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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सोलहवाँ अध्याय 16/66-72 ] अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-मैं 'देह' और आप 'प्राण' हो; ये दोनों वस्तुएँ कभी भी अलग नहीं हैं; तथापि आप-नीलाचलमें और मैं-गौड़में, इस प्रकार जो अलग रहते हैं, वह केवल आपकी अचिन्त्य शक्तिसे ही घटता है॥ 66-67 ॥ श्रीनिताइ और अन्यान्य सभी भक्तोंको विदायी देना :- ताँरे विदाय दिल प्रभु करि' आलिङ्गन। एइमत विदाय दिल सब भक्तगण ॥ 68 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। इस प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको भी विदायी दी॥ 68॥ श्रीसत्यराजादिकी पूर्व वर्षकी भाँति महाप्रभुसे अपने कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा :- कुलीनग्रामी पूर्ववत् कैल निवेदन । "प्रभु, आज्ञा कर, - कर्त्तव्य आमार साधन ॥" 69॥ अनुवाद-कुलीनग्रामवासियोंने पूर्व वर्षकी भाँति निवेदन करते हुए पूछा, - "हे प्रभो ! हमें आज्ञा दीजिये कि क्या साधन हमारा कर्त्तव्य है ? ॥"69॥ महाप्रभुका उत्तर :- प्रभु कहे, - "वैष्णव-सेवा, नाम-सङ्कीर्त्तन । दुइ कर, शीघ्र पाबे श्रीकृष्ण-चरण ॥"70॥ अनुवाद-महाप्रभुने उत्तर दिया, - "वैष्णव-सेवा और नाम-सङ्कीर्त्तन-इन दो कार्योंको करो, तुम्हें शीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी ॥" 70 ॥ श्रीसत्यराजादिकी महाप्रभुसे 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा :- तेँहो कहे, - "के वैष्णव, कि ताँर लक्षण ?" तबे हासि' कहे प्रभु जानि' ताँर मन ॥ 71 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'मध्यम-वैष्णव'के लक्षणका निर्देश :- "कृष्णनाम निरन्तर याँहार वदने। सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज ताँहार चरणे ॥"72॥ अनुवाद-श्रीसत्यराजादिने प्रश्न किया, - "वैष्णव कौन हैं और उनके लक्षण क्या हैं?" तब महाप्रभु उनके मनकी भावनाको जानकर हँसते हुए बोले, - "श्रीकृष्णनाम निरन्तर जिनके मुखमें विराजमान रहता है, वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हैं, उनके चरणोंकी सेवा करो ॥" 71-72 ॥ अनुभाष्य-जिस वैष्णवके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम उच्चारित होता है, उसे 'कोमल श्रद्धावाले एकबार श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेवाले कनिष्ठ वैष्णव'की अपेक्षा श्रेष्ठ अर्थात् 'मध्यम भागवत' जानना ; उसके चरणोंकी सेवा करना। श्रीरूप गोस्वामीने उपदेशामृतमें लिखा है- 'प्रणतिभिश्च भजन्तमीशम्' अर्थात् मध्यमाधिकारी भागवतको परस्पर 'प्रणाम'रूपी व्यवहार करनेके लिये उपदेश दिया है। निरन्तर, - 'अन्तर' अर्थात् बाधा जिसमें नहीं है। [श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त] अन्याभिलाषाएँ, कर्म, ज्ञान और चेतन-वृत्तिके कार्यमें शिथिलता अर्थात् आलस्य-ये सभी अन्तर या बाधा हैं। जैसे श्रीरूप प्रभुने (भःरःसिः, पूर्व विः, प्रथम लहरीमें कहा है- “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥" [अर्थात् "श्रीकृष्णको सुखी करनेकी स्पृहाके अतिरिक्त समस्त प्रकारकी अभिलाषाओंसे रहित, ज्ञानकर्मादिके द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही कायिक, मानसिक और वाचिक समस्त चेष्टाओं और भावके द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गतिसे जो श्रीकृष्णका अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओंको) उत्तमा भक्ति कहते हैं।”] अथवा, 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है। इन्द्रियतृप्तिमें लिप्त होना श्रीकृष्ण-भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ 'द्रविण' अर्थात् 'धन' है। श्रीकृष्णसेवामें धनका सदुपयोग नहीं करके उसके संग्रहकी चेष्टा भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'जनता' भी है। असत्सङ्ग अथवा दुःसङ्ग भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ । 57

[ 16/72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'लोभ' भी है। जिह्वाकी लालसाकी तृप्ति अथवा बहुत अधिक धन-संग्रह या अनेक मतोंको ग्रहण करनेकी लालसा भी भजनमें बाधा है। अन्तमें 'अन्तर'-शब्दका अर्थ पाखण्ड है। निम्नलिखित विचार अथवा कार्य पाखण्ड है—

  1. विष्णु-विग्रह जो साक्षात् भगवान् हैं, उनको शिला, काष्ठ, स्वर्ण, पीतल आदि धातुका मानना,
  2. गुरुको एक साधारण मनुष्य समझना,
  3. वैष्णवकी जातिका विचार अथवा उसे प्राकृत समझना,
  4. विष्णु-वैष्णवके चरणामृतको सामान्य जल समझना,
  5. विष्णुके नाम-मन्त्रको अथवा सद्गुरुके द्वारा दिये गये नामको 'सामान्य जागतिक शब्द' समझना,
  6. सर्वेश्वरेश्वर विष्णुको अथवा विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको उनकी निजशक्तिके अंश त्रिगुणोंके अधीन देवताओंके साथ समान मानना,
  7. अचित्के आश्रयमें अथवा अचित्से आत्मा अथवा चेतनकी उपलब्धिकी चेष्टा,
  8. अप्राकृत वास्तव वस्तुको प्राकृत, खण्ड, इन्द्रियोंके द्वारा माँपी जा सकनेवाली वस्तुके समान समझना
  9. द्वैतबुद्धिसे श्रीहरि, गुरु और वैष्णवोंमें परस्पर भेद मानना। ये सभी अपराधोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। भक्तिसन्दर्भमें श्रीजीवप्रभुकी उक्ति (265 संख्यामें)— “नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतम्” इत्यादौ देहद्रविणादि- निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दश अपराधा लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीनामको सुनकर भी देह- धनादिमें लिप्त रहता है, वह पाखण्डी है। पाखण्ड-शब्दसे दसों अपराध लक्षित होते हैं, क्योंकि ये सब अपराध पाखण्डमय हैं।”] (भाः 11/2/46)— “ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥” [अर्थात् “जो ईश्वरसे प्रेम, वैष्णवसे मैत्री, मूढ़ व्यक्तिपर कृपा और द्वेषीकी उपेक्षा करते हैं, वे मध्यम भक्त हैं।”] 'सनातन शिक्षामें' मध्यलीला 22वाँ अध्याय— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारि ॥ 64 ॥ शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान् ॥ 66 ॥ रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त-तर-तम।” 68क। [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति मध्यम-अधिकारी है। रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है।”] मध्यम-भागवत निरन्तर कीर्तन-यज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करता है। इसके द्वारा उसकी श्रीनाममें प्रीति वर्धित होती है और क्रमशः वह 'प्रेम'के स्तरपर पहुँच जाता है। वह अप्राकृत श्रीनाममें निरन्तर प्रीतियुक्त होकर अनुशीलन करते-करते स्वयंको 'अप्राकृत कृष्णदास'के रूपमें जान पाता है। और श्रीनाममें अपेक्षाकृत स्वल्प रुचिवाले भक्तको वह कभी-कभी नामके अप्राकृत स्वरूपके विषयमें समझाकर उसपर कृपा करता है। शुद्धभक्तोंमें और भगवान्में पूर्णतया प्रीतिरहित विद्वेषी व्यक्तियोंको ऐसा जानकर कि ये 'श्रीकृष्णके अप्राकृत-स्वरूपकी अनुभूतिसे रहित हैं और इनकी चेतन-वृत्ति मायासे आवृत है, इसलिये ये केवल-प्राकृत हैं', वह उनके सङ्गका त्याग करता है। मध्यम अधिकारी शुद्धभक्तिके उपादान अथवा उपकरण आदिको भी 'अप्राकृत' समझता है॥ 72 ॥ 58 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/73-74 ] अगले वर्ष पुनः उनके द्वारा 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा करनेपर महाप्रभुका उत्तर :- वर्षान्तरे पुनः ताँरा ऐछे प्रश्न कैल। वैष्णवेर तारतम्य प्रभु शिखाइल ॥ 73 ॥ अनुवाद-एक वर्षके बाद पुनः कुलीनग्रामवासियोंने ऐसा ही प्रश्न किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने उन्हें पुनः वैष्णवोंका तारतम्य सिखलाया ॥ 73 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'उत्तमाधिकारी या महाभागवत'के लक्षणका निर्देश :- याँहार दर्शने मुखे आइसे कृष्णनाम। ताँहारे जानिह तुमि 'वैष्णव-प्रधान' ॥ 74 ॥ अनुवाद-जिनके दर्शनमात्रसे मुखसे श्रीकृष्णनाम निकलने लगे, उन्हें तुम वैष्णवोंमें प्रधान समझना ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-जिन वैष्णवको देखकर देखनेवालेके मुखमें श्रीकृष्णनाम स्वाभाविक रूपमें ही आ जाता है, उन्हें स्वरूपसिद्ध 'महाभागवत' जानना। वे सम्पूर्ण रूपसे विकसित और उद्दीप्त अथवा अनावृत चेतनवृत्तिसे युक्त रहते हैं। अथवा वे श्रीकृष्णकी केवल शुद्धप्रेम-सेवामें निमग्न रहनेके कारण सर्वदा जाग्रत अवस्थामें अर्थात् अपने स्वरूपमें अवस्थान करते हैं। वे भगवद् ज्ञान और विज्ञानसे युक्त होनेके कारण सर्वत्र श्रीकृष्णके दर्शन करते हैं और सभी जीवोंको श्रीकृष्णसे सम्बन्धित देखते हैं। उनके श्रीमुखसे निरन्तर शुद्ध श्रीकृष्णनामका भलीभाँति कीर्तन होता रहता है। वे स्वयं दिव्यनेत्रोंसे युक्त होनेके कारण श्रीकृष्ण-विस्मृति अथवा श्रीकृष्ण-विमुखता रूपी मोह-निद्रामें सोये हुए अन्य जीवोंके बन्द अज्ञानमय चक्षुओंको खोल देते हैं अर्थात् वे उन्हें जड़तासे मुक्त करवाकर दिव्यनेत्र प्रदान करके चेतनवृत्तिसे युक्त कर देते हैं। वे ऐसे चेतनवृत्तियुक्त जीवोंको सदैव श्रीकृष्ण और कार्ष्ण (श्रीकृष्णभक्तों)की सेवामें नियुक्त करनेमें समर्थ हैं। "ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने जने" [अर्थात् ऐसे एक-एक वैष्णव एक-एक ब्रह्माण्डका उद्धार करनेमें समर्थ हैं]। मध्यलीला 6/279 संख्या- “लोहाके यावत् स्पर्श' हेम नाहि करे। तावत् स्पर्शमणि केह चिन्ते ना पारे॥" [अर्थात् “जब तक अपने स्पर्शसे वह लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई पहचान नहीं पाता।”] आदि वाक्य उत्तम भागवतके सम्बन्धमें ही कहे गये हैं। श्रीरूप गोस्वामीने 'उपदेशामृत'में कहा है- “शुश्रूषया भजनविज्ञमनन्यमन्य- निन्दादिशून्यहृदमीप्सितसङ्गलब्ध्या।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत आदि वैष्णव स्मृतियोंके अनुसार भजनके तत्त्वको भलीप्रकार जानकर अनन्य रूपसे श्रीकृष्णका भजन करता है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी अभिनिवेश नहीं रहनेके कारण दूसरोंकी निन्दा आदिसे शून्य निर्मल-हृदयवाला है, ऐसे भजनविज्ञ अर्थात् मानससेवाके द्वारा अष्टकालीयलीला-स्मरण भजन परिपाटीमें अभिज्ञ महाभागवतको स्वजातीय अन्तःकरणवाले सुस्निग्धजनोंमें सर्वोत्तम सङ्ग जानकर प्रणिपात, परिप्रश्न और प्रीतिपूर्वक सेवाके द्वारा उनका आदर करना चाहिये।”] महाप्रभुके श्रीमुखसे कहे गये “तृणादपि सुनीच” श्लोकका सम्पूर्ण रूपसे आचरण करनेवाले और मध्यलीला 9/36-37 संख्याके अनुसार वे 'आश्रयजातीय कृष्ण' अथवा 'महाभागवत' हैं-वे ही शुद्ध हरिकीर्तन करनेवाले हैं। वे अन्य जीवोंके जड़ीय उच्च-नीच शरीरोंको नहीं देखते अथवा उनका हृदय अन्य व्यक्तियोंकी निन्दा आदिसे रहित है। इसलिये ऐसे व्यक्तिसे ही 'मध्यम-भागवत' सदैव श्रवणके इच्छुक होकर उनकी सब प्रकारसे सेवा करके उनको सन्तुष्ट करनेपर अन्तमें उनकी कृपाके प्रभावसे वह मध्यम अधिकारी ही 'उत्तम-अधिकारी' बननेका सौभाग्य प्राप्त करता है। भाः 11/2/45- । 59

