भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1518

[ 16/164-175 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हैं। सभी हँसते हैं, नाचते हैं, गाते हैं और रोते हैं। लाखों-लाखों लोग उन्हें देखनेके लिये आते हैं और एक बार उन संन्यासीको देखनेपर पुनः अपने घरको लौट नहीं पाते। वे सब भी पागल जैसे हो जाते हैं तथा 'कृष्ण' कहकर नाचते हैं, रोते हैं और भूमिपर लोट-पोट खाते हैं। यह सब कहनेकी बात नहीं है, देखनेपर ही इसका अनुभव किया जा सकता है। उन संन्यासीके प्रभावके कारण मैं उन्हें 'ईश्वर' ही मानता हूँ॥" 164-167 ॥ उस गुप्तचरका प्रेमावेश :- एत कहि' सेइ चर 'हरि' 'कृष्ण' गाय। हासे, कान्दे, नाचे, गाय बाउलेर प्राय ॥ 168 ॥ अनुवाद-इतना कहकर वह गुप्तचर 'हरि' 'कृष्ण' कहकर गान करने लगा और वह भी पागलकी भाँति हँसने, रोने, नाचने तथा गाने लगा ॥ 168 ॥ गुप्तचरके मुखसे महाप्रभुकी बात सुनकर मुस्लिम शासकका महाप्रभुके पास दूत-भेजना :- एत शुनि' यवनेर मन फिरि' गेल। आपन-'विश्वास' उड़िया-स्थाने पाठाइल ॥ 169 ॥ अनुवाद-गुप्तचरके मुखसे ये सब बातें सुनकर यवन राजाका मन बदल गया। उसने अपने एक अति विश्वसनीय व्यक्तिको उड़िया-छावनीमें उड़ीसाके राज अधिकारीके पास भेजा ॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'विश्वास' - गौड़देशीय यवन राजाका 'विश्वासखाना' नामक एक 'कार्यालय' था; उसमें अत्यन्त विश्वसनीय कायस्थोंको ही कार्यपर रखा जाता था। राजाको जब जहाँ प्रधान कार्य पड़ता, वहीं ये कायस्थ 'विश्वास' गण ही भेजे जाते थे ॥ 169 ॥ दूतके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना और प्रेमावेश :- 'विश्वास' आसिया प्रभु-चरण वन्दिल। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' प्रेमे विह्वल हइल ॥ 170 ॥ अनुवाद-यवन राजाका वह अति विश्वासपात्र व्यक्ति महाप्रभुके पास आया। जब उसने आकर महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया और 'कृष्ण-कृष्ण' उच्चारण किया, तो वह भी प्रेममें विह्वल हो गया ॥ 170 ॥ राज-कर्मचारीके निकट उसका कातरभावसे निवेदन और सन्धिकी प्रार्थना :- धैर्य हञा उड़ियाके कहे नमस्करि'। "तोमा-स्थाने पाठाइला म्लेच्छ अधिकारी ॥ 171 ॥ तुमि यदि आज्ञा देह' एथाके आसिया। यवन अधिकारी याय प्रभुके मिलिया ॥ 172 ॥ बहुत उत्कण्ठा ताँर, करयाछे विनय। तोमा-सने एइ सन्धि, नाहि युद्ध-भय ॥" 173 ॥ अनुवाद-कुछ देरके बाद धैर्य धारण करके उसने उड़ीसाके राज-कर्मचारीको नमस्कार किया और कहा,-"यवन राजाने मुझे आपके पास भेजा है। यदि आप आज्ञा दें, तो यवन राजा महाप्रभुसे मिलकर चले जाँय। उनको महाप्रभुसे मिलनेकी बहुत उत्कण्ठा है, उन्होंने विनती करनेके लिये ही मुझे यहाँ भेजा है। उनका प्रस्ताव सन्धिके लिये है, युद्धका कोई भय नहीं कीजिये ॥" 171-173 ॥ महाप्रभुके द्वारा मुस्लिम-शासकके चित्त-परिवर्तनसे राजकर्मचारीको विस्मय :- शुनि' महापात्र कहे हञा विस्मय। “मद्यप यवनेर चित्त ऐछे के करय ! ॥ 174 ॥ आपने महाप्रभु ताँर मन फिराइल। दर्शन-स्मरणे याँर जगत् तारिल ॥" 175 ॥ अनुवाद-उसके प्रस्तावको सुनकर राजकर्मचारीने अत्यन्त विस्मित होकर कहा,-"मद्यपानमें मत्त रहनेवाले यवनका चित्त ऐसा किसने बना दिया ! स्वयं महाप्रभुने ही उसके मनको परिवर्तित कर दिया है। जिनके दर्शन 72 ।