श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1519, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/174-185 ] अथवा स्मरणसे ही सम्पूर्ण जगत्का उद्धार हो जाता है॥"174-175॥ मुस्लिम शासकको महाप्रभुके दर्शनकी सम्मति देना :- एत बलि' विश्वासेरे कहिल वचन। “भाग्य ताँर-आसि' करुक प्रभु दरशन॥176॥ प्रतीत करिये-यदि निरस्त्र हञा। आसे तँहो पाँच-सात भृत्य सङ्गे लञा॥"177॥ अनुवाद-ऐसा अपने मनमें विचार करके राजकर्मचारीने यवनके विश्वासपात्रसे कहा,-"यह उनका सौभाग्य होगा, वे आकर महाप्रभुके दर्शन कर सकते हैं। किन्तु एक बात आप समझ लीजिये कि वे बिना किसी अस्त्र-शस्त्रके आयें। वे साथमें पाँच-सात सेवकोंको अवश्य लेकर आ सकते हैं॥"176-177॥ दूतके द्वारा यह आनन्द संवाद देना, मुस्लिम लोगोंका छद्म हिन्दु वेशमें महाप्रभुके दर्शनके लिये आना :- 'विश्वास' याञा ताँहारे सकल कहिल। हिन्दुवेश धरि' सेइ यवन आइल॥178॥ दूर हैते प्रभु देखि' भूमेते पड़िया। दण्डवत् करे अश्रु-पुलकित हञा॥179॥ अनुवाद-उस विश्वसनीय व्यक्तिने जाकर यवन राजाको सब कुछ बतलाया। वह यवन राजा हिन्दुओंका वेश धारण करके आया। महाप्रभुको दूरसे ही देखकर उसने भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया। उसके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे तथा उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा॥178-179॥ महाप्रभुके निकट आकर मुस्लिमका श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- महापात्र आनिल ताँरे करिया सम्मान। जोड़हाते प्रभु-आगे लय कृष्णनाम॥180॥ अनुवाद-महापात्र उसे सम्मानपूर्वक महाप्रभुके निकट ले आये। वह यवन हाथ जोड़कर महाप्रभुके सामने खड़े होकर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने लगा॥180॥ अपने मुस्लिम जन्मको धिक्कार और निर्वेदपूर्ण उक्ति :- “अधम यवनकुले केने जन्माइले। विधि मोरे हिन्दुकुले केने ना जन्माइले॥181॥ महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिके बिना मृत्युकी इच्छा :- 'हिन्दु' हैले पाइताम तोमार चरण-सन्निधान। व्यर्थ मोर एइ देह, याउक पराण॥"182॥ अनुवाद-उस यवनने महाप्रभुसे कहा,-"मेरा जन्म अधम यवनकुलमें क्यों हुआ? विधाताने मुझे हिन्दुकुलमें क्यों नहीं जन्म दिया? हिन्दुकुलमें जन्म लेनेपर मुझे आपके चरणकमलोंका सान्निध्य प्राप्त होता। मेरी यह देह व्यर्थ ही है, इसलिये मेरे प्राणोंका अभी निकल जाना ही अच्छा है॥"181-182॥ उसकी खेदपूर्ण उक्तिको सुनकर राजकर्मचारीके द्वारा भी महाप्रभुकी स्तुति :- एत शुनि' महापात्र आविष्ट हञा। प्रभुके करेन स्तुति चरणे धरिया॥183॥ भगवन्नाम-श्रवणके फलस्वरूप अन्त्यजको भी पवित्रता-लाभ :- “चण्डाल-पवित्र, याँर श्रीनाम-श्रवणे। हेन-तोमार एइ जीव पाइल दरशने॥184॥ भगवद्दर्शनके फलस्वरूप मुस्लिमका उद्धार अधिक विस्मयका कारण नहीं :- इँहार ये एइ गति, इथे कि विस्मय? तोमार दर्शन-प्रभाव एइमत हय॥"185॥ अनुवाद-यवन राजाकी बातको सुनकर महापात्र भी आविष्ट होकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगा,-"चण्डाल भी आपके श्रीनामका श्रवण करके पवित्र हो जाता है। और इस जीवको तो आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं। इसलिये इस यवनकी जो यह गति हुई है, इसमें कैसा विस्मय है? आपके दर्शनका प्रभाव ही ऐसा है॥"183-185॥ । 73