[ 16/74-77 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥” [अर्थात् “जो सभी प्राणियोंमें अपनी और भगवान्‌की सत्ता तथा अपने और भगवान्‌में सभी प्राणियोंकी सत्ताको अनुभव करते हैं, वे उत्तम भागवत कहलाते हैं।”] 'सनातन-शिक्षामें' मध्य 22वें अध्यायमें— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64॥ शास्त्रयुक्तये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥” 65॥ [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो भक्त शास्त्र और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण होनेके कारण दृढ़ श्रद्धावान् होते हैं, वे 'उत्तम-अधिकारी' हैं और वे संसारके सभी प्राणियोंका उद्धार कर सकते हैं।”] 'भगवान्', 'भक्ति' और 'भक्त'—इन तीन वस्तुओंमें महाभागवतकी अप्राकृत असङ्कुचित प्रेममयी दृष्टि होती है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं देखते हैं। “सबे कृष्ण भजे,—एइ मात्र जाने” अर्थात् “वे केवलमात्र इतना ही जानते हैं कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं।” इसलिये वे श्रीकृष्णके द्वारा सम्पूर्ण रूपसे अङ्गीकार की गयी वस्तु हैं॥ 74॥ महाप्रभुके द्वारा तीन प्रकारके अधिकारके वैष्णवोंके लक्षणका निर्देश :— क्रम करि' कहे प्रभु 'वैष्णव'-लक्षण। 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', आर 'वैष्णवतम'॥ 75॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने क्रमशः 'वैष्णव', 'वैष्णवतर' और 'वैष्णवतम'के लक्षण बतलाये॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुलीनग्रामवासी भक्तोंके पिछले वर्ष किये गये प्रश्नके उत्तरमें अर्थात् 'याँर मुखे एकबार शुनि कृष्णनाम' आदि सुनकर भी कुलीनग्रामवासियोंने जब इस बार पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने कहा,—जिसके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनो, उसे 'वैष्णवश्रेष्ठ' जानकर उसके चरणोंका निरन्तर भजन करो। अगले वर्ष जब कुलीनग्रामवासियोंने पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने उस बार उत्तर दिया,—जिनके दर्शन करने मात्रसे ही दर्शकके मुखमें श्रीकृष्णनाम सहज ही आ जाय, उनको तुम 'वैष्णव-प्रधान' जानना। इस प्रकार तीन वर्षोंमें तीन प्रकारके उत्तरोंका विचार करके देखनेपर महाप्रभुके वचनोंमें 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', और 'वैष्णवतम'—इन तीन प्रकारके वैष्णवोंके लक्षण मिलते हैं। इन तीन प्रकारके वैष्णवोंकी सेवा ही गृहस्थ-वैष्णवोंका कर्त्तव्य है। महाप्रभुकी बातका तात्पर्य यह है कि,—जिन्होंने केवल वैष्णवी-दीक्षामात्र ग्रहण की है, किन्तु एकबार भी अपराधरहित होकर श्रीकृष्ण-नाम नहीं किया, उस वैष्णवकी सेवा करनेका कोई प्रयोजन नहीं है; केवल 'सुहृद्', 'अतिथि' जानकर ही उसका सम्मान करना आवश्यक है॥ 69-75॥ श्रीपुण्डरीकके अतिरिक्त अन्य सभीका गौड़देश लौटना :— एइमत सब वैष्णव गौड़े चलिला। विद्यानिधि से-वत्सर नीलाद्रि रहिला॥ 76॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी वैष्णव गौड़देशमें लौट गये। परन्तु उस वर्ष श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि नीलाद्रि (जगन्नाथपुरी)में ही रह गये॥ 76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विद्यानिधि'—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि॥ 76॥ श्रीस्वरूपके साथ श्रीपुण्डरीकका सख्यभाव :— स्वरूप-सहित ताँर हय सख्य-प्रीति। दुइ-जनाय कृष्ण-कथाय एकत्रइ स्थिति॥ 77॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिकी श्रीस्वरूप दामोदरके साथ सखा जैसी प्रीति थी। श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें दोनों एक ही स्तरपर स्थित थे॥ 77॥ 60 |

सोलहवाँ अध्याय 16/78-85 ] श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिको श्रीगदाधरको पुनः मन्त्र देना और 'ओड़न-पष्ठी'का दर्शन :- गदाधर-पण्डिते तेंहो पुनः मन्त्र दिल। ओड़न-पष्ठीर दिने यात्रा ये देखिल ॥ 78 ॥ श्रीपुण्डरीक और श्रीजगन्नाथके माँड़से युक्त वस्त्रोंके कारण घटित घटनाका वर्णन :- जगन्नाथ परे तथा 'माडुया' वसन। देखिया सघृण हैल विद्यानिधिर मन ॥ 79 ॥ सेइ रात्र्ये जगन्नाथ-बलाइ आसिया। दुइ-भाइ चड़ा'न ताँरे हासिया हासिया ॥ 80 ॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने श्रीगदाधर पण्डितको पुनः मन्त्र प्रदान किया और उन्होंने ओड़न-पष्ठीके दिन महोत्सवका दर्शन किया। उस ओड़न षष्ठीके दिन श्रीजगन्नाथदेवने माँड़ लगे वस्त्र पहने थे, जिसे देखकर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके मनमें थोड़ीसी घृणाकी भावना आ गयी। उसी रात श्रीजगन्नाथ तथा श्रीबलदेव—दोनों भाई आकर हँसते-हँसते उन्हें थप्पड़ मारने लगे॥ 78-80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ओड़नषष्ठी'—सर्दीके आनेपर पहली छठी तिथिको 'ओड़नषष्ठी' कहते हैं। उस दिन श्रीजगन्नाथदेवके अङ्गमें सर्दियोंके वस्त्र अर्पित किये जाते हैं। वे सर्दीके वस्त्र—'माडुया'-वस्त्र अर्थात् जुलाहेके द्वारा बनाये हुए माँड़से युक्त बिना धुले वस्त्र होते हैं। देवताको माँड़ लगे हुए वस्त्र देनेपर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने उस विषयमें थोड़ी सी 'खूँटिनाटि' अर्थात् दोष दिखलाकर उड़ीया-भक्तोंके प्रति थोड़ीसी घृणा प्रकाशित करनेके कारण उसका उपयुक्त फल प्राप्त किया था॥ 78 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 78 ॥ चैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित :- गाल फुलिल, आचार्य अन्तरे उल्लास। विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ॥ 81 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके गाल थप्पड़ खानेसे सूज गये थे, तथापि उनके हृदयमें बहुत आनन्द था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 81 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डमें दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय देखें॥ 81 ॥ अनुभाष्य—'बलाइ'—श्रीबलराम; 'आचार्य'—आचार्यनिधि॥ 80-81 ॥ प्रत्येक वर्ष गौड़ीय भक्तोंका आगमन और दर्शनादि :- एइमत प्रत्यब्द आइसे गौड़ेर भक्तगण। प्रभु-सङ्गे रहि' करे यात्रा-दरशन ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रत्येक वर्ष गौड़देशके भक्त आते थे और महाप्रभुके साथ रहकर विभिन्न उत्सवोंका दर्शन करते थे॥ 82 ॥ उनमेंसे ग्रन्थकारकी विशेष-विशेष घटनाओंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- तार मध्ये ये ये वर्षे आछये विशेष। विस्तारिया ताहा शेष करिब निःशेष ॥ 83 ॥ अनुवाद—उनमेंसे जिन-जिन वर्षोंमें कुछ विशेष उल्लेखनीय बातें है, उनका सबका मैं विस्तृत रूपमें आगे वर्णन करूँगा॥ 83 ॥ भक्तोंके साथ चार-वर्ष नीलाचल-लीला, दो-वर्ष दक्षिणमें आवागमन :- एइमत महाप्रभुर चारि वत्सर गेल। दक्षिण यात्रा आसिते दुइ वत्सर लागिल ॥ 84 ॥ वृन्दावन जानेके लिये महाप्रभुकी दो वर्षसे इच्छा, किन्तु श्रीरायकी चेष्टासे नहीं जा पाना :- आर दुइ वत्सर चाहे वृन्दावन याइते। रामानन्द-हठे प्रभु ना परे चलिते ॥ 85 ॥ अनुवाद—इस प्रकार करते हुए महाप्रभुके चार वर्ष व्यतीत हो गये। दक्षिण भारतकी यात्रामें उनके पहले । 61

