भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1508, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1508

[ 16/84-95 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दो वर्ष व्यतीत हो गये थे। उसके बाद दो वर्ष तक गौड़देश दिया याब ताँ-सबा देखिया। महाप्रभु वृन्दावन जाना चाहते थे, किन्तु वे श्रीरामानन्द तुमि दुँहे आज्ञा देह' परसन्न हञा॥” 91 ॥ रायके हठके कारण नहीं जा पाये ॥ 84-85 ॥ अनुवाद—गौड़देशमें मेरे दो आश्रय हैं—माता और अनुभाष्य—'हठ'—बलका प्रयोग; बलपूर्वक ॥ 85 ॥ जाह्नवी (गङ्गा)—ये दोनों दयामयी हैं। मैं गौड़देशसे होते पाँचवें वर्ष गौड़ीय-भक्तोंका रथयात्राके हुए जाऊँगा, जिससे उन दोनोंके दर्शन करते हुए दर्शनके बाद गौड़देशमें लौटना :- वृन्दावन चला जाऊँगा। अब आप दोनों मुझे प्रसन्नतापूर्वक पञ्चम वत्सरे गौड़ेर भक्तगण आइला। आज्ञा प्रदान कीजिये॥” 90-91 ॥ रथ देखि' ना रहिला, गौड़ेरे चलिला ॥ 86 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायकी सम्मति, किन्तु वर्षाके कारण अनुवाद—पाँचवे वर्ष गौड़देशके भक्तगण आये, विजया-दशमी तक रुकनेका अनुरोध :- किन्तु रथ-यात्राके दर्शनके बाद वे जगन्नाथ पुरीमें नहीं शुनिय़ा प्रभुर वाणी मने विचारय। रहे। वे सब गौड़देशमें लौट गये ॥ 86 ॥ प्रभु-सने अति हठ कभु भाल नय ॥ 92 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायसे महाप्रभुकी गौड़देशसे होकर दुँहे कहे,—“एबे वर्षा, चलिते नारिबा। वृन्दावन जानेके लिये सम्मतिकी प्रार्थना :- विजया-दशमी आइले, अवश्य चलिबा॥” 93 ॥ तबे प्रभु सार्वभौम-रामानन्द-स्थाने। अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर दोनों मन-ही-मनमें आलिङ्गन करि' कहे मधुर-वचने ॥ 87 ॥ विचार करने लगे कि महाप्रभुके साथ अधिक हठ “बहुत उत्कण्ठा मोर याइते वृन्दावन। करना कभी भी उचित नहीं है। उन दोनोंने कहा, — “अभी तोमार हठे दुइ वत्सर ना कैलुँ गमन ॥ 88 ॥ वर्षाका समय है, आपको यात्रामें बहुत कष्ट होगा। अवश्य चलिब, दुँहे करह सम्मति। विजया-दशमी आनेपर आप अवश्य ही जाना ॥” 92-93 ॥ तोमा-दुँहा बिना मोर नाहि अन्य गति ॥ 89 ॥ महाप्रभुके द्वारा वर्षाका समय व्यतीत करना और अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और विजया-दशमीके दिन वृन्दावनकी यात्रा :- श्रीरामानन्दको आलिङ्गन करके मधुर वचन कहे, — “मेरी आनन्दे महाप्रभु वर्षा कैल समाधान। वृन्दावन जानेकी बहुत उत्कण्ठा है, किन्तु आप विजया-दशमी-दिने करिल पयान ॥ 94 ॥ दोनोंकी हठके कारण मैं दो वर्ष तक नहीं गया। किन्तु अनुवाद—महाप्रभु उनकी बात सुनकर बहुत प्रसन्न अब मैं अवश्य ही जाऊँगा, इसलिये आप दोनों इसमें हुए। उन्होंने वर्षाकाल समाप्त होने तक प्रतीक्षा की अपनी सम्मति प्रदान करो। आप दोनोंके अतिरिक्त मेरी और विजया-दशमीके दिन वे वृन्दावनकी ओर चल अन्य कोई गति नहीं है ॥ 87-89 ॥ दिये ॥ 94 ॥ गौड़देशमें महाप्रभुकी दो पूज्य वस्तुएँ :- अनुभाष्य—'पयान'—प्रयाण; यात्रा ॥ 94 ॥ (1) शचीदेवी और (2) गङ्गादेवी— साथमें श्रीजगन्नाथके प्रसादादिको लेना :- गौड़-देशे हय मोर 'दुइ समाश्रय'। जगन्नाथेर प्रसाद प्रभु यत पाञाछिल। 'जननी' 'जाह्नवी', —एइ दुइ दयामय ॥ 90 ॥ कड़ार चन्दन, डोर, सब सङ्गे लैल ॥ 95 ॥ 62 ।