भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1503

सोलहवाँ अध्याय 16/66-72 ] अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-मैं 'देह' और आप 'प्राण' हो; ये दोनों वस्तुएँ कभी भी अलग नहीं हैं; तथापि आप-नीलाचलमें और मैं-गौड़में, इस प्रकार जो अलग रहते हैं, वह केवल आपकी अचिन्त्य शक्तिसे ही घटता है॥ 66-67 ॥ श्रीनिताइ और अन्यान्य सभी भक्तोंको विदायी देना :- ताँरे विदाय दिल प्रभु करि' आलिङ्गन। एइमत विदाय दिल सब भक्तगण ॥ 68 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। इस प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको भी विदायी दी॥ 68॥ श्रीसत्यराजादिकी पूर्व वर्षकी भाँति महाप्रभुसे अपने कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा :- कुलीनग्रामी पूर्ववत् कैल निवेदन । "प्रभु, आज्ञा कर, - कर्त्तव्य आमार साधन ॥" 69॥ अनुवाद-कुलीनग्रामवासियोंने पूर्व वर्षकी भाँति निवेदन करते हुए पूछा, - "हे प्रभो ! हमें आज्ञा दीजिये कि क्या साधन हमारा कर्त्तव्य है ? ॥"69॥ महाप्रभुका उत्तर :- प्रभु कहे, - "वैष्णव-सेवा, नाम-सङ्कीर्त्तन । दुइ कर, शीघ्र पाबे श्रीकृष्ण-चरण ॥"70॥ अनुवाद-महाप्रभुने उत्तर दिया, - "वैष्णव-सेवा और नाम-सङ्कीर्त्तन-इन दो कार्योंको करो, तुम्हें शीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी ॥" 70 ॥ श्रीसत्यराजादिकी महाप्रभुसे 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा :- तेँहो कहे, - "के वैष्णव, कि ताँर लक्षण ?" तबे हासि' कहे प्रभु जानि' ताँर मन ॥ 71 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'मध्यम-वैष्णव'के लक्षणका निर्देश :- "कृष्णनाम निरन्तर याँहार वदने। सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज ताँहार चरणे ॥"72॥ अनुवाद-श्रीसत्यराजादिने प्रश्न किया, - "वैष्णव कौन हैं और उनके लक्षण क्या हैं?" तब महाप्रभु उनके मनकी भावनाको जानकर हँसते हुए बोले, - "श्रीकृष्णनाम निरन्तर जिनके मुखमें विराजमान रहता है, वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हैं, उनके चरणोंकी सेवा करो ॥" 71-72 ॥ अनुभाष्य-जिस वैष्णवके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम उच्चारित होता है, उसे 'कोमल श्रद्धावाले एकबार श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेवाले कनिष्ठ वैष्णव'की अपेक्षा श्रेष्ठ अर्थात् 'मध्यम भागवत' जानना ; उसके चरणोंकी सेवा करना। श्रीरूप गोस्वामीने उपदेशामृतमें लिखा है- 'प्रणतिभिश्च भजन्तमीशम्' अर्थात् मध्यमाधिकारी भागवतको परस्पर 'प्रणाम'रूपी व्यवहार करनेके लिये उपदेश दिया है। निरन्तर, - 'अन्तर' अर्थात् बाधा जिसमें नहीं है। [श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त] अन्याभिलाषाएँ, कर्म, ज्ञान और चेतन-वृत्तिके कार्यमें शिथिलता अर्थात् आलस्य-ये सभी अन्तर या बाधा हैं। जैसे श्रीरूप प्रभुने (भःरःसिः, पूर्व विः, प्रथम लहरीमें कहा है- “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥" [अर्थात् "श्रीकृष्णको सुखी करनेकी स्पृहाके अतिरिक्त समस्त प्रकारकी अभिलाषाओंसे रहित, ज्ञानकर्मादिके द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही कायिक, मानसिक और वाचिक समस्त चेष्टाओं और भावके द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गतिसे जो श्रीकृष्णका अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओंको) उत्तमा भक्ति कहते हैं।”] अथवा, 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है। इन्द्रियतृप्तिमें लिप्त होना श्रीकृष्ण-भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ 'द्रविण' अर्थात् 'धन' है। श्रीकृष्णसेवामें धनका सदुपयोग नहीं करके उसके संग्रहकी चेष्टा भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'जनता' भी है। असत्सङ्ग अथवा दुःसङ्ग भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ । 57