[ 16/84-95 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दो वर्ष व्यतीत हो गये थे। उसके बाद दो वर्ष तक गौड़देश दिया याब ताँ-सबा देखिया। महाप्रभु वृन्दावन जाना चाहते थे, किन्तु वे श्रीरामानन्द तुमि दुँहे आज्ञा देह' परसन्न हञा॥” 91 ॥ रायके हठके कारण नहीं जा पाये ॥ 84-85 ॥ अनुवाद—गौड़देशमें मेरे दो आश्रय हैं—माता और अनुभाष्य—'हठ'—बलका प्रयोग; बलपूर्वक ॥ 85 ॥ जाह्नवी (गङ्गा)—ये दोनों दयामयी हैं। मैं गौड़देशसे होते पाँचवें वर्ष गौड़ीय-भक्तोंका रथयात्राके हुए जाऊँगा, जिससे उन दोनोंके दर्शन करते हुए दर्शनके बाद गौड़देशमें लौटना :- वृन्दावन चला जाऊँगा। अब आप दोनों मुझे प्रसन्नतापूर्वक पञ्चम वत्सरे गौड़ेर भक्तगण आइला। आज्ञा प्रदान कीजिये॥” 90-91 ॥ रथ देखि' ना रहिला, गौड़ेरे चलिला ॥ 86 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायकी सम्मति, किन्तु वर्षाके कारण अनुवाद—पाँचवे वर्ष गौड़देशके भक्तगण आये, विजया-दशमी तक रुकनेका अनुरोध :- किन्तु रथ-यात्राके दर्शनके बाद वे जगन्नाथ पुरीमें नहीं शुनिय़ा प्रभुर वाणी मने विचारय। रहे। वे सब गौड़देशमें लौट गये ॥ 86 ॥ प्रभु-सने अति हठ कभु भाल नय ॥ 92 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायसे महाप्रभुकी गौड़देशसे होकर दुँहे कहे,—“एबे वर्षा, चलिते नारिबा। वृन्दावन जानेके लिये सम्मतिकी प्रार्थना :- विजया-दशमी आइले, अवश्य चलिबा॥” 93 ॥ तबे प्रभु सार्वभौम-रामानन्द-स्थाने। अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर दोनों मन-ही-मनमें आलिङ्गन करि' कहे मधुर-वचने ॥ 87 ॥ विचार करने लगे कि महाप्रभुके साथ अधिक हठ “बहुत उत्कण्ठा मोर याइते वृन्दावन। करना कभी भी उचित नहीं है। उन दोनोंने कहा, — “अभी तोमार हठे दुइ वत्सर ना कैलुँ गमन ॥ 88 ॥ वर्षाका समय है, आपको यात्रामें बहुत कष्ट होगा। अवश्य चलिब, दुँहे करह सम्मति। विजया-दशमी आनेपर आप अवश्य ही जाना ॥” 92-93 ॥ तोमा-दुँहा बिना मोर नाहि अन्य गति ॥ 89 ॥ महाप्रभुके द्वारा वर्षाका समय व्यतीत करना और अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और विजया-दशमीके दिन वृन्दावनकी यात्रा :- श्रीरामानन्दको आलिङ्गन करके मधुर वचन कहे, — “मेरी आनन्दे महाप्रभु वर्षा कैल समाधान। वृन्दावन जानेकी बहुत उत्कण्ठा है, किन्तु आप विजया-दशमी-दिने करिल पयान ॥ 94 ॥ दोनोंकी हठके कारण मैं दो वर्ष तक नहीं गया। किन्तु अनुवाद—महाप्रभु उनकी बात सुनकर बहुत प्रसन्न अब मैं अवश्य ही जाऊँगा, इसलिये आप दोनों इसमें हुए। उन्होंने वर्षाकाल समाप्त होने तक प्रतीक्षा की अपनी सम्मति प्रदान करो। आप दोनोंके अतिरिक्त मेरी और विजया-दशमीके दिन वे वृन्दावनकी ओर चल अन्य कोई गति नहीं है ॥ 87-89 ॥ दिये ॥ 94 ॥ गौड़देशमें महाप्रभुकी दो पूज्य वस्तुएँ :- अनुभाष्य—'पयान'—प्रयाण; यात्रा ॥ 94 ॥ (1) शचीदेवी और (2) गङ्गादेवी— साथमें श्रीजगन्नाथके प्रसादादिको लेना :- गौड़-देशे हय मोर 'दुइ समाश्रय'। जगन्नाथेर प्रसाद प्रभु यत पाञाछिल। 'जननी' 'जाह्नवी', —एइ दुइ दयामय ॥ 90 ॥ कड़ार चन्दन, डोर, सब सङ्गे लैल ॥ 95 ॥ 62 ।

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सोलहवाँ अध्याय 16/95–104 ] अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथका प्रसादी तांबेके वर्णका चन्दन, रस्सी आदि जो कुछ मिला, उन्होंने वह सब अपने साथ ले लिया॥95॥ अनुभाष्य—'कड़ार'—तांबेके वर्णका, प्रलेप (?); 'डोर'—रस्सी॥95॥ प्रभातमें यात्रा, पुरीवासी भक्तोंका महाप्रभुका अनुसरण :— जगन्नाथे आज्ञा मागि' प्रभाते चलिला। उड़िया-भक्तगण सङ्गे पाछे चलि' आइला॥96॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथकी आज्ञा लेकर प्रभातमें ही चल पड़े। उड़ीसाके भक्त भी उनके साथ उनके पीछे चलने लगे॥96॥ पुरीवासी भक्तोंको लौटानेके बाद सङ्गी-भक्तोंके साथ भवानीपुर आना :— उड़िया-भक्तगणे प्रभु यत्ने निवारिला। निजगण-सङ्गे प्रभु 'भवानीपुर' आइला॥97॥ अनुवाद—महाप्रभुने बड़ी प्रीतिसे आग्रह करके उड़िया भक्तोंको आगे साथ चलनेसे रोका। तब वे अपने भक्तोंके साथ 'भवानीपुर' आ पहुँचे॥97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भवानीपुर'—जान्कादेइपुर अर्थात् जानकीदेवीपुरके आगे 'भवानीपुर'॥97॥ श्रीरायका पीछेसे आगमन, श्रीवाणीनाथका प्रसाद भिजवाना :— रामानन्द आइला पाछे दोलाय चड़िया। वाणीनाथ बहु प्रसाद दिल पाठाञा॥98॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द बादमें पालकीपर चढ़कर वहाँ आये और श्रीवाणीनाथने बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया॥98॥ वहीँपर रात्रि बिताना, प्रातःकाल भुवनेश्वरमें आगमन :— प्रसाद भोजन करि' तथाय रहिला। प्रातःकाले चलि' प्रभु 'भुवनेश्वर' आइला॥99॥ अनुवाद—सभी प्रसाद पाकर रात्रिमें भवानीपुरमें ही रहे। प्रातःकाल चलकर महाप्रभु भुवनेश्वर आ गये॥99॥ वहाँसे कटकमें आकर श्रीसाक्षीगोपालका दर्शन :— 'कटके' आसिया कैल 'गोपाल' दरशन। स्वप्नेश्वर-विप्र कैल प्रभुर निमन्त्रण॥100॥ अनुवाद—कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने श्रीसाक्षी- गोपालका दर्शन किया। वहाँपर स्वप्नेश्वर नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥100॥ महाप्रभुके भक्तोंको श्रीरायका निमन्त्रण, उपवनमें महाप्रभुका स्थान :— रामानन्द-राय सब-गणे निमन्त्रिल। बाहिर उद्याने आसि' प्रभु वासा कैल॥101॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके सभी भक्तोंको प्रसाद ग्रहण करनेके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने मन्दिरके बाहर स्थित उद्यानमें विश्राम करनेका मन बनाया॥101॥ वृक्षके नीचे महाप्रभुका विश्राम करते समय श्रीप्रतापरुद्रको श्रीरायके द्वारा संवाद भेजना :— भिक्षा करि' बकुलतले करिला विश्राम। प्रतापरुद्र-ठानि राय करिल पयान॥102॥ अनुवाद—प्रसाद पानेके बाद महाप्रभु बकुलवृक्षके नीचे विश्राम करने लगे, तभी श्रीरामानन्द महाराज प्रतापरुद्रसे मिलनेके लिये गये॥102॥ राजाका तुरन्त आगमन और महाप्रभुको प्रणाम एवं स्तुति :— शुनि' आनन्दित राजा अतिशीघ्र आइला। प्रभु देखि' दण्डवत् भूमेते पड़िला॥103॥ पुनः उठे, पुनः पड़े प्रणय-विह्वल। स्तुति करे, पुलकाङ्गे पड़े अश्रुजल॥104॥ अनुवाद—महाप्रभुके कटकमें आगमनके विषयमें । 63

