-नदी आती है, उसे 'चित्रोत्पला-नदी' कहते हैं। उत्कलके पण्डितगण किसी तन्त्रमेंसे यह बात बतलाते हैं कि,—'कलौ चित्रोत्पला गङ्गा' अर्थात् कलियुगमें चित्रोत्पला ही गङ्गा है ॥ 119 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे सभीमें भावावेश :- प्रभुर दर्शने सबे हैल प्रेममय। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नेत्रे अश्रु वरिषय ॥ 120 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके दर्शनसे सभी रानियाँ और महलकी स्त्रियाँ प्रेममें विह्वल हो गयीं। वे सभी 'कृष्ण', 'कृष्ण' नामका कीर्तन करने लगीं और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी वर्षा होने लगी ॥ 120 ॥ अद्भुत करुणा-विग्रह :- एमन कृपालु नाहि शुनि त्रिभुवने। कृष्णप्रेमा हय याँर दूर दर्शने ॥ 121 ॥ अनुवाद— महाप्रभु जैसा कृपालु त्रिभुवनमें कोई भी नहीं सुना जाता है। जिनके दूरसे दर्शन करने मात्रसे ही श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता है ॥ 121 ॥ 65