भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1505

सोलहवाँ अध्याय 16/73-74 ] अगले वर्ष पुनः उनके द्वारा 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा करनेपर महाप्रभुका उत्तर :- वर्षान्तरे पुनः ताँरा ऐछे प्रश्न कैल। वैष्णवेर तारतम्य प्रभु शिखाइल ॥ 73 ॥ अनुवाद-एक वर्षके बाद पुनः कुलीनग्रामवासियोंने ऐसा ही प्रश्न किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने उन्हें पुनः वैष्णवोंका तारतम्य सिखलाया ॥ 73 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'उत्तमाधिकारी या महाभागवत'के लक्षणका निर्देश :- याँहार दर्शने मुखे आइसे कृष्णनाम। ताँहारे जानिह तुमि 'वैष्णव-प्रधान' ॥ 74 ॥ अनुवाद-जिनके दर्शनमात्रसे मुखसे श्रीकृष्णनाम निकलने लगे, उन्हें तुम वैष्णवोंमें प्रधान समझना ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-जिन वैष्णवको देखकर देखनेवालेके मुखमें श्रीकृष्णनाम स्वाभाविक रूपमें ही आ जाता है, उन्हें स्वरूपसिद्ध 'महाभागवत' जानना। वे सम्पूर्ण रूपसे विकसित और उद्दीप्त अथवा अनावृत चेतनवृत्तिसे युक्त रहते हैं। अथवा वे श्रीकृष्णकी केवल शुद्धप्रेम-सेवामें निमग्न रहनेके कारण सर्वदा जाग्रत अवस्थामें अर्थात् अपने स्वरूपमें अवस्थान करते हैं। वे भगवद् ज्ञान और विज्ञानसे युक्त होनेके कारण सर्वत्र श्रीकृष्णके दर्शन करते हैं और सभी जीवोंको श्रीकृष्णसे सम्बन्धित देखते हैं। उनके श्रीमुखसे निरन्तर शुद्ध श्रीकृष्णनामका भलीभाँति कीर्तन होता रहता है। वे स्वयं दिव्यनेत्रोंसे युक्त होनेके कारण श्रीकृष्ण-विस्मृति अथवा श्रीकृष्ण-विमुखता रूपी मोह-निद्रामें सोये हुए अन्य जीवोंके बन्द अज्ञानमय चक्षुओंको खोल देते हैं अर्थात् वे उन्हें जड़तासे मुक्त करवाकर दिव्यनेत्र प्रदान करके चेतनवृत्तिसे युक्त कर देते हैं। वे ऐसे चेतनवृत्तियुक्त जीवोंको सदैव श्रीकृष्ण और कार्ष्ण (श्रीकृष्णभक्तों)की सेवामें नियुक्त करनेमें समर्थ हैं। "ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने जने" [अर्थात् ऐसे एक-एक वैष्णव एक-एक ब्रह्माण्डका उद्धार करनेमें समर्थ हैं]। मध्यलीला 6/279 संख्या- “लोहाके यावत् स्पर्श' हेम नाहि करे। तावत् स्पर्शमणि केह चिन्ते ना पारे॥" [अर्थात् “जब तक अपने स्पर्शसे वह लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई पहचान नहीं पाता।”] आदि वाक्य उत्तम भागवतके सम्बन्धमें ही कहे गये हैं। श्रीरूप गोस्वामीने 'उपदेशामृत'में कहा है- “शुश्रूषया भजनविज्ञमनन्यमन्य- निन्दादिशून्यहृदमीप्सितसङ्गलब्ध्या।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत आदि वैष्णव स्मृतियोंके अनुसार भजनके तत्त्वको भलीप्रकार जानकर अनन्य रूपसे श्रीकृष्णका भजन करता है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी अभिनिवेश नहीं रहनेके कारण दूसरोंकी निन्दा आदिसे शून्य निर्मल-हृदयवाला है, ऐसे भजनविज्ञ अर्थात् मानससेवाके द्वारा अष्टकालीयलीला-स्मरण भजन परिपाटीमें अभिज्ञ महाभागवतको स्वजातीय अन्तःकरणवाले सुस्निग्धजनोंमें सर्वोत्तम सङ्ग जानकर प्रणिपात, परिप्रश्न और प्रीतिपूर्वक सेवाके द्वारा उनका आदर करना चाहिये।”] महाप्रभुके श्रीमुखसे कहे गये “तृणादपि सुनीच” श्लोकका सम्पूर्ण रूपसे आचरण करनेवाले और मध्यलीला 9/36-37 संख्याके अनुसार वे 'आश्रयजातीय कृष्ण' अथवा 'महाभागवत' हैं-वे ही शुद्ध हरिकीर्तन करनेवाले हैं। वे अन्य जीवोंके जड़ीय उच्च-नीच शरीरोंको नहीं देखते अथवा उनका हृदय अन्य व्यक्तियोंकी निन्दा आदिसे रहित है। इसलिये ऐसे व्यक्तिसे ही 'मध्यम-भागवत' सदैव श्रवणके इच्छुक होकर उनकी सब प्रकारसे सेवा करके उनको सन्तुष्ट करनेपर अन्तमें उनकी कृपाके प्रभावसे वह मध्यम अधिकारी ही 'उत्तम-अधिकारी' बननेका सौभाग्य प्राप्त करता है। भाः 11/2/45- । 59