[ 16/103-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सुनकर महाराज प्रतापरुद्रको बहुत आनन्द हुआ और बहुत शीघ्रतासे वे महाप्रभुके पास पहुँच गये। महाप्रभुको देखकर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेममें विह्वल होकर राजा प्रतापरुद्र बार-बार उठते और फिर भूमिपर गिर जाते। और जब वे स्तुति करने लगे, तब उनके समस्त अङ्ग पुलकित हो रहे थे तथा उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे॥ 103-104॥ जिससे उनका नाम ही "प्रतापरुद्र-संत्राता" अर्थात् 'राजा प्रतापरुद्रके उद्धारक' हो गया॥ 108 ॥ अनुभाष्य- 'याय' - जिससे, जिसके लिये ॥ 108 ॥ राजाके परिकरोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा राजाको विदायी देना :- राज-पात्रगण कैल प्रभुर वन्दन। राजारे विदाय दिला शचीर नन्दन ॥ 109 ॥ राजाकी शुद्धभक्तिको देखकर महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन। उठि' महाप्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 105 ॥ पुनः स्तुति करि' राजा करये प्रणाम। प्रभु-कृपा-अश्रुते ताँर देह हैल स्नान ॥ 106 ॥ अनुवाद - राजाके कर्मचारियोंने भी महाप्रभुकी वन्दना की। तब श्रीशचीनन्दनने राजा और उनके कर्मचारियोंको विदायी दी ॥ 109 ॥ अपने राज्यमें राजाके द्वारा घोषणा-पत्रका प्रचार :- बाहिरे आसि' राजा आज्ञा-पत्र लेखाइल। निज-राज्ये यत 'विषयी', ताहारे पाठाइल ॥ 110 ॥ 'ग्रामे-ग्रामे' नूतन आवास करिबा। पाँच-सात गृह सब सामग्र्ये भरिबा ॥ 111 ॥ आपनि प्रभुके लञा ताँहा उत्तरिबा। रात्रि-दिवा वेत्रहस्ते सेवाय रहिबा ॥" 112 ॥ अनुवाद-उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने उठकर राजाका आलिङ्गन किया। राजा पुनः पुनः स्तुति करके महाप्रभुको प्रणाम करने लगे। इस प्रकार महाप्रभुकी कृपा प्राप्तकर राजाके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे और उन अश्रुओंसे महाप्रभुकी देह भीग गयी ॥ 105-106 ॥ अनुभाष्य- 'स्नान'- भीग जाना ॥ 106 ॥ अनुवाद - उद्यानसे बाहर आकर राजाने आज्ञा-पत्र लिखवाये और अपने राज्यके सभी कर-संग्रह करनेवाले कर्मचारियोंके पास वे आज्ञा-पत्र भिजवाये। उस आदेश-पत्रमें उन कर्मचारियोंके लिये निर्देश थे कि वे प्रत्येक गाँवमें नये घर बनवायें और पाँच-सात घरोंमें खानेकी सब प्रकारकी सामग्रियाँ भरकर रखें। वे स्वयं महाप्रभुको उन नये घरोंमें ले जाँय तथा उनकी सुरक्षाके लिये रात-दिन हाथमें लाठी धारणकर उनकी सेवामें रहें ॥ 110-112 ॥ श्रीरायके द्वारा राजाको धैर्य प्रदान करना, महाप्रभुकी राजापर अप्राकृत कृपा :- सुस्थ करि, रामानन्द राजारे बसाइला। कायमनोवाक्ये प्रभु ताँरे कृपा कैला ॥ 107 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्दने राजाको धैर्य धारण करवाकर बैठा दिया। महाप्रभुने काय, मन और वचनसे राजापर कृपा की ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विषयी'- जो राजकर्मचारी गाँवसे कर संग्रह करता है ॥ 110 ॥ तभीसे महाप्रभुका नाम-'प्रतापरुद्र-संत्राता" :- ऐछे ताँहारे कृपा कैल गौरराय। "प्रतापरुद्र-संत्राता" नाम हैल याय ॥ 108 ॥ अनुवाद - श्रीगौररायने राजापर ऐसी कृपा की, दो महापात्रोंको आदेश :- दुइ महापात्र, – 'हरिचन्दन', 'मङ्गराज' (?)। ताँरे आज्ञा दिल राजा- "करिह सर्व काज ॥ 113 ॥ 64 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/113-121 ] एक नव्य-नौका आनि' राखह नदीतीरे। याँहा स्नान करि' प्रभु यान नदी-पारे ॥ 114 ॥ राजाका प्रगाढ़ श्रीगौरप्रेम :- ताँहा स्तम्भ रोपण कर 'महातीर्थ' करि'। नित्य स्नान करिब ताँहा, ताँहा येन मरि ॥ 115 ॥ श्रीरामानन्दको महाप्रभुके निकट जानेका अनुरोध :- चतुद्वारि करह उत्तम नव्य वास। रामानन्द, याह तुमि महाप्रभु-पाश ॥" 116 ॥ अनुवाद— राजा प्रतापरुद्रने श्रीहरिचन्दन तथा श्रीमङ्गराज नामक अपने दो वरिष्ठ कर्मचारियोंको आज्ञा दी,—“मेरे इन (आदेश-पत्रके) आदेशोंका पालन करनेके लिये जो भी उचित हो, वह करना। नदीके तटपर एक नयी नौका तैयार रखना और महाप्रभु जहाँ स्नान करें अथवा नदीके दूसरी पार जाँय, उस स्थानको महातीर्थ जानकर वहाँ उसकी स्मृतिमें एक 'स्तम्भ' स्थापित कर देना। मैं नित्य वहीं स्नान करूँगा और मेरी इच्छा है कि मैं उसी स्थानपर ही प्राण त्याग करूँ। चतुर्द्वार नामक ग्राममें उत्तम नये घरोंका निर्माण करो। हे रामानन्द ! अब आप महाप्रभुके पास चले जाइये ॥ 113-116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चतुर्द्वार'—कटकसे महानदी पार करके चतुर्द्वार-ग्राममें जाया जा सकता है; उसीको ही साधारणतः 'चौदार' कहते हैं ॥ 116 ॥ अनुभाष्य— 'मङ्गराज'—'मरदराज' (?)। 'नव्यवास'—रहने योग्य नया घर ॥ 113-116 ॥ सन्ध्यामें स्त्रियोंके द्वारा महाप्रभुके गमनका दर्शन :- सन्ध्याते चलिबे प्रभु,—नृपति शुनिल। हस्ती-उपर ताम्बुगृहे स्त्रीगणे चड़ाइल ॥ 117 ॥ अनुवाद— जब राजा प्रतापरुद्रने सुना कि सन्ध्याके समय महाप्रभु चले जायेंगे, तब तुरन्त उन्होंने कुछ हाथियोंकी पीठके ऊपर तम्बू बँधवा दिये। फिर वे अपने महलकी स्त्रियोंको उन तम्बुओंमें बिठाकर उन्हें महाप्रभुके दर्शनोंके लिये ले गये ॥ 117 ॥ सन्ध्याके समय महाप्रभुकी कटकसे यात्रा :- प्रभुर चलिवार पथे रहे सारि हञा। सन्ध्याते चलिला प्रभु निजगण लञा ॥ 118 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके जानेके मार्गपर वे पंक्ति बनाकर खड़ी हो गयीं। सन्ध्याके समय महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ वहाँसे चल पड़े ॥ 118 ॥ महानदीमें स्नान, रानियोंके द्वारा प्रणाम :- 'चित्रोत्पला-नदी' आसि' घाटे कैल स्नान। महिषीसकल देखे करये प्रणाम ॥ 119 ॥ अनुवाद— 'चित्रोत्पला-नदी' पहुँचकर महाप्रभुने घाटपर स्नान किया। सभी रानियों और महलकी स्त्रियोंने महाप्रभुके दर्शन किये और उन्हें प्रणाम किया ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चित्रोत्पला-नदी'—कटकसे चलते हुए जिस स्थानपर महानदीकी एक शाखा-नदी आती है, उसे 'चित्रोत्पला-नदी' कहते हैं। उत्कलके पण्डितगण किसी तन्त्रमेंसे यह बात बतलाते हैं कि,—'कलौ चित्रोत्पला गङ्गा' अर्थात् कलियुगमें चित्रोत्पला ही गङ्गा है ॥ 119 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे सभीमें भावावेश :- प्रभुर दर्शने सबे हैल प्रेममय। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नेत्रे अश्रु वरिषय ॥ 120 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके दर्शनसे सभी रानियाँ और महलकी स्त्रियाँ प्रेममें विह्वल हो गयीं। वे सभी 'कृष्ण', 'कृष्ण' नामका कीर्तन करने लगीं और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी वर्षा होने लगी ॥ 120 ॥ अद्भुत करुणा-विग्रह :- एमन कृपालु नाहि शुनि त्रिभुवने। कृष्णप्रेमा हय याँर दूर दर्शने ॥ 121 ॥ अनुवाद— महाप्रभु जैसा कृपालु त्रिभुवनमें कोई भी नहीं सुना जाता है। जिनके दूरसे दर्शन करने मात्रसे ही श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता है ॥ 121 ॥ 65

[ 16/122-131 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नदीको पारकर चतुर्द्वारमें आकर प्रतिदिन पड़िछाओंके द्वारा भेजे गये जगन्नाथके प्रसादका सेवन :- नौकाते चढ़िया प्रभु हैल नदी पार। ज्योत्स्नावती रात्र्ये चलि' आइला चतुर्द्वार ॥ 122 ॥ रात्र्ये तथा रहि' प्राते स्नानकृत्य कैल। हेनकाले जगन्नाथेर महाप्रसाद आइल ॥ 123 ॥ राजार आज्ञाय पड़िछा पाठाय दिने-दिने। बहुत प्रसाद पाठाय दिया बहु-जने ॥ 124 ॥ स्वगण सहिते प्रभु प्रसाद अङ्गीकरि' । उठिया चलिला प्रभु बलि' 'हरि' 'हरि' ॥ 125 ॥ अनुवाद—तब नौकापर चढ़कर महाप्रभुने नदी पार की। चाँदनी रात्रिमें वे चलते हुए चतुर्द्वार नामक गाँवमें आ पहुँचे। रात्रिमें चतुर्द्वारमें रहकर महाप्रभुने प्रातःकाल स्नानकृत्य किया, उसी समय श्रीजगन्नाथका महाप्रसाद आ गया। राजाकी आज्ञासे पड़िछा प्रतिदिन श्रीजगन्नाथजीका इतना अधिक प्रसाद भेजता था कि उस प्रसादको बहुतसे लोग उठाकर लाते थे। अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने प्रसादको ग्रहण किया और 'हरि' 'हरि' बोलते हुए वे उठकर चल दिये ॥ 122-125 ॥ साथमें तीन राजकर्मचारियोंमें श्रीराय प्रमुख :- रामानन्द, मङ्गराज (?), श्रीहरिचन्दन। सङ्गे सेवा करि' चले एइ तिन जन ॥ 126 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय, श्रीमङ्गराज तथा श्रीहरिचन्दन—ये तीनों महाप्रभुकी सेवा करते हुए सदा उनके साथ चल रहे थे ॥ 126 ॥ महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्राके प्रधान सङ्गी :- प्रभुसङ्गे पुरी-गोसाञि, स्वरूप-दामोदर। जगदानन्द, मुकुन्द, गोविन्द, काशीश्वर ॥ 127 ॥ हरिदास ठाकुर आर पण्डित-वक्रेश्वर। गोपीनाथाचार्य, आर पण्डित-दामोदर ॥ 128 ॥ रामाइ, नन्दाइ आर बहु भक्तगण। प्रधान कहिलुँ, सबार के करे गणन ॥ 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके साथ श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ तथा अन्य और भी अनेक भक्त थे। मैंने प्रधान भक्तोंके नामोंका उल्लेख किया है। सभी भक्तोंकी कौन गणना कर सकता है? ॥ 127-129 ॥ आधे क्षणके लिये भी महाप्रभुके विच्छेदमें कातर श्रीगदाधरका अतुलनीय श्रीगौरप्रेम :- गदाधर-पण्डित तब सङ्गेते चलिला। 'क्षेत्र-संन्यास ना छाड़िह'—प्रभु निषेधिला ॥ 130 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित भी तब महाप्रभुके साथ चलने लगे, परन्तु 'क्षेत्र-संन्यासको मत छोड़ना'—ऐसा कहकर महाप्रभुने उन्हें साथ चलनेके लिये मना किया ॥ 130 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'क्षेत्र-संन्यास'—जो अपने पूर्व गृहका त्याग करके किसी विशेष (विष्णु) तीर्थमें अर्थात् पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें या नवद्वीप-धाममें या मथुरादि-मण्डलमें अकेले अथवा सपरिवार परमार्थ-बुद्धिके सहित वास करते हैं, उनके आश्रमको 'क्षेत्र-संन्यास' कहते हैं। यही आश्रम ही कलिकालका उपयुक्त 'वानप्रस्थ-धर्म' है। सार्वभौम-भट्टाचार्यका भी ऐसा ही 'क्षेत्र-संन्यास' कहा गया है ॥ 130 ॥ महाप्रभुके सङ्गके लोभसे धामवासरूपी क्षेत्रसंन्यासके त्यागमें भी पण्डित अविचलित :- पण्डित कहे,—"याँहा तुमि, सेइ नीलाचल। क्षेत्र-संन्यास मोर याउक रसातल ॥" 131 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—"आप जहाँपर हैं, वही नीलाचल है। मेरा ऐसा क्षेत्र-संन्यास रसातलमें चला जाय ॥" 131 ॥ 66

