श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1509, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) है:
सोलहवाँ अध्याय 16/95–104 ] अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथका प्रसादी तांबेके वर्णका चन्दन, रस्सी आदि जो कुछ मिला, उन्होंने वह सब अपने साथ ले लिया॥95॥ अनुभाष्य—'कड़ार'—तांबेके वर्णका, प्रलेप (?); 'डोर'—रस्सी॥95॥ प्रभातमें यात्रा, पुरीवासी भक्तोंका महाप्रभुका अनुसरण :— जगन्नाथे आज्ञा मागि' प्रभाते चलिला। उड़िया-भक्तगण सङ्गे पाछे चलि' आइला॥96॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथकी आज्ञा लेकर प्रभातमें ही चल पड़े। उड़ीसाके भक्त भी उनके साथ उनके पीछे चलने लगे॥96॥ पुरीवासी भक्तोंको लौटानेके बाद सङ्गी-भक्तोंके साथ भवानीपुर आना :— उड़िया-भक्तगणे प्रभु यत्ने निवारिला। निजगण-सङ्गे प्रभु 'भवानीपुर' आइला॥97॥ अनुवाद—महाप्रभुने बड़ी प्रीतिसे आग्रह करके उड़िया भक्तोंको आगे साथ चलनेसे रोका। तब वे अपने भक्तोंके साथ 'भवानीपुर' आ पहुँचे॥97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भवानीपुर'—जान्कादेइपुर अर्थात् जानकीदेवीपुरके आगे 'भवानीपुर'॥97॥ श्रीरायका पीछेसे आगमन, श्रीवाणीनाथका प्रसाद भिजवाना :— रामानन्द आइला पाछे दोलाय चड़िया। वाणीनाथ बहु प्रसाद दिल पाठाञा॥98॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द बादमें पालकीपर चढ़कर वहाँ आये और श्रीवाणीनाथने बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया॥98॥ वहीँपर रात्रि बिताना, प्रातःकाल भुवनेश्वरमें आगमन :— प्रसाद भोजन करि' तथाय रहिला। प्रातःकाले चलि' प्रभु 'भुवनेश्वर' आइला॥99॥ अनुवाद—सभी प्रसाद पाकर रात्रिमें भवानीपुरमें ही रहे। प्रातःकाल चलकर महाप्रभु भुवनेश्वर आ गये॥99॥ वहाँसे कटकमें आकर श्रीसाक्षीगोपालका दर्शन :— 'कटके' आसिया कैल 'गोपाल' दरशन। स्वप्नेश्वर-विप्र कैल प्रभुर निमन्त्रण॥100॥ अनुवाद—कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने श्रीसाक्षी- गोपालका दर्शन किया। वहाँपर स्वप्नेश्वर नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥100॥ महाप्रभुके भक्तोंको श्रीरायका निमन्त्रण, उपवनमें महाप्रभुका स्थान :— रामानन्द-राय सब-गणे निमन्त्रिल। बाहिर उद्याने आसि' प्रभु वासा कैल॥101॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके सभी भक्तोंको प्रसाद ग्रहण करनेके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने मन्दिरके बाहर स्थित उद्यानमें विश्राम करनेका मन बनाया॥101॥ वृक्षके नीचे महाप्रभुका विश्राम करते समय श्रीप्रतापरुद्रको श्रीरायके द्वारा संवाद भेजना :— भिक्षा करि' बकुलतले करिला विश्राम। प्रतापरुद्र-ठानि राय करिल पयान॥102॥ अनुवाद—प्रसाद पानेके बाद महाप्रभु बकुलवृक्षके नीचे विश्राम करने लगे, तभी श्रीरामानन्द महाराज प्रतापरुद्रसे मिलनेके लिये गये॥102॥ राजाका तुरन्त आगमन और महाप्रभुको प्रणाम एवं स्तुति :— शुनि' आनन्दित राजा अतिशीघ्र आइला। प्रभु देखि' दण्डवत् भूमेते पड़िला॥103॥ पुनः उठे, पुनः पड़े प्रणय-विह्वल। स्तुति करे, पुलकाङ्गे पड़े अश्रुजल॥104॥ अनुवाद—महाप्रभुके कटकमें आगमनके विषयमें । 63