भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1507

सोलहवाँ अध्याय 16/78-85 ] श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिको श्रीगदाधरको पुनः मन्त्र देना और 'ओड़न-पष्ठी'का दर्शन :- गदाधर-पण्डिते तेंहो पुनः मन्त्र दिल। ओड़न-पष्ठीर दिने यात्रा ये देखिल ॥ 78 ॥ श्रीपुण्डरीक और श्रीजगन्नाथके माँड़से युक्त वस्त्रोंके कारण घटित घटनाका वर्णन :- जगन्नाथ परे तथा 'माडुया' वसन। देखिया सघृण हैल विद्यानिधिर मन ॥ 79 ॥ सेइ रात्र्ये जगन्नाथ-बलाइ आसिया। दुइ-भाइ चड़ा'न ताँरे हासिया हासिया ॥ 80 ॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने श्रीगदाधर पण्डितको पुनः मन्त्र प्रदान किया और उन्होंने ओड़न-पष्ठीके दिन महोत्सवका दर्शन किया। उस ओड़न षष्ठीके दिन श्रीजगन्नाथदेवने माँड़ लगे वस्त्र पहने थे, जिसे देखकर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके मनमें थोड़ीसी घृणाकी भावना आ गयी। उसी रात श्रीजगन्नाथ तथा श्रीबलदेव—दोनों भाई आकर हँसते-हँसते उन्हें थप्पड़ मारने लगे॥ 78-80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ओड़नषष्ठी'—सर्दीके आनेपर पहली छठी तिथिको 'ओड़नषष्ठी' कहते हैं। उस दिन श्रीजगन्नाथदेवके अङ्गमें सर्दियोंके वस्त्र अर्पित किये जाते हैं। वे सर्दीके वस्त्र—'माडुया'-वस्त्र अर्थात् जुलाहेके द्वारा बनाये हुए माँड़से युक्त बिना धुले वस्त्र होते हैं। देवताको माँड़ लगे हुए वस्त्र देनेपर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने उस विषयमें थोड़ी सी 'खूँटिनाटि' अर्थात् दोष दिखलाकर उड़ीया-भक्तोंके प्रति थोड़ीसी घृणा प्रकाशित करनेके कारण उसका उपयुक्त फल प्राप्त किया था॥ 78 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 78 ॥ चैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित :- गाल फुलिल, आचार्य अन्तरे उल्लास। विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ॥ 81 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके गाल थप्पड़ खानेसे सूज गये थे, तथापि उनके हृदयमें बहुत आनन्द था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 81 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डमें दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय देखें॥ 81 ॥ अनुभाष्य—'बलाइ'—श्रीबलराम; 'आचार्य'—आचार्यनिधि॥ 80-81 ॥ प्रत्येक वर्ष गौड़ीय भक्तोंका आगमन और दर्शनादि :- एइमत प्रत्यब्द आइसे गौड़ेर भक्तगण। प्रभु-सङ्गे रहि' करे यात्रा-दरशन ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रत्येक वर्ष गौड़देशके भक्त आते थे और महाप्रभुके साथ रहकर विभिन्न उत्सवोंका दर्शन करते थे॥ 82 ॥ उनमेंसे ग्रन्थकारकी विशेष-विशेष घटनाओंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- तार मध्ये ये ये वर्षे आछये विशेष। विस्तारिया ताहा शेष करिब निःशेष ॥ 83 ॥ अनुवाद—उनमेंसे जिन-जिन वर्षोंमें कुछ विशेष उल्लेखनीय बातें है, उनका सबका मैं विस्तृत रूपमें आगे वर्णन करूँगा॥ 83 ॥ भक्तोंके साथ चार-वर्ष नीलाचल-लीला, दो-वर्ष दक्षिणमें आवागमन :- एइमत महाप्रभुर चारि वत्सर गेल। दक्षिण यात्रा आसिते दुइ वत्सर लागिल ॥ 84 ॥ वृन्दावन जानेके लिये महाप्रभुकी दो वर्षसे इच्छा, किन्तु श्रीरायकी चेष्टासे नहीं जा पाना :- आर दुइ वत्सर चाहे वृन्दावन याइते। रामानन्द-हठे प्रभु ना परे चलिते ॥ 85 ॥ अनुवाद—इस प्रकार करते हुए महाप्रभुके चार वर्ष व्यतीत हो गये। दक्षिण भारतकी यात्रामें उनके पहले । 61