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सोलहवाँ अध्याय 16/132-138 ] महाप्रभु-सङ्गके लोभसे सेवा-परित्याग और सेवाकी प्रतिज्ञाके उल्लङ्घनमें भी पण्डित अविचलित :— प्रभु कहे,—“इँहा कर गोपीनाथ-सेवन।” पण्डित कहे,—“कोटि-सेवा त्वत्पाद-दर्शन॥” 132॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यहाँ नीलाचलमें रहकर श्रीगोपीनाथकी सेवा करो।” श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—“आपके चरणोंके दर्शनमात्रसे ही श्रीगोपीनाथकी करोड़ गुणा अधिक सेवा हो जाती है॥” 132॥ अपने भावी-कलङ्ककी आशङ्काको दिखलाकर महाप्रभुका पुरीसे ही पण्डितको उनके पीछे अनुसरण करने हेतु निषेध :— प्रभु कहे,—“सेवा छाड़िबे, आमाय लागे दोष। इँहा रहिं सेवा कर,—आमार सन्तोष॥” 133॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यदि तुम सेवा छोड़ोगे, तो दोष मुझे लगेगा। इसलिये यहींपर रहकर सेवा करो, इसीमें मुझे सन्तुष्टि होगी॥” 133॥ श्रीगदाधरका अभिमान :— पण्डित कहे,—“सब दोष आमार उपर। तोमा-सङ्गे ना याइब, याइब एकेश्वर॥ 134॥ ‘आइ’के देखिते याइब, ना याइब तोमा लागि’। ‘प्रतिज्ञा’-‘सेवा’-त्याग-दोष, तार आमि भागी॥” 135॥ अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—“सारा दोष मुझपर लगेगा। मैं आपके साथ नहीं जाऊँगा, किन्तु मैं अकेला ही जाऊँगा। मैं ‘आइ’ (शचीमाताके) दर्शनोंके लिये जाऊँगा, आपसे मिलनेके लिये नहीं जाऊँगा। इसलिये ‘क्षेत्र-संन्यासकी प्रतिज्ञा’ तथा ‘श्रीगोपीनाथकी सेवा’को त्यागनेके दोषका मैं ही उत्तरदायी होऊँगा॥” 134-135॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीगोपीनाथकी सेवा प्राप्त करके उस सेवामें ही जीवन व्यतीत करनेकी प्रतिज्ञा की थी। महाप्रभुके साथ गौड़देशमें जानेपर उस ‘प्रतिज्ञा-भङ्ग-दोष’ और ‘सेवा-त्याग-दोष’—ये दो दोष होते हैं। अनुराग-मार्गमें इन सब दोषोंको महात्मागण स्वीकार करते हैं॥ 135॥ अनुभाष्य— ‘एकेश्वर’—आज भी चट्टग्राम-क्षेत्रमें ‘अकेले’के अर्थमें ‘एकेश्वर’ शब्दका अपभ्रंश ‘अश्वर’ प्रचलित है। जीवनमें सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करनेवाले श्रीगोपीनाथके विग्रहकी सेवारूपी प्रतिज्ञाको विफल करके श्रीगदाधर पण्डित श्रीगौराङ्गका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये भगवद्- सेवाको भी बिना प्रयासके ही आसानीसे छोड़ देनेके लिये तैयार हुए। श्रीगदाधरकी श्रीगौराङ्गप्रीतिको उनके ही समान मर्मी, अन्तरङ्ग बान्धवके अतिरिक्त और कोई नहीं समझ सकता॥ 134॥ पुरीसे कटक आकर महाप्रभुके द्वारा पण्डितको निकट बुलाना :— एत बलि’ पण्डित-गोसाञि पृथक् चलिला। कटक आसि’ प्रभु ताँरे सङ्गे आनाइला॥ 136॥ अनुवाद— यह कहकर श्रीगदाधर-पण्डित गोसाईं महाप्रभुसे अलग चलने लगे। कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने उन्हें अपने पास आनेके लिये बुलवा भेजा॥ 136॥ श्रीगदाधरकी केवला-श्रीगौरप्रीति ऐश्वर्यसे मुग्ध व्यक्तियोंकी समझसे परे :— पण्डितेर गौराङ्गप्रेम बुझन ना याय। ‘प्रतिज्ञा’, ‘श्रीकृष्णसेवा’ छाड़िल तृणप्राय॥ 137॥ अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितके श्रीगौराङ्गप्रेमको समझा नहीं जा सकता, उन्होंने अपनी क्षेत्र-संन्यासकी ‘प्रतिज्ञा’ और ‘श्रीगोपीनाथसेवा’को तृणकी भाँति त्याग कर दिया था॥ 137॥ महाप्रभुके भीतर सन्तोष होनेपर भी बाहरसे कृत्रिम-कोप-उक्ति :— ताँहार चरित्रे प्रभु अन्तरे सन्तोष। ताँहार हाते धरि’ कहे करि’ प्रणय-रोष॥ 138॥ । 67

[ 16/138-145 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यहाँ तक पण्डितके उद्देश्यकी सिद्धि, इसके बाद पण्डितको पुरीमें जाकर श्रीगोपीनाथकी सेवा करनेके लिये शपथ दिलाना :- “'प्रतिज्ञा' 'सेवा' छाड़िबे,—ए तोमार 'उद्देश'। से सिद्ध हइल—छाड़ि' आइला दूर देश॥ 139॥ भक्तका श्रीकृष्णको सुख-दान और श्रीकृष्णका भक्तको सुख-दान :- आमार सङ्गे रहिते चाह,—वाञ्छ निज-सुख। तोमार दुइ धर्म याय,—आमार हय 'दुःख'॥ 140॥ मोर सुख चाह यदि, नीलाचले चल। आमार शपथ, यदि आर किछु बल॥” 141॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके आचरणसे यद्यपि महाप्रभु हृदयमें बहुत सन्तुष्ट थे, किन्तु बाहरसे उनके हाथोंको पकड़कर उन्होंने प्रणय-रोष प्रकाशित करते हुए कहा,—“तुम्हारा उद्देश्य क्षेत्र-संन्यासकी 'प्रतिज्ञा' और श्रीगोपीनाथकी 'सेवा'का त्याग था, अब तुम्हारा वह उद्देश्य तो पूर्ण हो गया है, क्योंकि तुम नीलाचलसे इतना दूर आ गये हो। तुम मेरे साथ रहना चाहते हो—यह तो तुम्हारे अपने सुखकी कामना है। इसके द्वारा तुम दोनों धर्मोंको नष्ट कर रहे हो, जिसे देखकर मुझे 'दुःख' हो रहा है। यदि तुम मेरी प्रसन्नता चाहते हो तो नीलाचल लौट जाओ। तुम्हें मेरी शपथ है, यदि इसके बाद भी तुमने कुछ बोला॥” 138-141॥ महाप्रभुका नौकापर चढ़ना, पण्डितकी मूर्च्छा :- एत बलि' महाप्रभु नौकाते चड़िला। मूर्च्छित हञा तथा पण्डित पड़िला॥ 142॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु नौकामें चढ़ गये और श्रीगदाधर पण्डित मूर्च्छित होकर वहींपर गिर पड़े॥ 142॥ श्रीगदाधर-पण्डितको ले जानेके लिये महाप्रभुका श्रीसार्वभौमको आदेश :- पण्डिते लञा याइते सार्वभौमे आज्ञा दिला। भट्टाचार्य कहे,—“उठ, ऐछे प्रभुर लीला॥ 143॥ श्रीगदाधर-पण्डितको श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना देना :- तुमि जान, कृष्ण निज-प्रतिज्ञा छाड़िला। भक्त कृपा-वशे भीष्मेर प्रतिज्ञा राखिला॥ 144॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमको श्रीगदाधर पण्डितको जगन्नाथपुरी ले जानेकी आज्ञा दी। श्रीसार्वभौमने श्रीगदाधर पण्डितसे कहा,—“उठो! महाप्रभुकी ऐसी ही अद्भुत लीलाएँ हैं। तुम तो जानते हो कि श्रीकृष्णने अपनी प्रतिज्ञाको भङ्ग करके भक्त भीष्मके प्रति कृपाके कारण उनकी प्रतिज्ञाकी रक्षा की थी॥ 143-144॥ भक्तकी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये भगवान्‌के द्वारा अपनी प्रतिज्ञाको भङ्ग करना :- श्रीमद्भागवत (1/9/37) में— स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृत- मधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः। धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्- गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ 145॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कुरुक्षेत्र युद्धमें मैं अस्त्रधारण नहीं करूँगा'—श्रीकृष्णचन्द्र अपनी इस प्रतिज्ञाको त्याग करके मेरी प्रतिज्ञाको ही अधिक सत्य करनेके अभिप्रायसे रथसे नीचे उतरे और जब चक्रको धारण कर मेरा वध करनेके लिये आ रहे थे, तब उनका उत्तरीय भी गिर पड़ा॥ 145॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके साथ आये युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंको भागवतधर्म और अन्यान्य साधारण धर्मोंका वर्णन करनेके बाद स्वेच्छा मृत्युवाले महाभागवत भीष्मदेव उत्तरायण-कालको उपस्थित हुआ देखकर, अपनी मृत्युको निकट जानकर सामने उपस्थित श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— स्वनिगमम् (अस्त्रधारणं विनेव पाण्डवान् रक्षिष्यामीति निजप्रतिज्ञाम्) अपहाय (परित्यज्य) मत्प्रतिज्ञां (श्रीकृष्णं शस्त्रं ग्राहयिष्यामीति सङ्कल्पम्) ऋतं (सत्यम्) अधि (अधिकं) कर्तुं रथस्थः [श्रीकृष्णः] अवप्लुतः (सहसा अवतीर्णः सन् एव) 68 |

सोलहवाँ अध्याय 16/145-150 ] धृतरथचरणः (धृतं रथचरणं चक्रं येन सः) चलद्गुः (संरम्भेण चलन्ती कम्पमाना गौः धरा यस्मात् सः) गतोत्तरीयः (गतं पथि पतितम् उत्तरीयं तेनैव संरम्भेण यस्य सः) इभं (गजं) हन्तुं (विनाशयितुं) हरिः (सिंहः) इव अभ्ययात् (अग्रतः अधावत्), [सः मे गतिर्भूयात् इति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—'अस्त्र धारण किये बिना मैं पाण्डवोंकी रक्षा करूँगा'—अपनी इस प्रतिज्ञाको त्यागकर मेरा सङ्कल्पको—'मैं श्रीकृष्णसे शस्त्र धारण करवाकर रहूँगा' अधिक सत्य करनेके लिये श्रीकृष्ण रथसे सहसा कूद पड़े और रथके पहियेको चक्रकी भाँति धारण करके प्रबल वेगसे मेरी ओर झपटे, जिस प्रकार हाथीका वध करनेके लिये सिंह प्रबल वेगसे दौड़ पड़ता है। वेगसे दौड़नेके कारण उनके कन्धेसे उत्तरीय वस्त्र गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी [वे मेरी गति हों, अगले श्लोकके इस वाक्यके साथ इस श्लोकका अन्वय करें] ॥145॥ महाप्रभुके द्वारा पण्डितकी प्रतिज्ञाकी रक्षा :— एइमत प्रभु तोमार विच्छेद सहिया। तोमार प्रतिज्ञा रक्षा कैल यत्न करिया॥146॥ अनुवाद—इसी प्रकार स्वयं तुम्हारे वियोगको सहन करते हुए महाप्रभुने बड़े यत्नसे तुम्हारी प्रतिज्ञाकी रक्षा की है॥146॥ श्रीपण्डितको लेकर श्रीभट्टाचार्यका पुरीमें आगमन :— एइमत कहि' ताँरे प्रबोध करिला। दुइजने शोकाकुल नीलाचल आइला॥147॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने इस प्रकार कहकर श्रीगदाधर पण्डितको ढाढ़स बँधाया और दोनों ही बड़े शोकमें डूबकर नीलाचल लौट आये॥147॥ श्रीकृष्णके उद्देश्यसे भक्तके द्वारा अनायास ही स्वधर्म-त्याग, श्रीकृष्णका इसी कारण ऋण :— प्रभु लागि' धर्म-कर्म छाड़े भक्तगण। भक्त-धर्म-हानि प्रभुर ना याय सहन॥148॥ अनुवाद—भक्त भगवान्के लिये सब प्रकारके धर्म-कर्मको छोड़नेके लिये तत्पर रहते हैं, परन्तु भगवान्से भक्तोंके धर्मकी हानि सहन नहीं होती॥148॥ भगवान्के विरहमें भक्तकी कातरता स्वाभाविक ही है, किन्तु भक्तके विरहमें भगवान्की कातरता ही 'प्रेम-विवर्त्त' है; उसके श्रवणसे जीवको श्रीचैतन्यकी प्राप्ति :— 'प्रेमेर विवर्त्त' इहा शुने येइ जन। अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण॥149॥ अनुवाद—इस 'प्रेमके विवर्त्त'को जो व्यक्ति श्रवण करता है, उसे अति शीघ्र श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त होता है॥149॥ महाप्रभुका याजपुरमें दोनों महापात्रोंको विदा करना :— दुइ राजपात्र येइ प्रभुसङ्गे याय। 'याजपुर' आसि' प्रभु तारे दिलेन विदाय॥150॥ अनुवाद—जो दो राजपात्र महाप्रभुके साथ जा रहे थे, याजपुर पहुँचनेपर महाप्रभुने उन दोनोंको विदायी दी॥150॥ अनुभाष्य—'याजपुर'—कटक जिलेका एक उपखण्ड है। यह वैतरणी नदीके दक्षिण तटपर अवस्थित है। बायें तटपर ऋषियोंके द्वारा यज्ञ-कार्य करनेसे इस स्थानका नाम 'याजपुर' हुआ है। किसीके मतानुसार 'ययाति नगर'से 'याजपुर' नाम हुआ है। महाभारतके वनपर्वमें 114 अः— "एते कलिङ्गाः कौन्तेय यत्र वैतरणी नदी। यत्राऽयजत धर्मोऽपि देवान् शरणमेत्य वै॥4॥ अत्र वै ऋषयोऽन्ये च पुरा क्रतुभिरीजिरे॥"6ख॥ [अर्थात् लोमश ऋषिने कहा,—"हे कुन्तीपुत्र! यह कलिङ्ग देश है, जिसमें वैतरणी नदी बहती है। जहाँ धर्मने भी देवताओंकी शरणमें जाकर यज्ञ किया था। प्राचीनकालमें ऋषियों तथा अन्य लोगोंने भी यहाँ बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।"] यहाँ असंख्य देवमूर्तियाँ हैं; उनमेंसे श्रीवराहदेवकी । 69

