श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1506, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/74-77 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥” [अर्थात् “जो सभी प्राणियोंमें अपनी और भगवान्की सत्ता तथा अपने और भगवान्में सभी प्राणियोंकी सत्ताको अनुभव करते हैं, वे उत्तम भागवत कहलाते हैं।”] 'सनातन-शिक्षामें' मध्य 22वें अध्यायमें— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64॥ शास्त्रयुक्तये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥” 65॥ [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो भक्त शास्त्र और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण होनेके कारण दृढ़ श्रद्धावान् होते हैं, वे 'उत्तम-अधिकारी' हैं और वे संसारके सभी प्राणियोंका उद्धार कर सकते हैं।”] 'भगवान्', 'भक्ति' और 'भक्त'—इन तीन वस्तुओंमें महाभागवतकी अप्राकृत असङ्कुचित प्रेममयी दृष्टि होती है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं देखते हैं। “सबे कृष्ण भजे,—एइ मात्र जाने” अर्थात् “वे केवलमात्र इतना ही जानते हैं कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं।” इसलिये वे श्रीकृष्णके द्वारा सम्पूर्ण रूपसे अङ्गीकार की गयी वस्तु हैं॥ 74॥ महाप्रभुके द्वारा तीन प्रकारके अधिकारके वैष्णवोंके लक्षणका निर्देश :— क्रम करि' कहे प्रभु 'वैष्णव'-लक्षण। 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', आर 'वैष्णवतम'॥ 75॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने क्रमशः 'वैष्णव', 'वैष्णवतर' और 'वैष्णवतम'के लक्षण बतलाये॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुलीनग्रामवासी भक्तोंके पिछले वर्ष किये गये प्रश्नके उत्तरमें अर्थात् 'याँर मुखे एकबार शुनि कृष्णनाम' आदि सुनकर भी कुलीनग्रामवासियोंने जब इस बार पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने कहा,—जिसके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनो, उसे 'वैष्णवश्रेष्ठ' जानकर उसके चरणोंका निरन्तर भजन करो। अगले वर्ष जब कुलीनग्रामवासियोंने पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने उस बार उत्तर दिया,—जिनके दर्शन करने मात्रसे ही दर्शकके मुखमें श्रीकृष्णनाम सहज ही आ जाय, उनको तुम 'वैष्णव-प्रधान' जानना। इस प्रकार तीन वर्षोंमें तीन प्रकारके उत्तरोंका विचार करके देखनेपर महाप्रभुके वचनोंमें 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', और 'वैष्णवतम'—इन तीन प्रकारके वैष्णवोंके लक्षण मिलते हैं। इन तीन प्रकारके वैष्णवोंकी सेवा ही गृहस्थ-वैष्णवोंका कर्त्तव्य है। महाप्रभुकी बातका तात्पर्य यह है कि,—जिन्होंने केवल वैष्णवी-दीक्षामात्र ग्रहण की है, किन्तु एकबार भी अपराधरहित होकर श्रीकृष्ण-नाम नहीं किया, उस वैष्णवकी सेवा करनेका कोई प्रयोजन नहीं है; केवल 'सुहृद्', 'अतिथि' जानकर ही उसका सम्मान करना आवश्यक है॥ 69-75॥ श्रीपुण्डरीकके अतिरिक्त अन्य सभीका गौड़देश लौटना :— एइमत सब वैष्णव गौड़े चलिला। विद्यानिधि से-वत्सर नीलाद्रि रहिला॥ 76॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी वैष्णव गौड़देशमें लौट गये। परन्तु उस वर्ष श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि नीलाद्रि (जगन्नाथपुरी)में ही रह गये॥ 76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विद्यानिधि'—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि॥ 76॥ श्रीस्वरूपके साथ श्रीपुण्डरीकका सख्यभाव :— स्वरूप-सहित ताँर हय सख्य-प्रीति। दुइ-जनाय कृष्ण-कथाय एकत्रइ स्थिति॥ 77॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिकी श्रीस्वरूप दामोदरके साथ सखा जैसी प्रीति थी। श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें दोनों एक ही स्तरपर स्थित थे॥ 77॥ 60 |