भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1504

[ 16/72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'लोभ' भी है। जिह्वाकी लालसाकी तृप्ति अथवा बहुत अधिक धन-संग्रह या अनेक मतोंको ग्रहण करनेकी लालसा भी भजनमें बाधा है। अन्तमें 'अन्तर'-शब्दका अर्थ पाखण्ड है। निम्नलिखित विचार अथवा कार्य पाखण्ड है—

  1. विष्णु-विग्रह जो साक्षात् भगवान् हैं, उनको शिला, काष्ठ, स्वर्ण, पीतल आदि धातुका मानना,
  2. गुरुको एक साधारण मनुष्य समझना,
  3. वैष्णवकी जातिका विचार अथवा उसे प्राकृत समझना,
  4. विष्णु-वैष्णवके चरणामृतको सामान्य जल समझना,
  5. विष्णुके नाम-मन्त्रको अथवा सद्गुरुके द्वारा दिये गये नामको 'सामान्य जागतिक शब्द' समझना,
  6. सर्वेश्वरेश्वर विष्णुको अथवा विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको उनकी निजशक्तिके अंश त्रिगुणोंके अधीन देवताओंके साथ समान मानना,
  7. अचित्के आश्रयमें अथवा अचित्से आत्मा अथवा चेतनकी उपलब्धिकी चेष्टा,
  8. अप्राकृत वास्तव वस्तुको प्राकृत, खण्ड, इन्द्रियोंके द्वारा माँपी जा सकनेवाली वस्तुके समान समझना
  9. द्वैतबुद्धिसे श्रीहरि, गुरु और वैष्णवोंमें परस्पर भेद मानना। ये सभी अपराधोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। भक्तिसन्दर्भमें श्रीजीवप्रभुकी उक्ति (265 संख्यामें)— “नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतम्” इत्यादौ देहद्रविणादि- निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दश अपराधा लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीनामको सुनकर भी देह- धनादिमें लिप्त रहता है, वह पाखण्डी है। पाखण्ड-शब्दसे दसों अपराध लक्षित होते हैं, क्योंकि ये सब अपराध पाखण्डमय हैं।”] (भाः 11/2/46)— “ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥” [अर्थात् “जो ईश्वरसे प्रेम, वैष्णवसे मैत्री, मूढ़ व्यक्तिपर कृपा और द्वेषीकी उपेक्षा करते हैं, वे मध्यम भक्त हैं।”] 'सनातन शिक्षामें' मध्यलीला 22वाँ अध्याय— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारि ॥ 64 ॥ शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान् ॥ 66 ॥ रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त-तर-तम।” 68क। [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति मध्यम-अधिकारी है। रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है।”] मध्यम-भागवत निरन्तर कीर्तन-यज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करता है। इसके द्वारा उसकी श्रीनाममें प्रीति वर्धित होती है और क्रमशः वह 'प्रेम'के स्तरपर पहुँच जाता है। वह अप्राकृत श्रीनाममें निरन्तर प्रीतियुक्त होकर अनुशीलन करते-करते स्वयंको 'अप्राकृत कृष्णदास'के रूपमें जान पाता है। और श्रीनाममें अपेक्षाकृत स्वल्प रुचिवाले भक्तको वह कभी-कभी नामके अप्राकृत स्वरूपके विषयमें समझाकर उसपर कृपा करता है। शुद्धभक्तोंमें और भगवान्में पूर्णतया प्रीतिरहित विद्वेषी व्यक्तियोंको ऐसा जानकर कि ये 'श्रीकृष्णके अप्राकृत-स्वरूपकी अनुभूतिसे रहित हैं और इनकी चेतन-वृत्ति मायासे आवृत है, इसलिये ये केवल-प्राकृत हैं', वह उनके सङ्गका त्याग करता है। मध्यम अधिकारी शुद्धभक्तिके उपादान अथवा उपकरण आदिको भी 'अप्राकृत' समझता है॥ 72 ॥ 58 ।
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