[ 16/150-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मूर्ति ही विशेष पूज्य है। शक्तिके उपासकगण 'वाराही' 'वैष्णवी' और 'इन्द्राणी' आदि देवियोंकी पूजा करते हैं। यहाँ शिवकी भी अनेक मूर्तियाँ और दशाश्वमेध-घाट भी है। इस स्थानको 'नाभिगया', 'विरजा-क्षेत्र' आदि भी कहा गया है ॥ 150 ॥ सङ्गी श्रीरायके साथ महाप्रभुका सर्वदा श्रीकृष्ण कथा-आलाप :- प्रभु विदाय दिल, राय याय ताँर सने। कृष्णकथा रामानन्द-सने रात्रि-दिने ॥ 151 ॥ अनुवाद - महाप्रभुके द्वारा उन दोनों राजपात्रोंको विदायी देनेपर श्रीरामानन्दराय महाप्रभुके साथ चलने लगे। महाप्रभु श्रीरामानन्दके साथ रात-दिन कृष्णकथामें ही डूबे रहते ॥ 151 ॥ राजाके आदेशसे प्रत्येक ग्राममें राज-कर्मचारियोंके द्वारा महाप्रभुकी अगवानी :- प्रतिग्रामे राज-आज्ञाय राजभृत्यगण। नव्य-गृहे नाना-द्रव्ये करये सेवन ॥ 152 ॥ अनुवाद - प्रत्येक ग्राममें राजा प्रतापरुद्रकी आज्ञासे राजकर्मचारियोंने नये घर बनाये और उनमें अनेक प्रकारकी खानेकी वस्तुएँ एकत्रित करके रखीं। इन सबके द्वारा वे महाप्रभुकी सेवा करते ॥ 152 ॥ रेमुणामें (?) श्रीरायको विदायी देना :- एइमत चलि' प्रभु 'रेमुणा' आइला। तथा हैते रामानन्द-राये विदाय दिला ॥ 153 ॥ अनुवाद - इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु 'रेमुणा' आ पहुँचे और वहाँसे उन्होंने श्रीरायरामानन्दको भी विदायी प्रदान की ॥ 153 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - इस प्रकार महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके साथ आते-आते बालेश्वरके निकट रेमुणामें पहुँचनेसे पहले ही भद्रकसे श्रीरामानन्द-रायको विदायी दी; - ऐसा वर्णन अनेक स्थानोंपर है ॥ 153 ॥ अनुभाष्य - 'तथा हैते' - वहाँसे; पाठान्तरमें, 'भद्रक हइते' - भद्रकसे। 'तथा हैते' के द्वारा 'रेमुणासे' समझने पर, मध्यलीला 1/149 संख्यामें लिखित "रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त" अर्थात् 'श्रीरामानन्द राय भद्रक तक आये' पाठके साथ मेल नहीं होता। किसीके मतानुसार, - 'रेमुणा' उस समय भद्रक-प्रदेशके अन्तर्गत था; किन्तु इस विषयमें प्रमाणका अभाव है। किसीके मतानुसार, - पूर्वोक्त 'भद्रक'के स्थानपर 'रेमुणा' पाठ ही सङ्गत है; किन्तु भद्रकसे श्रीरायका लौटकर जाना ही अधिकतर सङ्गत लगता है। 'भद्रक' - बालेश्वरसे चार योजन (40 मील) दक्षिणमें अवस्थित है और 'रेमुणा' - प्राय आधा योजन (5 मील) पश्चिममें अवस्थित है॥ 153 ॥ श्रीरायकी मूर्च्छा, महाप्रभुका क्रन्दन :- भूमेते पड़िला राय नाहिक चेतन। राये कोले करि' प्रभु करये क्रन्दन ॥ 154 ॥ अनुवाद - तभी श्रीरामानन्दराय भूमिपर गिर पड़े और अचेतन हो गये। महाप्रभु उनको अपनी गोदीमें लेकर क्रन्दन करने लगे ॥ 154 ॥ श्रीरायका महाप्रभुसे विच्छेद अवर्णनीय :- रायेर विदाय-भाव ना याय सहन। कहिते ना पारि एइ ताहार वर्णन ॥ 155 ॥ अनुवाद - श्रीरामानन्द रायका महाप्रभुसे विरहका वर्णन करना बहुत कठिन है, यह असहनीय है, इसलिये मैं उसका और वर्णन नहीं कर सकता ॥ 155 ॥ उड़ीसाकी सीमापर आगमन; राज-कर्मचारियोंके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- तबे 'ओढ़ तथा राज-अधिकारी प्रभुरे मिलिला ॥ 156 ॥ दिन दुइ-चारि तँहो करिल सेवन। आगे चलिवारे सेइ कहे विवरण ॥ 157 ॥ 70 |

सोलहवाँ अध्याय 16/156-167 ] महाप्रभुको राजकर्मचारीके द्वारा हिन्दु और मुस्लिम राज्योंकी सीमाका निर्देश और पथका विवरण देना :- “मद्यप यवन-राजार आगे अधिकार। ताँर भये पथे केह नारे चलिवार ॥ 158 ॥ पिछल्दा पर्यन्त सब ताँर अधिकार। ताँर भये नदी केह हैते नारे पार ॥ 159 ॥ मुस्लिम शासकके साथ सन्धिके बाद महाप्रभुके जानेके विषयमें सहायता अङ्गीकार :- दिन कत रह-सन्धि करि' ताँर सने। तबे सुखे नौकाते कराइब गमने ॥” 160 ॥ अनुवाद-तब चलते हुए महाप्रभु उड़ीसा राज्यकी सीमापर आ पहुँचे। वहाँपर एक राज-अधिकारी आकर महाप्रभुसे मिला। दो-चार दिनों तक उसने महाप्रभुकी सेवा की और आगे चलनेके मार्गका विवरण दिया,-“आगे मद्यपान करके मत्त रहनेवाले यवन राजाका अधिकार है। उसके भयसे उस मार्गपर कोई नहीं जाता है। पिछल्दा नामक स्थान तक उसका अधिकार है। उसके भयसे कोई नदीको भी पार नहीं करता। कुछ दिन तक आप यहींपर रुक जाइये, मैं उस यवन राजाके साथ मित्रता करके सुखपूर्वक आपको नौकामें चढ़ाकर भेज दूँगा ॥” 156-160 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पिछल्दा'-तमलुकेर निकटवर्ती रूप-नारायण नदीके तटपर पिछल्दा-नामक ग्राम है॥ 158 ॥ अनुभाष्य- 'ओढ़ —सुवर्णरेखा नदी ही बङ्गाल और उड़ीसाकी सीमा है। सुवर्णरेखा नदी श्रीपाट गोपीवल्लभपुरके पाससे होकर उड़ीसामें प्रवाहित होती है॥ 156 ॥ मुस्लिम शासकके एक गुप्तचरके द्वारा अपने स्वामीको महाप्रभु और उनके साथियोंकी क्रिया और महिमाका वर्णन :- सेइ काले से यवनेर एक अनुचर। ‘उड़िया-कटके’ आइल करि' वेशान्तर ॥ 161 ॥ अनुवाद-उस समय उस यवन राजाका एक अनुचर गुप्तरूपसे उड़ीसा-छावनीमें वेश-परिवर्तन करके आया ॥ 161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'उड़िया-कटक'-उड़ीसा-देशीय राजाकी राज्य-सीमापर जो 'सैन्यकटक' अर्थात् छावनी थी, उसीको 'उड़िया-कटक' कहा गया है ॥ 161 ॥ अनुभाष्य- 'करि' वेशान्तर'-स्वयं 'यवन' होकर यवनोंके वेशके बदले हिन्दुके वेशको धारण करके॥ 161 ॥ प्रभुर सेइ अद्भुत चरित्र देखिया। हिन्दु-चर कहे, सेइ यवन-पाश गिया ॥ 162 ॥ “एक संन्यासी आइल जगन्नाथ हैते। अनेक सिद्ध-पुरुष हय ताँहार सहिते ॥ 163 ॥ अनुवाद-हिन्दु वेशमें उस यवन गुप्तचरने महाप्रभुके अद्भुत चरित्रको देखा। फिर उसने यवन राजाके पास जाकर कहा,-“एक संन्यासी जगन्नाथपुरीसे आये हैं और उनके साथ बहुतसे सिद्ध पुरुष भी हैं॥ 162-163 ॥ अनुभाष्य- 'चर'-विपक्षका हो अथवा अपनी प्रजासे ही हो, गुप्त रूपसे अन्दरकी सब बातोंको जानकर अपने परिचयको छिपाकर अन्य परिचय देकर जो व्यक्ति अपने स्वामी अथवा भेजनेवालेको यथावत् संवाद देता है ॥ 162 ॥ निरन्तर करे सबे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। सबे हासे, नाचे, गाय, करये क्रन्दन ॥ 164 ॥ लक्ष लक्ष लोक आइसे ताहा देखिबारे। ताँरे देखि' पुनरपि याइते नारे घरे ॥ 165 ॥ सेइ सब लोक हय बाउलेर प्राय। ‘कृष्ण’ कहि' नाचे, कान्दे, गड़ागड़ि याय ॥ 166 ॥ कहिबार कथा नहे,–देखिले से जानि। ताँहार प्रभावे ताँरे 'ईश्वर' करि' मानि ॥” 167 ॥ अनुवाद-वे सभी निरन्तर कृष्णनामका सङ्कीर्तन । 71

