श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1510, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/103-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सुनकर महाराज प्रतापरुद्रको बहुत आनन्द हुआ और बहुत शीघ्रतासे वे महाप्रभुके पास पहुँच गये। महाप्रभुको देखकर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेममें विह्वल होकर राजा प्रतापरुद्र बार-बार उठते और फिर भूमिपर गिर जाते। और जब वे स्तुति करने लगे, तब उनके समस्त अङ्ग पुलकित हो रहे थे तथा उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे॥ 103-104॥ जिससे उनका नाम ही "प्रतापरुद्र-संत्राता" अर्थात् 'राजा प्रतापरुद्रके उद्धारक' हो गया॥ 108 ॥ अनुभाष्य- 'याय' - जिससे, जिसके लिये ॥ 108 ॥ राजाके परिकरोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा राजाको विदायी देना :- राज-पात्रगण कैल प्रभुर वन्दन। राजारे विदाय दिला शचीर नन्दन ॥ 109 ॥ राजाकी शुद्धभक्तिको देखकर महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन। उठि' महाप्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 105 ॥ पुनः स्तुति करि' राजा करये प्रणाम। प्रभु-कृपा-अश्रुते ताँर देह हैल स्नान ॥ 106 ॥ अनुवाद - राजाके कर्मचारियोंने भी महाप्रभुकी वन्दना की। तब श्रीशचीनन्दनने राजा और उनके कर्मचारियोंको विदायी दी ॥ 109 ॥ अपने राज्यमें राजाके द्वारा घोषणा-पत्रका प्रचार :- बाहिरे आसि' राजा आज्ञा-पत्र लेखाइल। निज-राज्ये यत 'विषयी', ताहारे पाठाइल ॥ 110 ॥ 'ग्रामे-ग्रामे' नूतन आवास करिबा। पाँच-सात गृह सब सामग्र्ये भरिबा ॥ 111 ॥ आपनि प्रभुके लञा ताँहा उत्तरिबा। रात्रि-दिवा वेत्रहस्ते सेवाय रहिबा ॥" 112 ॥ अनुवाद-उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने उठकर राजाका आलिङ्गन किया। राजा पुनः पुनः स्तुति करके महाप्रभुको प्रणाम करने लगे। इस प्रकार महाप्रभुकी कृपा प्राप्तकर राजाके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे और उन अश्रुओंसे महाप्रभुकी देह भीग गयी ॥ 105-106 ॥ अनुभाष्य- 'स्नान'- भीग जाना ॥ 106 ॥ अनुवाद - उद्यानसे बाहर आकर राजाने आज्ञा-पत्र लिखवाये और अपने राज्यके सभी कर-संग्रह करनेवाले कर्मचारियोंके पास वे आज्ञा-पत्र भिजवाये। उस आदेश-पत्रमें उन कर्मचारियोंके लिये निर्देश थे कि वे प्रत्येक गाँवमें नये घर बनवायें और पाँच-सात घरोंमें खानेकी सब प्रकारकी सामग्रियाँ भरकर रखें। वे स्वयं महाप्रभुको उन नये घरोंमें ले जाँय तथा उनकी सुरक्षाके लिये रात-दिन हाथमें लाठी धारणकर उनकी सेवामें रहें ॥ 110-112 ॥ श्रीरायके द्वारा राजाको धैर्य प्रदान करना, महाप्रभुकी राजापर अप्राकृत कृपा :- सुस्थ करि, रामानन्द राजारे बसाइला। कायमनोवाक्ये प्रभु ताँरे कृपा कैला ॥ 107 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्दने राजाको धैर्य धारण करवाकर बैठा दिया। महाप्रभुने काय, मन और वचनसे राजापर कृपा की ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विषयी'- जो राजकर्मचारी गाँवसे कर संग्रह करता है ॥ 110 ॥ तभीसे महाप्रभुका नाम-'प्रतापरुद्र-संत्राता" :- ऐछे ताँहारे कृपा कैल गौरराय। "प्रतापरुद्र-संत्राता" नाम हैल याय ॥ 108 ॥ अनुवाद - श्रीगौररायने राजापर ऐसी कृपा की, दो महापात्रोंको आदेश :- दुइ महापात्र, – 'हरिचन्दन', 'मङ्गराज' (?)। ताँरे आज्ञा दिल राजा- "करिह सर्व काज ॥ 113 ॥ 64 ।