श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1520, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/186–192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भगवन्नामके श्रवण, कीर्तन अथवा स्मरणसे ही अन्त्यजकी म्लेच्छ शासककी पापोंसे मुक्ति शुद्धि, साक्षात् दर्शनकी तो बात ही नहीं :— और महाप्रभुकी सेवाकी याचना :— श्रीमद्भागवत (3/33/6)में— सेइ कहे,—“मोरे यदि कैला अङ्गीकार। यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनाद्- एक आज्ञा देह,—सेवा करि ये तोमार॥ 188 ॥ यत्प्रह्वणाद् यत्स्मरणादपि क्वचित्। गो-ब्राह्मण-वैष्णवे हिंसा कर्याछि अपार। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते सेइ पाप हइते मोर हउक निस्तार॥” 189 ॥ कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ 186 ॥ अनुवाद—उस यवन राजाने महाप्रभुसे कहा,—“जब अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ आपने मुझे अपना लिया है, तो आप मुझे कुछ आज्ञा अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, जिनके नाम श्रवण, दीजिये जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूँ। मैंने जो अनुकीर्तन, प्रणाम और स्मरण करने मात्रसे चण्डाल गायोंका वध और ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंसे द्वेष किया है, और यवन कुलमें जन्मा व्यक्ति भी तत्क्षणात् सवन-यज्ञ उस पापसे मेरा उद्धार हो॥” 188-189 ॥ (सोमयज्ञ) करनेके योग्य हो जाता है, ऐसे वे प्रभु आप हैं, आपके दर्शनसे क्या नहीं हो सकता ? ॥ 186 ॥ लौकिक-लीलाके अभिनयकारी महाप्रभुके लिये श्रीमुकुन्दके द्वारा यात्राके पथमें सहायताकी प्रार्थना :— अनुभाष्य—श्रीकपिलदेवके मुखसे शुद्धभक्तियोगके तबे मुकुन्द दत्त कहे,—“शुन, महाशय। श्रवणसे माता देवहूतिके मोहके आवरणके दूर होनेपर गङ्गातीर याइते महाप्रभुर मन हय॥ 190 ॥ वे शुद्ध सांख्यज्ञानके प्रवर्तक भगवान् श्रीकपिलदेवका ताँहा याइते कर तुमि सहाय-प्रकार। स्तव कर रही हैं— एइ बड़ आज्ञा, एइ बड़ उपकार॥” 191 ॥ हे भगवन्, क्वचित् यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनात् (यस्य भगवतः अनुवाद—तब श्रीमुकुन्द दत्तने उस यवन राजासे तव नाम्नः आदौ श्रवणम्, अनु तदनन्तरं कीर्त्तनञ्च तस्मात्), कहा,—“हे महाशय, सुनो ! महाप्रभु गङ्गाके तटपर जाना यत्प्रह्वणात् (यस्य तव शिरसा नमस्कारात्), यत्स्मरणात् चाहते हैं। वहाँ जानेके लिये आप जिस प्रकारसे भी (यस्य तव भगवतः स्मरणेन) च श्वादः (सर्वाधमश्वपच- सहायता कर सकते हो, वैसा करो। यही आपके लिये कुलोद्भूतः) अपि सद्यः (तत्क्षणात्) सवनाय (सोमयागाय) बड़ी आज्ञा है तथा यही आपका सबसे बड़ा उपकार कल्पते (योग्यो भवति), ते (तव) दर्शनात् पुनः कुतः नु होगा॥” 190-191 ॥ (किं वक्तव्यं, कृतार्थास्मीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ म्लेच्छ-शासकका इसे स्वीकार करना और दैन्यपूर्वक सभीको प्रणाम करनेके बाद विदायी-ग्रहण :— मुस्लिम राजाको कृपापूर्वक श्रीकृष्णनाम तबे सेइ महाप्रभुर चरण वन्दिया। ग्रहण करनेका आदेश :— सबार चरण वन्दि' चले हृष्ट हञा॥ 192 ॥ तबे महाप्रभु ताँरे कृपा-दृष्टि करि'। आश्वासिया कहे,—“तुमि कह 'कृष्ण' 'हरि'॥” 187 ॥ अनुवाद—तब उस यवन-शासकने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की। फिर उसने सभी भक्तोंके अनुवाद—तब महाप्रभुने उस यवन-राजाके प्रति चरणोंकी वन्दना की और प्रसन्नचित्तसे चल पड़ा॥ 192 ॥ कृपा दृष्टि करके उसे आश्वासन देते हुए कहा,—“तुम 'कृष्ण' 'हरि' नामका कीर्तन करो॥” 187 ॥ अनुभाष्य—'सेइ'—म्लेच्छ शासक॥ 192 ॥ अनुभाष्य—'ताँरे'—उस म्लेच्छ शासकको॥ 187 ॥ 74