[ 16/164-175 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हैं। सभी हँसते हैं, नाचते हैं, गाते हैं और रोते हैं। लाखों-लाखों लोग उन्हें देखनेके लिये आते हैं और एक बार उन संन्यासीको देखनेपर पुनः अपने घरको लौट नहीं पाते। वे सब भी पागल जैसे हो जाते हैं तथा 'कृष्ण' कहकर नाचते हैं, रोते हैं और भूमिपर लोट-पोट खाते हैं। यह सब कहनेकी बात नहीं है, देखनेपर ही इसका अनुभव किया जा सकता है। उन संन्यासीके प्रभावके कारण मैं उन्हें 'ईश्वर' ही मानता हूँ॥" 164-167 ॥ उस गुप्तचरका प्रेमावेश :- एत कहि' सेइ चर 'हरि' 'कृष्ण' गाय। हासे, कान्दे, नाचे, गाय बाउलेर प्राय ॥ 168 ॥ अनुवाद-इतना कहकर वह गुप्तचर 'हरि' 'कृष्ण' कहकर गान करने लगा और वह भी पागलकी भाँति हँसने, रोने, नाचने तथा गाने लगा ॥ 168 ॥ गुप्तचरके मुखसे महाप्रभुकी बात सुनकर मुस्लिम शासकका महाप्रभुके पास दूत-भेजना :- एत शुनि' यवनेर मन फिरि' गेल। आपन-'विश्वास' उड़िया-स्थाने पाठाइल ॥ 169 ॥ अनुवाद-गुप्तचरके मुखसे ये सब बातें सुनकर यवन राजाका मन बदल गया। उसने अपने एक अति विश्वसनीय व्यक्तिको उड़िया-छावनीमें उड़ीसाके राज अधिकारीके पास भेजा ॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'विश्वास' - गौड़देशीय यवन राजाका 'विश्वासखाना' नामक एक 'कार्यालय' था; उसमें अत्यन्त विश्वसनीय कायस्थोंको ही कार्यपर रखा जाता था। राजाको जब जहाँ प्रधान कार्य पड़ता, वहीं ये कायस्थ 'विश्वास' गण ही भेजे जाते थे ॥ 169 ॥ दूतके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना और प्रेमावेश :- 'विश्वास' आसिया प्रभु-चरण वन्दिल। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' प्रेमे विह्वल हइल ॥ 170 ॥ अनुवाद-यवन राजाका वह अति विश्वासपात्र व्यक्ति महाप्रभुके पास आया। जब उसने आकर महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया और 'कृष्ण-कृष्ण' उच्चारण किया, तो वह भी प्रेममें विह्वल हो गया ॥ 170 ॥ राज-कर्मचारीके निकट उसका कातरभावसे निवेदन और सन्धिकी प्रार्थना :- धैर्य हञा उड़ियाके कहे नमस्करि'। "तोमा-स्थाने पाठाइला म्लेच्छ अधिकारी ॥ 171 ॥ तुमि यदि आज्ञा देह' एथाके आसिया। यवन अधिकारी याय प्रभुके मिलिया ॥ 172 ॥ बहुत उत्कण्ठा ताँर, करयाछे विनय। तोमा-सने एइ सन्धि, नाहि युद्ध-भय ॥" 173 ॥ अनुवाद-कुछ देरके बाद धैर्य धारण करके उसने उड़ीसाके राज-कर्मचारीको नमस्कार किया और कहा,-"यवन राजाने मुझे आपके पास भेजा है। यदि आप आज्ञा दें, तो यवन राजा महाप्रभुसे मिलकर चले जाँय। उनको महाप्रभुसे मिलनेकी बहुत उत्कण्ठा है, उन्होंने विनती करनेके लिये ही मुझे यहाँ भेजा है। उनका प्रस्ताव सन्धिके लिये है, युद्धका कोई भय नहीं कीजिये ॥" 171-173 ॥ महाप्रभुके द्वारा मुस्लिम-शासकके चित्त-परिवर्तनसे राजकर्मचारीको विस्मय :- शुनि' महापात्र कहे हञा विस्मय। “मद्यप यवनेर चित्त ऐछे के करय ! ॥ 174 ॥ आपने महाप्रभु ताँर मन फिराइल। दर्शन-स्मरणे याँर जगत् तारिल ॥" 175 ॥ अनुवाद-उसके प्रस्तावको सुनकर राजकर्मचारीने अत्यन्त विस्मित होकर कहा,-"मद्यपानमें मत्त रहनेवाले यवनका चित्त ऐसा किसने बना दिया ! स्वयं महाप्रभुने ही उसके मनको परिवर्तित कर दिया है। जिनके दर्शन 72 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/174-185 ] अथवा स्मरणसे ही सम्पूर्ण जगत्का उद्धार हो जाता है॥"174-175॥ मुस्लिम शासकको महाप्रभुके दर्शनकी सम्मति देना :- एत बलि' विश्वासेरे कहिल वचन। “भाग्य ताँर-आसि' करुक प्रभु दरशन॥176॥ प्रतीत करिये-यदि निरस्त्र हञा। आसे तँहो पाँच-सात भृत्य सङ्गे लञा॥"177॥ अनुवाद-ऐसा अपने मनमें विचार करके राजकर्मचारीने यवनके विश्वासपात्रसे कहा,-"यह उनका सौभाग्य होगा, वे आकर महाप्रभुके दर्शन कर सकते हैं। किन्तु एक बात आप समझ लीजिये कि वे बिना किसी अस्त्र-शस्त्रके आयें। वे साथमें पाँच-सात सेवकोंको अवश्य लेकर आ सकते हैं॥"176-177॥ दूतके द्वारा यह आनन्द संवाद देना, मुस्लिम लोगोंका छद्म हिन्दु वेशमें महाप्रभुके दर्शनके लिये आना :- 'विश्वास' याञा ताँहारे सकल कहिल। हिन्दुवेश धरि' सेइ यवन आइल॥178॥ दूर हैते प्रभु देखि' भूमेते पड़िया। दण्डवत् करे अश्रु-पुलकित हञा॥179॥ अनुवाद-उस विश्वसनीय व्यक्तिने जाकर यवन राजाको सब कुछ बतलाया। वह यवन राजा हिन्दुओंका वेश धारण करके आया। महाप्रभुको दूरसे ही देखकर उसने भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया। उसके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे तथा उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा॥178-179॥ महाप्रभुके निकट आकर मुस्लिमका श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- महापात्र आनिल ताँरे करिया सम्मान। जोड़हाते प्रभु-आगे लय कृष्णनाम॥180॥ अनुवाद-महापात्र उसे सम्मानपूर्वक महाप्रभुके निकट ले आये। वह यवन हाथ जोड़कर महाप्रभुके सामने खड़े होकर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने लगा॥180॥ अपने मुस्लिम जन्मको धिक्कार और निर्वेदपूर्ण उक्ति :- “अधम यवनकुले केने जन्माइले। विधि मोरे हिन्दुकुले केने ना जन्माइले॥181॥ महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिके बिना मृत्युकी इच्छा :- 'हिन्दु' हैले पाइताम तोमार चरण-सन्निधान। व्यर्थ मोर एइ देह, याउक पराण॥"182॥ अनुवाद-उस यवनने महाप्रभुसे कहा,-"मेरा जन्म अधम यवनकुलमें क्यों हुआ? विधाताने मुझे हिन्दुकुलमें क्यों नहीं जन्म दिया? हिन्दुकुलमें जन्म लेनेपर मुझे आपके चरणकमलोंका सान्निध्य प्राप्त होता। मेरी यह देह व्यर्थ ही है, इसलिये मेरे प्राणोंका अभी निकल जाना ही अच्छा है॥"181-182॥ उसकी खेदपूर्ण उक्तिको सुनकर राजकर्मचारीके द्वारा भी महाप्रभुकी स्तुति :- एत शुनि' महापात्र आविष्ट हञा। प्रभुके करेन स्तुति चरणे धरिया॥183॥ भगवन्नाम-श्रवणके फलस्वरूप अन्त्यजको भी पवित्रता-लाभ :- “चण्डाल-पवित्र, याँर श्रीनाम-श्रवणे। हेन-तोमार एइ जीव पाइल दरशने॥184॥ भगवद्दर्शनके फलस्वरूप मुस्लिमका उद्धार अधिक विस्मयका कारण नहीं :- इँहार ये एइ गति, इथे कि विस्मय? तोमार दर्शन-प्रभाव एइमत हय॥"185॥ अनुवाद-यवन राजाकी बातको सुनकर महापात्र भी आविष्ट होकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगा,-"चण्डाल भी आपके श्रीनामका श्रवण करके पवित्र हो जाता है। और इस जीवको तो आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं। इसलिये इस यवनकी जो यह गति हुई है, इसमें कैसा विस्मय है? आपके दर्शनका प्रभाव ही ऐसा है॥"183-185॥ । 73

[ 16/186–192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भगवन्नामके श्रवण, कीर्तन अथवा स्मरणसे ही अन्त्यजकी म्लेच्छ शासककी पापोंसे मुक्ति शुद्धि, साक्षात् दर्शनकी तो बात ही नहीं :— और महाप्रभुकी सेवाकी याचना :— श्रीमद्भागवत (3/33/6)में— सेइ कहे,—“मोरे यदि कैला अङ्गीकार। यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनाद्- एक आज्ञा देह,—सेवा करि ये तोमार॥ 188 ॥ यत्प्रह्वणाद् यत्स्मरणादपि क्वचित्। गो-ब्राह्मण-वैष्णवे हिंसा कर्याछि अपार। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते सेइ पाप हइते मोर हउक निस्तार॥” 189 ॥ कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ 186 ॥ अनुवाद—उस यवन राजाने महाप्रभुसे कहा,—“जब अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ आपने मुझे अपना लिया है, तो आप मुझे कुछ आज्ञा अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, जिनके नाम श्रवण, दीजिये जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूँ। मैंने जो अनुकीर्तन, प्रणाम और स्मरण करने मात्रसे चण्डाल गायोंका वध और ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंसे द्वेष किया है, और यवन कुलमें जन्मा व्यक्ति भी तत्क्षणात् सवन-यज्ञ उस पापसे मेरा उद्धार हो॥” 188-189 ॥ (सोमयज्ञ) करनेके योग्य हो जाता है, ऐसे वे प्रभु आप हैं, आपके दर्शनसे क्या नहीं हो सकता ? ॥ 186 ॥ लौकिक-लीलाके अभिनयकारी महाप्रभुके लिये श्रीमुकुन्दके द्वारा यात्राके पथमें सहायताकी प्रार्थना :— अनुभाष्य—श्रीकपिलदेवके मुखसे शुद्धभक्तियोगके तबे मुकुन्द दत्त कहे,—“शुन, महाशय। श्रवणसे माता देवहूतिके मोहके आवरणके दूर होनेपर गङ्गातीर याइते महाप्रभुर मन हय॥ 190 ॥ वे शुद्ध सांख्यज्ञानके प्रवर्तक भगवान् श्रीकपिलदेवका ताँहा याइते कर तुमि सहाय-प्रकार। स्तव कर रही हैं— एइ बड़ आज्ञा, एइ बड़ उपकार॥” 191 ॥ हे भगवन्, क्वचित् यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनात् (यस्य भगवतः अनुवाद—तब श्रीमुकुन्द दत्तने उस यवन राजासे तव नाम्नः आदौ श्रवणम्, अनु तदनन्तरं कीर्त्तनञ्च तस्मात्), कहा,—“हे महाशय, सुनो ! महाप्रभु गङ्गाके तटपर जाना यत्प्रह्वणात् (यस्य तव शिरसा नमस्कारात्), यत्स्मरणात् चाहते हैं। वहाँ जानेके लिये आप जिस प्रकारसे भी (यस्य तव भगवतः स्मरणेन) च श्वादः (सर्वाधमश्वपच- सहायता कर सकते हो, वैसा करो। यही आपके लिये कुलोद्भूतः) अपि सद्यः (तत्क्षणात्) सवनाय (सोमयागाय) बड़ी आज्ञा है तथा यही आपका सबसे बड़ा उपकार कल्पते (योग्यो भवति), ते (तव) दर्शनात् पुनः कुतः नु होगा॥” 190-191 ॥ (किं वक्तव्यं, कृतार्थास्मीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ म्लेच्छ-शासकका इसे स्वीकार करना और दैन्यपूर्वक सभीको प्रणाम करनेके बाद विदायी-ग्रहण :— मुस्लिम राजाको कृपापूर्वक श्रीकृष्णनाम तबे सेइ महाप्रभुर चरण वन्दिया। ग्रहण करनेका आदेश :— सबार चरण वन्दि' चले हृष्ट हञा॥ 192 ॥ तबे महाप्रभु ताँरे कृपा-दृष्टि करि'। आश्वासिया कहे,—“तुमि कह 'कृष्ण' 'हरि'॥” 187 ॥ अनुवाद—तब उस यवन-शासकने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की। फिर उसने सभी भक्तोंके अनुवाद—तब महाप्रभुने उस यवन-राजाके प्रति चरणोंकी वन्दना की और प्रसन्नचित्तसे चल पड़ा॥ 192 ॥ कृपा दृष्टि करके उसे आश्वासन देते हुए कहा,—“तुम 'कृष्ण' 'हरि' नामका कीर्तन करो॥” 187 ॥ अनुभाष्य—'सेइ'—म्लेच्छ शासक॥ 192 ॥ अनुभाष्य—'ताँरे'—उस म्लेच्छ शासकको॥ 187 ॥ 74

सोलहवाँ अध्याय 16/193–200 ] राजकर्मचारीके साथ उसका मिलन और बन्धुत्व :- महापात्र ताँर सने कैल कोलाकुलि। अनेक सामग्री दिया करिल मितालि ॥ 193 ॥ अनुवाद—महापात्रने उस यवन राजाको जानेसे पहले गले लगाया तथा बहुत सी सामग्री देकर उससे मित्रता बनायी ॥ 193 ॥ अनुभाष्य—'मितालि'—उपहारके रूपमें वस्तुएँ प्रदान करके मित्रता बनाना ॥ 193 ॥ म्लेच्छके द्वारा प्रातःकालमें महाप्रभुकी यात्रामें सहायता करना, महाप्रभुका सम्मानपूर्वक आह्वान :- प्रातःकाले सेइ बहु नौका साजाञा। प्रभुके आनिते दिल विश्वास पाठाञा ॥ 194 ॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकाल उस यवन-शासकने बहुत-सी नौकाओंको सजाकर महाप्रभुको नदीके उस पार लानेके लिये अपने सचिव (विश्वासपात्र) को भेज दिया ॥ 194 ॥ राजकर्मचारीके साथ महाप्रभुका जाना और म्लेच्छके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना :- महापात्र चलि' आइला महाप्रभुर सने। म्लेच्छ आसिं' कैल प्रभुर चरण-वन्दने ॥ 195 ॥ अनुवाद—महापात्र भी महाप्रभुके साथ नौकामें आया। जब वे नदी पार करके दूसरे तटपर पहुँचे, तब यवन-शासकने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 195 ॥ सभी सुविधाओंसे युक्त एक नयी नौका देना :- एक नवीन नौका, तार मध्ये घर। स्वगणे चढ़ाइला प्रभु ताहार उपर ॥ 196 ॥ अनुवाद—उन नौकाओंमें एक नयी नौका थी, जिसके बीचमें एक कमरा था। उस नौकापर महाप्रभु और उनके भक्तोंको चढ़ाया ॥ 196 ॥ महाप्रभुके द्वारा राजकर्मचारीको नदीके तटपर विदायी देना और उसका क्रन्दन :- महापात्रे महाप्रभु करिला विदाय। कान्दिते कान्दिते सेइ तीरे रहि' याय ॥ 197 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब महापात्रको विदा किया, तब वह रोते-रोते उसी तटपर खड़े-खड़े महाप्रभुकी नौकाको जाते हुए देखता रहा ॥ 197 ॥ महाप्रभु-भक्त वह यवन-शासक महाप्रभुकी रक्षाके लिये 'मन्त्रेश्वर' नदीको पार करके 'पिछल्दा' तक गया :- जलदस्युभये सेइ यवन चलिल। दश नौका भरि' सेइ सैन्य सङ्गे निल ॥ 198 ॥ 'मन्त्रेश्वर'-दुष्टनदे पार कराइल। 'पिछल्दा' पर्यन्त सेइ यवन आइल ॥ 199 ॥ अनुवाद—जलमार्गके डाकुओंके भयसे वह यवन-शासक भी महाप्रभुके साथ दस नौकाओंमें अपने सैनिकोंको साथ लेकर चला। महाप्रभुकी नौकाको 'मन्त्रेश्वर' नामक भयानक नदको (अर्थात् बहुत बड़ी नदीको) पार कराकर वह पिछल्दा तक महाप्रभुके साथ आया ॥ 198-199 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'मन्त्रेश्वर'—डायमण्ड हारबारके अति निकट एक बहुत बड़े नदका नाम ही 'मन्त्रेश्वर' है; उस नदसे नौका रूपनारायण-नदके तटपर स्थित 'पिछल्दा' ग्राममें पहुँची। पिछल्दा ग्रामकी एक सीमा मन्त्रेश्वरके साथ संलग्न है ॥ 199 ॥ अनुभाष्य— 'दुष्टनद'—जल-डाकुओंसे भरा दुर्गम जलपथ; नदके अत्यधिक विशाल तथा वेगके अति तीव्र होनेके कारण वह दुर्गम है ॥ 199 ॥ पिछल्दामें उसे विदा करना, उसकी अद्भुत आर्त्ति :- ताँरे विदाय दिल प्रभु सेइ ग्राम हैते। से-काले ताँर प्रेम-चेष्टा ना पारि वर्णिते ॥ 200 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस यवन-शासकको उस ग्रामसे । 75

[ 16/200-207 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

विदायी दी। उस समय उसकी जैसी प्रेममें दशा थी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 200 ॥ श्रीचैतन्यलीलाको श्रवण करनेवालेका ही जन्म सार्थक :- अलौकिक लीला करे श्रीकृष्णचैतन्य। येइ इहा सुने ताँर जन्म, देह—धन्य ॥ 201 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जो इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसीका ही जन्म और देह धारण करना धन्य है ॥ 201 ॥ महाप्रभुका उसी नौकासे पाणिहाटीमें राघव-भवनमें आगमन, माझीपर कृपा :- सेइ नौका चड़ि' प्रभु आइला 'पाणिहाटि'। नाविकेरे पराइल प्रभु निज-कृपा-साटी ॥ 202 ॥ **अनुवाद—**उसी नौकापर चढ़कर महाप्रभु 'पाणिहाटि' तक आये। नाविकको महाप्रभुने अपना वस्त्र कृपाके रूपमें प्रदान किया ॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाणिहाटी'—गङ्गाके तटपर श्रीपाट खड़दहसे थोड़ी ही दूरीपर 'पाणिहाटी' ग्राम है ॥ 202 ॥ महाप्रभुके आगमनसे लोगोंकी भीड़ :- 'प्रभु आइला' बलि' लोके हैल कोलाहल। मनुष्य भरिल सब, किवा जल, स्थल ॥ 203 ॥ अनुवाद—'महाप्रभु आये हैं'—ऐसा सुनकर लोगोंमें कोलाहल मच गया। क्या जल, क्या स्थल—सभी स्थान लोगोंसे भर गये ॥ 203 ॥ भीड़के कारण बहुत कठिनाईसे श्रीराघवके द्वारा महाप्रभुको अपने घरमें लाना :- राघव-पण्डित आसि' प्रभु लञा गेला। पथे याइते लोकभिड़े कष्टे-सृष्ट्ये आइला ॥ 204 ॥ अनुवाद— श्रीराघव-पण्डित आकर महाप्रभुको अपने घर ले गये। मार्गमें जाते समय लोगोंकी भीड़के कारण उन्हें महाप्रभुको लानेमें बहुत कठिनाई हुई ॥ 204 ॥


राघव-भवनमें एक दिन रहकर कुमारहट्टमें श्रीवासके घरमें आगमन :- एकदिन प्रभु तथा करिया निवास। प्राते कुमारहट्टे आइला,—याँहा श्रीनिवास ॥ 205 ॥ **अनुवाद—**महाप्रभु केवल एक दिन श्रीराघव-पण्डितके घरमें रहे। अगले दिन प्रातःकाल वे कुमारहट्ट आ गये, जहाँ श्रीवास पण्डित रहते थे ॥ 205 ॥ उसके बाद उसके निकट ही पहले श्रीशिवानन्दके घरमें, बादमें श्रीवासुदेवके घरमें आगमन :- ताँहा हैते आगे गेला शिवानन्द-घर। वासुदेव-गृहे पाछे आइला ईश्वर ॥ 206 ॥ **अनुवाद—**श्रीवास पण्डितके घरसे महाप्रभु श्रीशिवानन्द सेनके घरपर गये तथा बादमें वे श्रीवासुदेव-दत्तके घरपर आये ॥ 206 ॥ उसके बाद विद्यानगरमें श्रीविद्यावाचस्पतिके घर आना, बहुत भीड़ देखकर गुप्त रूपसे कुलियामें आगमन :- 'वाचस्पति-गृहे' प्रभु येमते रहिला। लोक-भिड़ भये यैछे 'कुलिया' आइला ॥ 207 ॥ **अनुवाद—**उसके बाद वे विद्या-वाचस्पतिके घरपर कुछ समय रहे, परन्तु वहाँ लोगोंकी भीड़ लग गयी। उससे बचनेके लिये वे कुलियामें आये ॥ 207 ॥ **अनुभाष्य—**वाचस्पतिके घरमें महाप्रभु पाँच दिन तक रहे,—मध्यलीला 1/151 संख्या देखें। *'वाचस्पति-गृह'—*कोलद्वीपके निकट जहुद्वीपके अन्तर्गत 'विद्यानगर'में है; उस स्थानपर देवानन्द पण्डितका वास था—चैःभाः मध्यखण्ड, इक्कीसवाँ अध्याय और अन्त्यलीला तीसरा अध्याय देखें। *'कुलिया'—*श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके नवम अङ्कमें (रायके द्वारा प्रेरित एवं नवद्वीपसे कटक लौटे व्यक्तियोंकी राजाके प्रति उक्ति)— “ततः कुमारहट्टे श्रीवासपण्डित-वाट्यामभ्याययौ। ×× ततोऽद्वैतवाटीमभ्येत्य हरिदासेनाभिवन्दितस्तथैव तरणीवर्त्मना नवद्वीपस्य

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